इलेवन मिनट्स …

वर्षों पहले की बात है । विश्वविद्यालय के तरफ़ से प्रायोगिक परीक्षाएँ में परीक्षक बन मुझे आगरा जाना हुआ । आस पास के दो तीन कॉलेज में प्रायोगिक परीक्षा समाप्त करवा मैंने एक टैक्सी ले ली । आगरा में ही ‘इलेवन मिनट्स’ किताब ख़रीद ली । उम्र कम थी – किताब बस दो घंटे में , रास्ते में ही ख़त्म कर दिया । वक़्त के साथ सब भूल गया लेकिन उस किताब में लिखी एक बात याद रह गयी – ” हम इंसान दर्द को एँज़ोय करते हैं ” !
तब यह बात मन में अटक गयी । कई गीत भी दर्द पर लिखे जा चुके हैं – ‘किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार’ । शायद यह दर्द का ही कारोबार है की कई बार राजनीति में भी इसी दर्द को सहानुभूति वोट के लिए इस्तेमाल किया जाता है । इश्क़ तो पूरा से दर्द और सहानुभूति का ही खेल है ।
रेडियो जॉकी शशि ने जब मुझसे कुछ पूछा तो मैंने रेडियो मिर्ची पर कहा था – शायद हम तरह की भावनाओं को एँज़ोय करना चाहते हैं और घृणा भी एक पवित्र भावना है । जैसे एक सर्किल है , जिसके शून्य डिग्री पर प्रेम है और 360 डिग्री पर घृणा है – जब घृणा हद से पार गुज़र जाएगी , काँटा 360 डिग्री के पार फिर से शून्य डिग्री पर स्थित एक प्रेम पर जा पहुँचेगा । और यह काँटा हमेशा क्लॉकवाइज़ घूमता है ।
एक दफ़ा एक लड़की ने एक लड़के को कहा – बहुत प्रेम किए , अब हम दोनो को अलग हो जाना चाहिए । लड़के ने पूछा – क्यों ? लड़की बोली – एक कशिश रह जाएगी , नहीं मिल पाने की । लड़का हैरान था । लड़की को सम्पूर्ण प्रेम चाहिए था – प्रेम के बाद के दर्द का ।
मिलन तो प्रेम की पूर्णाहती है । दर्द प्रेम को ज़िंदा रखता है ।
कुछ अजीब नहीं है – भावनाओं का खेल । दर्द को भी एँज़ोय करने की तमन्ना 😳

29.11.2016

गुल्लक …

गुल्लक बेहद पसंद । कहीं से भी आओ और पॉकेट में खनखनाते चंद सिक्कों को गुल्लक में डाल निश्चिंत । फिर उस गुल्लक के भरने का इंतजार ताकि उसे फोड़ा जा सके । कभी किसी को कड़कड़ाते नोट गुल्लक में डालते नहीं देखा । हमेशा सिक्के ही ।
पर कभी कभी ऐसा लगता है क्या इतने दिनों मौन रह कर हर एक सिक्के को खुद के अंदर महसूस कर , उन सिक्कों से उस गुल्लक को लगाव नहीं हो जाता होगा ? और जो उस गुल्लक में सिक्कों को डाल रहा होता है , उसे उस गुल्लक से लगाव नहीं होता होगा ? शायद नहीं । गुल्लक को सिक्कों से लगाव हो भी जाए तो सिक्कों के मालिक को नहीं होता है वरना कभी कोई गुल्लक फूटे ही नहीं , बस सजता रहे , आजीवन । क्या दुर्भाग्य है , गुल्लक की आयु तभी तक है , जब तक वो खाली है । जैसे जैसे वो भरता जाता होगा , वह गुल्लक एक भय में जीता होगा । प्लीज़ …अब और नहीं । कभी भी फोड़ दिया जाऊंगा ।
और एक दिन वो फोड़ दिया जाता है । गुल्लक का मालिक उन सिक्कों से कोई मनचाही सामान खरीदने निकल पड़ता है । कोई फुट कर आपको मजबूत करता है और आप किसी को फोड़ कर मजबूत होते हैं ।
इंसान भी गुल्लक है । नहीं । वो गुल्लक नहीं है । भले ही उसके नसीब में कड़कड़ाते नोट न हों लेकिन वो सिक्कों को महसूस अवश्य करेगा …

कुछ…कुछ …यूं ही …बेवजह ही …:))

~ गुल्लक , 28.11.2019

ओनली बुलेट …

पटना में घर घर बुलेट , हर हर बुलेट हो गया है । जिसको देखिये वही बुलेट हांक रहा है । हाफ लिवर का आदमी भी बुलेट लेकर घूम रहा है । अरे भाई , तुम्हारा कोई इज्जत नही है लेकिन बुलेट का इज्जत तो है …न । अकेले बुलेट स्टैंड पर नही लगेगा लेकिन घूमेंगे बुलेट पर ही । कुकुर बिलाई , खियाईल बिहारी जब बुलेट लेकर घूमता है , मन उदास हो जाता है 😦
बुलेट मतलब बड़का ठीकेदार या उसका मुंशी मैनेजर या थानेदार । डीजल वाला बुलेट , चार कोस दूर से ही आवाज़ आ रहा है । लाल बुलेट , हैंडिल में लाल झालर , आईना में कोई देवी स्थान का चुनरी लपेटा हुआ । ज़िला जवार का कोई बड़का रंगबाज़ , आर्मी का कैप्टन , फॉरेस्ट ऑफिसियल पर बुलेट शोभा देता है ।
बुलेट पर गर्लफ्रेंड को लेकर नही घुमा जाता है , शौकिया में बड़े भाई की छोटी साली को लेकर घुमाया जाता है । जीजा जी , बोलिये न रंजू जी को की थोड़ा बुलेट से घुमा दे । अब रंजुलाल हाफ पैंट में ही बुलेट स्टार्ट । चलिए न , जहां कहियेगा , वहीं घुमा देंगे , थोड़ा सट के बैठिये ..न , बैलेंस नही हो रहा है । बुलेट मतलब नहर किनारे …ढक चक …ढक चक …हवा के झोंका से लाल दुपट्टा लहरा रहा । जितना दुपट्टा लहरा रहा उतना ही बुलेट का स्पीड बढ़ रहा ।
अब पटना के कंकड़बाग में हाफ लिवर वालों को बुलेट का सवारी करते देख , मन दुखी हो जाता है । खैर …..
~ रंजन ऋतुराज / पटना / 19.11.2017

शब्द छवि बनाते हैं …

मै कोई साहित्यकार / लेखक / पत्रकार / कवी / शायर नहीं हूँ – बस जो जब दिल में आया लिख दिया – करीब ठीक दस साल पहले – मैंने यूँ ही रोमन लिपि में हिंदी भाषा में – रामेश्वर सिंह कश्यप उर्फ़ लोहा सिंह से प्रेरित होते हुए – खुद पर ही एक बेहतरीन व्यंग किया था – जिसकी दो प्रतिक्रिया हुई – एक इंटरनेट मित्र ने मुझे बड़े ही अजीब ढंग से देखा और मेरे बारे में बहुत ही गलत छवी बना ली – उन्हें मै देहाती / फलना / ढ़कना मालूम नहीं क्या क्या ..बहुत कोशिश मैंने की ..पर वो मेरे बारे में गलत ही सोचते रहे – वहीं दूसरी तरफ एक और भईया समान मित्र जो एक मल्टीनेशनल में ग्लोबल हेड हैं – मेरे पीछे पड़ गए – रंजन तुममे असीम संभावनाएं हैं – तुम लिखो – फिर मै लिखने लगा !
“एक ही लेख ..दो अलग अलग लोगों पर अलग अलग छाप छोड़ गया “
शब्द छवी बनाते हैं – कोई आपके अन्दर नहीं झांकने जाता – जैसे आपके बैंक मे आपके पास कितना पैसा है – किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है – अब क्या पहनते हैं – क्या ओढ़ते है – कैसा जीवन जीते हैं – लोग वही देख आपके लिए एक छवी बनाते हैं – ठीक उसी तरह आपके मुख से / आपके कलम से क्या निकलता है – वही आपकी छवी बनती है – “शब्द नकाब होते हैं” !
पर …पर ..आपके बैंक में कितना पैसा है …यह आपके परिवार के लिए महतवपूर्ण है …ठीक वैसे ही ..आप अन्दर से कैसे इंसान है …यह आपके करीब के लोगों के लिए काफी महतवपूर्ण है …आप क़र्ज़ लेकर खूब महंगे कपडे पहने …खूब चमक दमक से रहे ..और अन्दर ही अन्दर खोखले हैं …अन्तोगत्वा सब कुछ फीका लगेगा …ठीक उसी तरह ..आपका व्यक्तित्व अन्दर से एकदम खोखला है ..और आपके शब्द कुछ पल / दिन के लिए लोगों को भरमा सकता है …पर जिस दिन वो नकाब गिरेगा …आपको नंगा देख दुनिया घृणा करने लगेगी …!
बेहतर है …हम स्वाभाविक रहे …

~ रंजन / दालान / 21.11.2013

छठ क्या है ?

छठ क्या है ? छठ यही है 🙏
~ किसी भी बिहारी के लिए यह समझा पाना की छठ क्या है । दुनिया का सबसे मुश्किल काम । जाति को कौन पूछे – धर्म की दीवारें गिर जाती है ।
~ भावनाओं का वह सागर किस तूफान पर होता होगा जब गांव के नथुनी मियां कहते हैं –” बउआ , दु सूप हमरो तरफ से , बेटा के अरब में नौकरी लाग गइल । “
~ कैसा है यह पर्व । दलित के बगल में ब्राह्मण भी उसी घाट पर खड़ा । राजा के बगल में रंक । चोर के बगल में सिपाही । जमींदार के बगल में बेलदार । कलक्टर के बगल में चपरासी । सभी के सभी एक साथ पहले डूबते और फिर उगते सूर्य की ’अरग ’ 🙏
~ कितना कठिन पर्व । पहले दिन १२ घंटे का बिना जल का उपवास । फिर दूसरे दिन २४ घंटे का बिना जल का उपवास । और फिर ३६ घंटे का बिना जल महा उपवास 🙏
~ हिन्दू धर्म मंत्रोचारण पर निर्भर है । ना किसी ब्राह्मण की ज़रूरत और ना ही किसी वेद की पढ़ाई । ना किसी हवन की ज्वाला और ना ही किसी जनेऊ और टीक का धारण 🙏
~ जो है तो बस वही है – ऊर्जा के सबसे बड़े श्रोत – सूर्य की उपासना । पहले डूब रहे सूर्य की पूजा फिर एक कठोर रात गुजारने के बाद उग रहे सूर्य की पूजा ।
और आप हमसे पूछते हैं …छठ क्या है । और क्या लिखे और क्या समझाएं कि छठ क्या है । ना हम लिख सकते हैं और ना आप समझ सकते हैं ।
आप अगर हम है तो बस समझ जाइए – आज नहाय खाय है । छठ व्रती नहाने के बाद साल का सबसे पवित्र और सात्विक भोजन करेंगे 🙏 अरवा चावल , चना का दाल और कद्दू की सब्जी – पता है …इस पवित्रता को एक साल का इंतजार होता है 🙏
और आप हमसे पूछते हैं …छठ क्या है …
: रंजन , दालान / 18.11.2020

छठ : जब ले माई बिया …

आज नहाय – खाय है ! हल्का ठण्ड ! कुहासा भी है ! कम्बल से बाहर निकला तो देखा – दरवाजे पर हुजूम ! बाबा का खादी वाला शाल ओढ़ – चाचा का हवाई चप्पल ले के …बाहर ! कुर्सियां सजी है – लोग बैठे हैं !
अहा …मिंटू चाचा …एक कुर्सी पर चुप चाप ! सीधे जा कर उनको ‘गोर’ छू कर प्रणाम – चाचा …आपका बाल सफ़ेद हो गया …हंसने लगे – बोले ….तुमको गोद में खिलाया – अब जब तुम चालीस ‘टप’ गए – फिर हमारी क्या अवकात !
दरवाजा पर सब लोग हंसने लगे ! बड़ा ही मनोरम दृश्य !
‘मिंटू’ चाचा – सब याद है ! कुछ पढ़ लिख ‘हैदराबाद’ चले गए ! घर के सबसे बड़े लडके ! पिछले तीस साल से हर साल – छठ पूजा में गाँव आना ! अजब ढंग है – सुबह सुबह चार बजे ही – गाँव में घुस जाते हैं – लोग कहता है – गाँव में घुसते वक़्त – अपना जूता खोल देते हैं – पिछला साल हम पूछे – ऐसा क्यों चाचा ? बोले – इ मंदिर ह ( यह मंदिर है ) – बाप दादा का जगह है ! कभी कोई मुझे खोदेगा – तब मेरा जड़ यहीं मिलेगा ! जड़ है ..तभी हम और तुम हैं !
मिंटू चाचा चार्टेड प्लेन से चलते हैं – गाँव में किसी को नहीं पता – बताना भी नहीं चाहते – हैदराबाद में पचास करोड़ का अपना बंगला है ! गाँव आने पर – वही हाफ कुरता – पायजामा ! हम पूछे – कब तक गाँव आईयेगा – एक दिन छुट जायेगा ..सब ! उनका आँख भर गया – कहने लगे – ‘जब ले माई बिया’ ( जब तक माँ जिन्दा है ) !
तब तक एक नौजवान जेन्स और टी में – मिंटू चाचा का बेटा – अमरीका में डाक्टर – अँगरेज़ पत्नी ! आँख निचे – हाथ पीछे ! मिंटू चाचा ..भावुक हो गए ..अपना स्ट्रगल का कहानी सुनाने लगे – पढ़ते वक़्त – गाँव का कौन कौन मदद किया – कैसे किया….उनका बेटा ..चुप चाप …आँख निचे किये …सुन रहा है .. ! बेचारा उनका बेटा – एक तरफ से दरवाजे पर सभी लोग को – गोर छू छू के प्रणाम – मिंटू चाचा सभी से – आशीर्वाद दीं – इहे एगो बारन ! ( आशीर्वाद दीजिये – यहीं एक हैं मेरे सुपुत्र ) !
मिंटू चाचा बोले – चलो मेरे अंगना – चाची से मिल लो – उनका घर मेरे घर से सौ गज दूर – रास्ता में बोले – किसको दिखाएँ और क्या दिखाएँ – परस्पर श्रद्धा ख़त्म हो जायेगा – जो क़र्ज़ माथे पर है – किस धन से चुकाएं ….आँगन में चाची …मचिया पर …हंसी मजाक …स्टील के कप में… एक कप चाय ..मिला ..निमकी के साथ !
बाहर निकल – मिंटू चाचा से – हम पूछे – कब तक गाँव आईयेगा – एक दिन छुट जायेगा ..सब ! उनका आँख भर गया – कहने लगे – ‘जब ले माई बिया’ ( जब तक माँ जिन्दा है ) !
~ 16 November – 2012 / DAALAAN

छठ की यादें : रंजन ऋतुराज

कल से ही अखबार में ‘छठ पूजा’ को लेकर हो रही तैयारी के बारे में समाचार आने लगे ! आज तो दिल्ली वाला ‘हिंदुस्तान दैनिक’ फूल एक पेज लिखा है ! कल दोपहर बाद देखा – फेसबुक पर् शैलेन्द्र सर ने एक गीत अपने वाल पर् लगाया था – शारदा सिन्हा जी का ! गीत सुनते सुनते रोआं खडा हो गया और आँख भर आयी !
“छठी मैया …छठी मैया…..” …………..
क्या लिखूं ? अपना वतन याद आ रहा है ! अपना गाँव – शहर – अपने लोग ! क्या खोया – क्या पाया ..इसका हिसाब तो बाद में होगा ! ये चमक – ये दमक – ये धन – ये दौलत – ये रोब – ये अकड – ये घमंड ..कभी कभी ये सब फीका लगता है ! खैर …
दशहरा के बाद ही ‘कैलेण्डर’ में ‘चिन्हा’ लगा दिया जाता था – कहिया गाँव जाना है ! हमारे गाँव में एक बहुत खूबसूरत परंपरा थी – दशहरा से लेकर दीपावली के बीच ‘नाटक’ खेला जाता था ! कभी पहले पहुंचा तो ..नाटक में भाग ले लेता था ! अब कुछ नहीं होता – अब हर घर में टी वी है ! मेरे घर में एक परंपरा है – हर होली और छठ में परिवार के सभी लोगों के लिये ‘कपड़ा’ खरीदने का पैसा – बाबा देते हैं – आज उनकी उम्र करीब चौरासी साल हो गयी – फिर भी इस बार दशहरा में उनसे मिला तो ‘छठ’ के नाम पर् वो बच्चों और पत्नी के कपडे के लिये कुछ पैसा – मां को दिए – फिर मां ने हमारी पत्नी को दीं ! 🙂 पैसा से ज्यादा ‘आशीर्वाद’ होता है !
बचपन में ये पैसा से हमलोग का कपड़ा खरीदाता था ! रेडीमेड का जमाना नहीं था ! मा बाबु जी के साथ रिक्शा से जाना – कपड़ा खरीदना – फिर उसको ‘फेरने’ जाना 😉 ‘फेरते’ वक्त बाबु जी नहीं जाते – खैर ..कपडा खरीदा गया ! दीपावली भी मन गया ! मुजफ्फरपुर में रहते थे – एक दिन पहले रिक्शा वाले को बोल दिया जाता की – सुबह सुबह ३ बजे आ जाना ! उस रात ..माँ रात भर कपडा को सूटकेस में डालती ! हल्का ठण्ड भी होता था सो स्वेटर वैगरह !
सुबह सुबह रिक्शा आ जाता ! सूटकेस रखा जाता ! एक रिक्शा पर् माँ और बहन और एक पर् बाबु जी और हम ! पैर को सूटकेस के ऊपर लटका के ! बाबु जी के गला में मफलर और एक हाफ स्वेटर ! चार बजे एक बस – रेलवे स्टेशन के सामने से खुलता था ! ठीक उसी वक्त एक ट्रेन ‘कलकत्ता’ से आता – हम लोग जब तक पहुंचते बस भर चूका होता ! सिवान के बच्चा बाबु का बस होता था – कंडक्टर – खलासी – ड्राईवर जान पहचान का सो सीट का इंतजाम हो जाता ! अब इमेजीन कीजिए – पूरा बस ‘कलकतिया’ सब से भरा हुआ ! “चुकुमुकू” कर के सीट पर् बैठ कर बीडी ! भर माथा ‘कियो-कारपीन’ तेल ! एक झोला और झोला में तरह तरह का साबुन 🙂 और पाकीट में ‘गोल वाला चुनौटी’ 😉 खिडकी खोल के हवा खाता 🙂
गाँव से कुछ दूर पर् ही एक जगह था – वहाँ हम लोग उतरते ! माँ को चाय पीने का मूड होता ! तब तक बाबु जी देख रहे होते ही गाँव से कोई आया है की नहीं ! पता चलता की ‘टमटम’ आया हुआ है ! माँ और बहन टमटम पर् ..पूरा टमटम साडी से सजाया हुआ ! ‘कनिया’ 🙂 हम और बाबु जी हाथी पर् ! हम लोग निकल पड़ते ..! वो लहलहाते खेत ! रास्ता भर हम बाबु जी को तंग करते जाते – ये खेत किसका है ? इसमे क्या लगा है ?
गाँव में घुसते ही – बाबु जी हाथी से उतर जाते और पैदल ही ! जो बड़ा बुजुर्ग मिलता – उसको प्रणाम करते – अपने बचपन के साथीओं से मिलते जुलते ! तब तक हम दरवाजे पर् पहुँच जाते ! बाबा को देख जो खुशी मिलती उस खुशी को बयान नहीं कर सकता ! वो खादी के हाफ गंजी में होते – सीसम वाला कुर्सी पर् – आस पास ढेर सारे लोग ! उनको प्रणाम करता और कूदते फांदते आँगन में ..दीदी( दादी)  के पास ! आँगन में लकड़ी वाला चूल्हा – उस चूल्हे से आलूदम की खुशबू ! आज तक वैसा आलूदम खाने को नहीं मिला 😦  दरवाजे पर् कांसा वाला लोटा में पानी और आम का पल्लो लेकर कोई खडा होता ..माँ के लिये ! फिर ‘भंसा घर’ में जा कर ‘कूल देवी’ को प्रणाम करना ! इतने देर में हम ‘दरवाजा – आँगन’ दो तीन बार कर चुके होते ! ढेर सारे ‘गोतिया’ के भाई बहन – कोई रांची से – कोई मोतिहारी से – कोई बोकारो से ! कौन कब आया और कितने ‘पड़ाके’ साथ लाया 🙂 तब तक पता चलता की ‘पड़ाका’ वाला झोला तो मुजफ्फरपुर / पटना में ही छूट गया ! उस वक्त मन करता की ‘भोंकार’ पार कर रोयें ! गोतिया के भाई – बहन के सामने सारा इज्जत धुल जाता ! माँ को तुरंत खड़ी खोटी सुनाता ! दीदी ( दादी ) को ये बात पता चलता – फिर वो बाबा को खबर होता ! बाबा किसी होशियार ‘साईकील’ वाले को बुलाते – उसको कुछ पैसा देते की पास वाले ‘बाज़ार’ से पड़ाका ले आओ 🙂
दोपहर में हम बच्चों का डीयुटी होता की पूजा के परसाद के लिये जो गेहूं सुख रहा है उसकी रखवाली करो के कोई कौआ नहीं आये ! हम बच्चे एक डंडा लेकर खडा होते ! बड़ा वाला खटिया पर् गेहूं पसरा हुआ रहता …फिर शाम को कोई नौकर उसको आटा चक्की लेकर जाता ! कभी कभी हम भी साथ हो जाते ! बिजली नहीं होता था ! आटा चक्की से एक विशेष तरह का आवाज़ आता ! वो मुझे बहुत अच्छा लगता था !
दादी छठ पूजा करती ! पहले बाबु जी भी करते थे ! आस पास सभी घरों में होता था ! नहा खा के दिन बड़ा शुद्ध भोजन बनता ! खरना के दिन का परसाद सभी आँगन में घूम घूम के खाना ! छठ वाले दिन – संझीया अरग वाले दिन – जल्दी जल्दी तैयार हो कर ‘पोखर’ के पास पहुँचाना ! बहुत साल तक माँ नहीं जाती – फिर वो जाने लगीं ! वो सीन याद आ रहा है और आँखें भींग रही हैं ! १५ – २० एकड़ का पोखर और उसके चारों तरफ लोग ! रास्ता भर छठ के गीत गाते जाती महिलायें ! भर माथा सिन्दूर ! नाक से लेकर मांग तक ! पूरा गाँव आज के दिन – घाट पर् ! क्या बड़ा – क्या छोटा – क्या अमीर – क्या गरीब ! गजब सा नज़ारा ! पोखर के पास वाले खेत में हम बच्चे ..पड़ाका में बिजी ..तब तक कोई आता और कहता ..’अरग दीआता’  …पड़ाका को वहीँ जैसे तैसे रखकर दादी के पास ..वो “सूर्य” को प्रणाम कर रही हैं ….आस पास पूरा परिवार …क्या कहूँ इस दृश्य के बारे में ….बस कीबोर्ड पर् जो समझ में आ रहा है ..लिखते जा रहा हूँ ….
हमारे यहाँ ‘कोसी’ बंधाता है – आँगन में ! उस शाम जैसी शाम पुर साल नहीं आती ! बड़ा ही सुन्दर ‘कोसी’ ! चारों तरफ ईख और बीच में मिट्टी का हाथी उसके ऊपर दीया …! घर के पुरुष कोसी बांधते ..हम भी पुरुष में काउंट होते 🙂  बड़े बड़े पीतल के परात में परसाद ! वहाँ छठ मैया से आशीर्वाद माँगा जाता – हम भी कुछ माँगते थे 🙂 फिर दादी को प्रणाम करना !
अब यहाँ एक राऊंड फिर से दरवाजा पर् ‘पड़ाका’ ! पूरा गाँव हील जाता 😉 दादी कम्बल पर् सोती सो उनके बड़े वाले पलंग पर् जल्द ही नींद आ जाती …सुबह सुबह ..माँ जगा देती ….कपड़ा बदलो ….पेट्रोमैक्स जलाया जाता …कई लोग “लुकारी” भी बनाते ! कई पेट्रोमैक्स के बीच में हम लोग फिर से पोखर के पास निकल पड़ते ! दादी खाली पैर जाती थी ! पूरा गाँव ..नहर के किनारे ….  एक कतार में ……पंडीत जी की खोजाई होती ..’बनारस वाला पत्रा’ देख कर वो बताते …सूरज भगवान कब उगेंगे ….उसके १० -१५ मिनट पहले ही दादी पोखर के किनारे पानी के खडा होकर ‘सूर्य’ भगवान को ध्यानमग्न करती ! अरग दिआता !
पूजा खत्म हो चूका होता ! पोखर से दरवाजे लौटते वक्त …तरह तरह का परसाद खाने को मिलता ! किसी का देसी घी में तो किसी का ‘तीसी के तेल ‘ का 🙂 फिर दरवाजे पर् आ कर ‘गन्ना चूसना’ :)) फिर हम दादी के साथ बैठ कर खाते – पीढा पर् !
अब दिल धक् धक् करना शुरू कर देता ..बाबु जी को देखकर डर लगता ..मालूम नहीं कब वो बोल दें …मुजफ्फरपुर / पटना वापस लौटना है 😦 बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती …माँ को देखता …वो धीरे धीरे ‘टंगना’ से सिर्फ हम लोगों के ही कपडे चुन चुन कर एक जगह रख रही होतीं ….ऐसा लगता ..अब दिल बाहर आ जायेगा ….तब तक देखता ..टमटम सजा खडा है ..पता चलता की ‘मोतीहारी’ वाले बाबा का परिवार वापस जा रहा है …सब गोतिया – पटीदार के भाई बहन हम ऐसे मिलते जैसे ..मालूम नहीं अब कब मिलेंगे ….बाबा के पास दौर कर जाता ..काश वो एक फरमान जारी कर दें …एक दिन और रुकने का ….बाबा ने फरमान जारी कर दिया और हम लोग एक दिन और रुक गए :))
अगले दिन …जागते ही देखता की ..बाबू जी ‘पैंट शर्ट ‘में 😦 मायूस होकर हम भी ! माँ का खोइंछा भराता..कुल देवी को प्रणाम ..दादी के आँखें भरी ..माँ की …दादी – बाबा आशीर्वाद में कुछ रुपये ..पॉकेट में छुपा कर रख लेता 🙂
फिर होली का इंतज़ार …..
….मालूम नहीं ..क्या लिखा ..कैसा लिखा ..बस बिना संपादन ..एक सांस में लिख दिया ….कम्मेंट जरुर देंगे !

रंजन ऋतुराज / 8 नवम्बर , 2010 / इंदिरापुरम

रवीश कुमार की यादों में छठ

रविश कुमार शौक से पत्रकार है – मेरे पड़ोसी से मेरा ही परिचय देने लगे – “हम यादों में जीते हैं” – आज के ‘प्रभात खबर’ के पहले पन्ने पर छपी – उनकी बेहतरीन लेख – छठ पूजा पर – “सामूहिकता सिखाते छठ घाट”‘नरियलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुग्गा मेड़राए, ऊ जे खबरी जनइबो अदित से, सुग्गा दिले जूठइयाए, उ जे मरबो रे सुगवा धनुष से, सुग्गा गिरे मुरझाए .’ मैं कहीं भी रहूं, किसी भी हालत में रहूं, बस यह गाना किसी तरह मेरे कानों से गुजर जाये, मैं छठ में पहुंच जाता हूं. यह गीत रुलाते-रुलाते अंतरात्मा के हर मलिन घाट को धोने लगता है, जैसे हम सब बचपन में मिल कर झाड़ू लेकर निकल पड़ते थे, सड़क-घाट की सफाई करने. मुझे मालूम है कि छठ के वक्त हम सब भावुक हो जाते हैं. आपको पता चल गया होगा कि मैं भी भावुक हूं. हर छठ में यह सवाल आता है कि छठ में घर जा रहे हो. घर मतलब गांव. गांव मतलब पुरखों की भूमि. अब घर का मतलब फ्लैट हो गया है, जिसे मैंने दिल्ली में खरीदा है. गांववाला घर विरासत में मिला है, जिसने हमें और आपको छठ की संस्कृति दी है. मेरा गांव जितवारपुर बूढ.ी गंडक के किनारे है. बड़की माई छठ करती थीं. उनकी तैयारियों के साथ पूरा परिवार, जो जहां बिखरा होता था, सब छठ के मूड में आ जाता था. मां पूछती, ऐ जीजी केरवा केने रखाई, बाबूजी अपने ब.डे भाई से पूछने लगते थे- हो भइया,मैदा,डालडा कब चलल जाई अरेराज से ले आवे, आ कि पटने से ले ले आईं. कब जाना है और कब तक मीट-मछरी नहीं खाना है, सबकी योजना बन जाती थी. डालडा में ठेकुआ छनाने की खुशबू और छत पर सूखते गेंहू की पहरेदारी. चीनीवाला ठेकुआ और गुड़वाला ठेकुआ. एक कड़ा-कड़ा और दूसरा लेरु आया(नरम) हुआ. आपने भी इसी से मिलता- जुलना मंजर अपने घर-परिवार और समाज में देखा होगा. छठ की यही खासियत है, इसकी जैसी स्मृति मेरी है, वैसी ही आपकी होगी. आज के दिन जो भी जहां होता है, वह छठ में होता है या फिर छठ की याद में.उस दिन मेरी नदी गंडक कोसी के दीये से कितनी सुंदर हो जाती है, क्या बताएं. अगली सुबह घाट पर प्रसाद के लिए कत्थई कोरवाली झक सफेद धोती फैलाये बाबूजी आज भी वैसे ही याद आते हैं. जब तक जिंदा रहे, छठ से नागा नहीं किया. दो दिनों तक नदी के किनारे हम सब होते हैं. सब अपनी- अपनी नदियों के किनारे ख.डे उस सामूहिकता में समाहित होते रहते हैं, जिसका निर्माण छठ के दो दिनों में होता है और जिसकी स्मृति जीवन भर रह जाती है. हमारे जितने भी प्रमुख त्योहार बचे हैं, उनमें से छठ एकमात्र है, जो बिना नदी के हो ही नहीं सकता. बिहार को नदियां वरदान में मिली हैं, हमने उन्हें अभिशाप में बदल दिया. आधुनिकता ने जबसे नदियों के किनारे बांध को ढूंढ.ना शुरू किया, नदियांे का वर्णन भयावह होता चला गया. छठ एकमात्र ऐसा पर्व है, जो नदियों के करीब हमें ले जाता है. यह और बात है कि हम नदियों के करीब अब आंख मूंद कर जाते हैं, ताकि उसके किनारे की गंदगी न दिखे, ताकि उसकी तबाही हमारी पवित्रता या सामूहिकता से आंख न मिला ले. घाटों को सजाने का सामूहिक श्रम नदियों के भले काम न आया हो, मगर सामाजिकता के लिए जरूरी है कि ऐसे भावुक क्षण ज़रूर बनते चलें.‘पटना के घाट पर, हमहूं अरिगया देबई हे छठी मइया,हम न जाइब दूसर घाट, देखब हे छठी मइया.’ शारदा सिन्हा जी ने इसे कितना प्यार से गाया है. पटना के घाट पर छठ करने की जिद. गंगा की तरफ जानेवाला हर रास्ता धुला नजर आता है. सीरीज़ बल्ब से सजा और लाउड स्पीकर से आनेवाली आवाज, ऐ रेक्सा, लाइन में चलो, भाइयो और बहनो, कृष्णानगर छठपूजा समिति आपका स्वागत करती है. व्रती माताओं से अनुरोध है कि लौटते वक्त प्रसाद जरूर देते जाएं. कोई तकलीफ हो, तो हमें ज़रूर बताएं. पूरी रात हिंदी फिल्म के गाने बजने लगते हैं. हमारे वक्त में दूर से आवाज़ आती थी, हे तुमने कभी किसी को दिल दिया है, मैंने भी दिया है. सुभाष घई की फिल्म कर्ज का यह गाना खूब हिट हुआ था. तब हम फिल्मी गानों की सफलता बॉक्स ऑफिस से नहीं जानते थे. देखते थे कि छठ और सरस्वती पूजा में कौन- सा गाना खूब बजा. काश कि हम नदियों तक जानेवाले हर मार्ग को ऐसे ही साल भर पवित्र रखते. जो नागरिक अनुशासन बनाते हैं, उसे भी बरकरार रखते.कितने नामों से हमने नदियों को बुलाया है. गंगा,गंडक,कोसी,कमला, बलान, पुनपुन, सोन, कोयल, बागमती, कर्मनाशा, फल्गु, करेह, नूना, किऊल ऐसी कई नदियां हैं, जो छठ के दिन किसी दुल्हन की तरह सज उठती हैं. आज कई नदियां संकट में हैं और हम सब इन्हें छोड़ कर अपनी- अपनी छतों पर पुल और हौद बना कर छठ करने लगे हैं. दिल्ली में लोग पार्क के किनारे गड्ढा खोद कर छठ करने लगते हैं. यहां के हजारों तालाबों को हमने मकानों के नीचे दफन कर दिया और नाले में बदल चुकी यमुना के एक हिस्से का पानी साफ कर छठ मनाने लगते है. तब यह सोचना पड़ता है कि जिस सामूहिकता का निर्माण छठ से बनता है, वह क्या हमारे भीतर कोई और चेतना पैदा करती है. सोचियेगा. नदियां नहीं रहेंगी, तो कठवत में छठ की शोभा भी नहीं रहेगी. घाट जाने की जो यात्रा है, वह उस सामूहिकता के मार्ग पर चलने की यात्रा है, जिसे सिर्फ नदियां और उनके किनारे बने घाट ही दे सकते हैं. क्या आप ईद की नमाज़ अपने घर के आंगन में पढ. कर उसकी सामूहिकता में प्रवेश कर सकते हैं. दरअसल इसी सामूहिकता के कारण ईद और छठ एक -दूसरे के करीब हैं. बिहार की एकमात्र बड़ी सांस्कृतिक पहचान छठ से बनती है. इसका मतलब यह नहीं कि अन्य सामाजिक तबकों के विशाल पर्व -त्योहार का ध्यान नहीं है, लेकिन छठ से हमारी वह पहचान बनती है, जिसका प्रदर्शन हम मुंबई के जूहू बीच और कोलकाता के हावड़ा घाट पर करते हैं. इस पहचान से वह ताकत बनती है, जिसके आगे ममता बनर्जी बांग्ला में छठ मुबारक की होर्डिंग लगाती हैं और संजय निरूपम मुंबई में मराठी में. दिल्ली से लेकर यूपी तक में छठ की शुभकामनाएं देते अनेक होर्डिंग आपको दिख जायेंगे.अमेरिका में रहनेवाले मित्र भी छठ के समय बौरा जाते हैं. हम सब दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु में रहनेवाले होली को जितना याद नहीं करते, छठ को याद करते हैं. यह एक ऐसा पर्व है, जो भीतर से बिल्कुल नहीं बदला. पूजा का कोई सामान नहीं बदला. कभी छठ में नया आइटम जुड़ते नहीं देखा. अपनी स्मृति क्षमता के अनुसार यही बता सकता हूं कि छठ की निरंतरता गज़ब की है. बस एक ही लय टूटी है, वह है नदियों के किनारे जाने की. लालू प्रसाद के स्वीमिंग पुल वाली छठ ने इसे और प्रचारित किया होगा. यहीं पर थोड़ा वर्ग भेद आया है. संपत्र लोगों ने अपने घाट और हौद बना लिये. बिना उस विहंगम भीड़ में समाहित होने का जोखिम उठाये आप उस पहचान को हासिल करना चाहते हैं, यह सिर्फ आर्थिक चालाकी ही हो सकती है, लेकिन इसके बाद भी करोड़ों लोग नंगे पांव पैदल चल कर घाट पर ही जाते हैं. जाते रहेंगे. घाट पर नहीं जाना ही तो छठ में नहीं जाना होता है. अब रेल और बस के वश की बात नहीं कि सभी बिहारियों को लाद कर छठ में घर पहुंचा दें. इसलिए आप देखेंगे कि छठ ने अनेक नयी नदियों के घाट खोज लिये हैं. यह छठ का विस्तार है.‘सर..सर.छुट्टी दे दीजिए.सर. बस चार दिन में आपना गांव से वापस लौट आयेंगे. माई इस बार छठ कर रही है, मामी भी, छोटकी चाची भी. सब लोग. कलकत्ता से बड़का भईया भी आ रहे हैं. सर.हम भी जायेंगे.सर.टिकट भी कटा लिये हैं.. सर सब कुछ तो आपका ही दिया हुआ है.यह बुशर्ट ..यह खून में मिला नमक..मेरा रोम- रोम आपका कर्ज.दार है..बिहारी हैं न..पेट भरने अपने घर से मीलों दूर..आपकी फैक्टरी में..पर सर.छठ पूजा हमारे रूह में बसता है..अब हम आपको कैसे बताएं..छठ क्या है.हमारे लिए. हम नहीं बता सकते और न आप समझ सकते हैं.’हमारे मित्र रंजन ऋतुराज ने अपने फेसबुक पर इस काल्पनिक से लगने वाले छठ संवाद को लिखा है. क्या पता कितने लोगों ने ऐसे ही छुट्टी मांगी होगी, मिलने पर नाचे होंगे और नहीं मिलने पर उदास हो गये होंगे. सब आपस में पूछ रहे हैं, तुम नहीं गये, जाना चाहिए था. हम तो अगले साल पक्का जायेंगे. अभी से सोच लिये हैं. बहुत हुआ इ डिल्ली का नौकरी. हम सब यहां जो गंगा और गंडक से दूर हैं, छठ को ऐसे ही याद करते हैं. कोई घर जाने की खुशी बता रहा है, तो किसी को लग रहा है कि शिकागो में आकर भी क्या हासिल, जब छठ में गांव नहीं गये. तभी मैं कहता हूं कि इस व्रत को अभी नारीवादी नजरिये से देखा जाना बाकी है, हो सकता है इसे जातिगत सामूहिकता की नजर से भी नहीं देखा गया हो, जरूर देखना चाहिए, लेकिन इस त्योहार की खासियत ही यही है कि इसने बिहारी होने को जो बिहारीपन दिया है, वह बिहार का गौरवशाली इतिहास भी नहीं दे सका. शायद उस इतिहास और गौरव की पुनर्व्याख्या आने वाली राजनीति कर के दिखा भी दे, लेकिन फिलहाल जिस रूप में छठ हमें मिला है और हमारे सामने मौजूद है, वह सर माथे पर. हर साल भाभी का फोन आता है. छठ में सबको चलना है. जवाब न में होता है, लेकिन बोल कर नहीं देते. चुप होकर देते हैं. भीतर से रोकर देते हैं कि नहीं आ सके, लेकिन अघ्र्य देने के वक्त जल्दी उठना और दिल्ली के घाटों पर पहुंचने का सिलिसला आज तक नहीं रुका. छठ पूजा समिति में कुछ दे आना, उस सामूहिकता में छोटा सा गुप्तदान या अंशदान होता है, जिसे हमने परंपराओं से पाया है. तभी तो हम इसके नजदीक आते ही यू ट्यूब पर शारदा सिन्हा जी को ढूंढ.ने लगते हैं. छठ के गीत सुनते- सुनते उनके प्रति सम्मान प्यार में बदल जाता है. शारदा जी हम प्रवासियों की बड़की माई बन जाती हैं. हम उनका ही गीत सुन कर छठ मना लेते हैं.

~ रविश कुमार / प्रभात ख़बर ( दालान उनका शुक्रगुजार है – उन्होंने दालान के पन्नो को उसी भाव से – बिना सम्पादन – अपने लेख का हिस्सा बनाया – वो ऐसा पहले भी कर चुके हैं )
~ 18 November – 2012 

छठ पर गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी का एक लेख …

अक्सर पिछले छह दशकों की वीथियों में घूम ही आती हूं। उन स्मृतियों में सब हैं, दादा-दादी, मां-पिताजी, भाई-बहन और ढेर सारे चाचा-चाचियां और सेवक-सेविकाएं। उन्हीं रिश्तों के बीच होली-दिवाली, दुर्गा पूजा, चौथचंदा, सरस्वती पूजा और व्रत-त्योहार। सबसे ऊपर रहती है छठ पर्व की स्मृति। कितना सुहाना, कितनी आस्था। दादी द्वारा कितने सारे निषेध। चार दिनों की पूजा होती थी। तैयारी तो दुर्गा पूजा के समाप्त होते ही प्रारंभ हो जाती थी। सबसे पहले बांस का डाला और डगरा तथा सूप खरीदे जाते थे। ज्यों-ज्यों दिवाली नजदीक आती, हम बच्चों का उत्साह बढ़ता जाता। दिवाली के बाद एक-एक दिन की गिनती। हम दादी को तंग करते, ‘कब होगी छठ पूजा?’ छह दिन, छह वर्ष की भांति बीतते। ढेर सारे फल। नारियल, केला, नारंगी के साथ मूली, ओल, ईख, और भी बहुत कुछ।

नए कपड़े। घर, आंगन, दरवाजा गोबर से लिपा हुआ। पूजा के लिए डाला पुरुष के सिर पर रखकर एक किलोमीटर जाना पड़ता। गंडक नदी में सामूहिक पूजा। पश्चिम दिशा में मुंह कर पानी में खड़ी महिलाएं, थोड़े से पुरुष भी, डूबते सूर्य की पूजा करते। आकाश में सूर्य का गोला लाल हो जाता। पकवान (ठेकुआ और कसार) व फलों से भरे सूप उठा-उठाकर सूर्य को व्रतीजन अर्घ्य देते। दो, चार, पांच, छह से लेकर किसी-किसी परिवार का 21-25 सूप भी होते। बांस का डाला, बांस का सूप। पकवान बनाने में शुद्धता और पवित्रता पर विशेष ध्यान होता। एक बार मेरे नन्हे पांव डाला में लग गए थे। दादी ने मेरे पांव में चपत लगाई। सूर्यदेव से माफी मांगी। 48 घंटे का उपवास (निर्जला) करती थी दादी। नहा-खा, खरना, संझिया अर्घ्य, भोरवा अर्घ्य। चार दिनों का व्रत। दूसरे दिन प्रात:काल सूर्य उगने से पूर्व नहा-धोकर घाट पर अंधेरे में ही सिर पर डाला के दीए की रोशनी के सहारे सारा गांव नदी किनारे इकट्ठा हो जाता। व्रतीजन पूरब मुंह पानी में खड़े होकर सूर्य के लाल चक्के की प्रतीक्षा करते। सूर्य के उगने पर पुन: एक-एक सूप उठा-उठाकर अर्घ्य देते। सूप पर थोड़ा-थोड़ा दूध भी डाला जाता। घाट पर ही दादी प्रसाद बांटना प्रारंभ करतीं।

घाट पर मांगने वाले भी बहुत होते थे। प्रसाद मांग कर खाना भी और प्रसाद बांटना भी धर्म का कार्य ही माना जाता था। दादी जब घर लौटतीं, मां-चाची उनके पांव धोतीं, उन्हें भोजन करातीं और उनके लेटने पर उनके पांव दबातीं। मान्यता थी कि व्रती औरतों की सेवा करने पर पुण्य मिलता है और हृदय से आशीर्वाद भी। दादी कभी-कभी गिनती करातीं कि उनके परिवार और संबंधों में कौन-कौन बच्चा उनके द्वारा छठ पूजा करते हुए सूर्यदेव से मांगा हुआ है। मैंने एक बार शिकायत की, ‘दादी आप तो केवल बेटा मांगती थीं।’
मंगल चाचा बोल पड़े- ‘तुम भी सूर्यदेव की मांगी हुई हो।’ दादी ने सिर हिलाया।

दादी के गीत की एक पंक्ति थी- अन्न, धन, लक्ष्मी हे दीनानाथ अहंईं के देल। (हे दीनानाथ! अन्न, धन, लक्ष्मी आप ही का दिया हुआ है।) बाबूजी इस पंक्ति के द्वारा मुझे सूर्य की महिमा समझाते थे।
समय बदला, नदी का पानी सूख गया, लोग अपने आंगन में और कुएं पर गड्ढा खोदकर पानी भरकर छठ करने लगे। फिर वह आनंद नहीं आता था, जो नदी में एक साथ सैकड़ों महिलाओं-पुरुषों को देखकर आता था। मुझे भी गांव छोड़ना पड़ा। मैं दिल्ली आ गई। दिल्ली में बिहार के कुछ लोग मिलने आते थे। मैं उनसे पूछती थी कि यहां छठ होता है या नहीं। उन्होंने बताया कि सब गांव (बिहार) चले जाते हैं। मैंने भी सोचा कि मैं भी गांव चली जाऊंगी। बिहार के कई लोग मिलने आते थे। उनमें से एक ने कहा, ‘आप कहें, तो हम यमुना किनारे व्रत शुरू करें!’ मैंने कहा, ‘अवश्य शुरू करें। मुझे भी छठ के गीत गाने आते हैं।’ 1978 से यमुना किनारे छठ मनाई गई। केवल 20-30 लोग थे। दो परिवारों ने व्रत किया। घाट पर जंगल ही जंगल था। महाराष्ट्र का गणपति, गुजरात का गरवा, पंजाब का वैशाखी, उत्तर-पूर्व का बिहू, केरल का ओणम, बंगाल का दुर्गा पूजा, सभी त्योहार देशभर में झमकने लगे थे। बिहार में छठ पूजा युगों-युगों से होती थी। बिहारियों का कदम दिल्ली की ओर बढ़ रहा है। यहां भी छठ को झमकाना चाहिए। धीरे-धीरे बात जमने लगी। कुछ संगठन इसके लिए काम करने लगे। उन्होंने घाट की सफाई, डगरा, सूप, दौरा सहित बहुत-सा सामान दिल्ली मंगवाना शुरू किया। धीरे-धीरे दिल्ली, मुंबई, जहां-जहां बिहारी गए, वहां-वहां उन्होंने छठ पर्व को झमका दिया। इससे अन्य राज्यों के लोगों को भी सूर्य पूजा की जानकरी हो गई।

दो महीने पहले मैं गोवा आई। पता चला कि यहां भी बिहार के लोग कम नहीं हैं। गोवा में कुछ लोग मिलने आए। वे छठ के लिए बिहार नहीं जाते हैं। पूछने पर पता चला कि कुछ लोग सागर बीच पर और कुछ लोग नदी में भी व्रत करते हैं। गोवा के राजभवन के किनारे खड़ी होकर प्रतिदिन मैं सूरज को समुद्र में डूबते देखती हूं। समुद्र और सूरज का गहरा संबंध है। मिथक कथा के अनुसार सूर्यवंशी सगर के सौ पुत्रों ने सागर की खुदाई की थी। त्रेता युग में सूर्यवंशी राम ने लंका जाने के लिए पुल बनाते समय जब सागर को ललकारा था- विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होई न प्रीति॥ सागर प्रकट हुआ। राम को उनका वंशज होने का स्मरण ही नहीं दिलाया, पुल बनाने का गुर भी बताया। सागर सामने पसरा है। उसे देखकर मन में यह विचार आता है कि कठौता भर ही जल क्यों न हो, जल में खड़े होकर ही सूर्य की पूजा करने का विधान स्मरण दिलाता है कि सूर्य और जल का अटूट रिश्ता है। इस बार गोवा में ही छठ मनाने का निश्चय किया। शाम और सुबह भी घाट पर जाऊंगी। दादी ने ढेर सारे गीत सिखाए थे। अब तक उन्हीं के लहजे में गुनगुनाती और गाती हूं। इस बार गोवा के घाट पर भी गाऊंगी। कितने अर्थवान हैं ये गीत। व्रती महिलाएं सूर्य से वार्तालाप करती हैं। सूर्य उनकी मांगपत्र को सुनकर प्रमाणपत्र देते हैं- एहो जे तिरिया सभे गुण आगर, सबकुछ मांगे समतुल हे। एक गीत में व्रती महिला के मांगने पर सूर्य भगवान उसे पुत्र देते हैं। परंतु आगाह करते हैं- देवे के त देलिअउगे बांझिन, गरव जनि बोल, गरव से बोलवे गे बांझिन, उहो लेबो छीन। गीतों में बेटी भी मांगी जाती है। छठ के समय स्वच्छता और पवित्रता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। काश! हम उस स्वच्छता और पवित्रता को अपने जीवन का अभ्यास और संबल बना लेते।नदी, तालाब, कुआं और आंगन में छठ पूजा देखी थी। अब देखती हूं, समुद्र में छठ पूजा का कैसा आनंद आता है। आस्था कितनी गहराती है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

~ 28 अक्टूबर , 2014

मेरा गांव – मेरा देस – मेरी दिवाली :))

एक बार फिर दिवाली आ गया ! हर साल आता है ! यादों का मौसम एक बार फिर आया ! अभी अभी पटना से लौटा हूँ – कई लोग फिर से बोलने पूछने लगे – ‘दिवाली में भी आना है ?’ अरे ..मेरे भाई ..हम पेटभरुआ मजदूर हैं ..कहाँ इतना पैसा बचाता है कि ..हर पर्व त्यौहार में घर-गाँव जा सकें !
स्कूल में पढते थे ! कई दिन पहले से सड़क पर् ईट लगा के चौकी पर् ‘पड़ाका’ ( पटाखा ) बिकता था ! स्कूल से लौटते वक्त उन पडाकों को मन भर देखना – दोस्तों से तरह तरह के ‘पडाकों’ के बारे में बात करना – खासकर ‘बम’ ..एटम बम ..बीडिया बम.. हई बम ..हौऊ बम – सड़क पर् लगे चौकी पर् चादर बिछा कर पठाखे को देख उनको एक बार छूना …! फिर ..घर में पिछले साल के बचे पटाखे खोजना और उनको छत पर् चटाई बिछा करने धूप दिखाना ! उफ्फ़..वो भी क्या दिन थे !
दिवाली के एक दो दिन पहले से ही .खुद को रोक नहीं पाते ..कभी बालकोनी तो कभी छत पर् जा कर एक धमाका करना और उस धमाके के बाद खुद को गर्वान्वीत महसूस करना ! फिर ये पता करना की सबको पता चला की नहीं ..मैंने ही ये धमाका किया था 🙂 कार के मोबील का डब्बा होता था – उस तरह के कई डब्बों को दिवाली के दिन के लिये जमा करना और फिर दिवाली के दिन उन डब्बों के नीचे बम रख उनको आसमान में उडाना 🙂

धनतेरस के दिन दोपहर से ही ‘बरतन’ के दूकानदारों के यहाँ भीड़ होती थी – जो बरतन उस दिन खरीदाता वो ‘धनतेरस वाला बरतन’ ही कहलाता था ! अब नए धनीक बैंक से सोना का सिक्का खरीदते हैं – तनिष्क वाला डीलर धनतेरस के दिन राजा हो जाता है ! पब्लिक दुकान लूट लेता है !

दीया का जमाना था – करुआ तेल डाल के – स्टील के थरिया में सब दीया सजा के घर के चारों तरफ दीया लगाना  ! इस काम में फुआ – बहन लोग आगे रहती थीं – हमको इतना पेशेंस नहीं होता ! बाबु जी को कभी लक्ष्मी पूजन में शरीक होते नहीं देखा – मा कुछ आरती वैगरह करती थीं – हम लोग इतने देर बड़ी मुश्किल से खुद को रोक पाते ! पूजा के बाद लड्डू खाया और फरार !

कॉलेज गया तो – ‘फ्लश’ ! एक दोस्त होता है – पंडित ! बेगुसराय का पंडित ! बहतर घंटा लगातार ‘फ्लश’ का रिकॉर्ड – पंडित  के चक्कर में ! बहुत बड़ा करेजा था उसका ! अब तो रिलाइंस में मैनेजर है – लेकिन कॉलेज के ज़माने उसके दबंगई का कोई जोड़ नहीं ! दिवाली के दस दिन पहले से ही पंडित के यहाँ कॉलेज के सभी  वेटरन जुआरी सीनियर – जूनियर पंडित के कमरे में पहुँच जाते ! पब्लिक के जोर पर् ‘नेता’ भी शामिल होते ! हमारा पूरा गैंग ! हंसी मजाक और कभी कभी मामला काफी सीरिअस भी ! हारने पर् हम अपना जगह बदलते या फिर कपड़ा भी – यह बोल कर की – यह ‘धार’ नहीं रहा है ! 🙂 कई दोस्त इस दिन गर्ल्स होटल के पास मिठाई और पटाखे के साथ देखे जाते ! 🙂

बचपन में दीवाली की रात कुछ पटाखे ‘छठ पूजा’ के लिये बचा कर रखना – और फिर अगले सुबह छत पर् जा कर यह देखना की ..पटाखे के कागज कितने बिखरे पड़े हैं 🙂 अच्छा लगता था !

नॉएडा – गाजियाबाद आने के बाद – मुझे पता चला की – इस दिन ‘गिफ्ट’ बांटा जाता है ! अब मुझ जैसे शिक्षक को कौन गिफ्ट देगा 🙂 खैर , बिहार के कुछ बड़े बड़े बिल्डर यहाँ हो गए हैं और पिछले साल तक दोस्त की तरह ही थे – सो वो कुछ कुछ मेरी ‘अवकात’ को ध्यान में रखते हुए – भेज देते थे 🙂 घरवालों को भी लगता कि हम डू पैसा के आदमी हैं 🙂 लेकिन ..इस गिफ्ट बाज़ार को देख मै हैरान हूँ ! मेरा यह अनुमान है की कई ऐसे सरकारी बाबु हैं – जिनको दिवाली के दिन तक करीब एक करोड तक का कुल गिफ्ट आता है !  जलन होती है – पर् सब दोस्त ही हैं – सो मुह बंद करता हूँ 😉 वैसे इनकम टैक्स वाले अफसर भाई लोग को ‘१-२ लाख’ का जूता तो मैंने मिलते देखा है ! मालूम नहीं ये जूता कैसे चमड़ा से बनता है 😦

इस बार मै भी धनतेरस में एक गाड़ी खरीदने का सोचा था ! डीलर भी उस दिन देने के मूड में नहीं था ! कोई नहीं – अगला साल ! पटना के फेमस व्यापारी अर्जुन गुप्ता जी जो मेरे ससुराल वालों के काफी करीबी हैं – कह रहे थे – नितीश राज में हर धनतेरस को लगभग ४०-५० टाटा सफारी बिकता है !

01.11.2010 / दालान

पोंच …

जाड़ा आ ही गया ! मेरे बिहार में जाड़ा के आते आते ही आपको गली – गली में हर चार कदम पर ‘अंडा’ का दूकान मिल जाएगा । – चार वर्ष का बच्चा से लेकर सत्तर साल के बुढा तक दुकानदार मिल जाएगा – इसी उम्र का खाने वाला भी ! एक ठेला पर सजा हुआ ‘अंडा’ – बगल में एक किरासिन स्टोव पर अलुमिनियम तसला में उबलता हुआ – ‘अंडा’ ! झप्पू भईया का हीरो हौंडा रुका – बाईक पर बैठल बैठल चार ठो ‘उबला हुआ’ अंडा का ऑर्डर ! अभी वो ‘अंडा’ छील ही रहा है – तब तक झ्प्पू भईया बोले – दू ठो ‘पोंच’ बनाओ ! अंडा वाला स्टोव में – दे पम्प – दे पम्प ! झ्प्पू भईया भी एक दम स्टोव की तरह ‘हाई कान्फिडेंस’ में ! अभी झ्प्पू भईया एक उबला हुआ अंडा खाए ही की उधर से ‘चिम्पू’ भी टहलता हुआ – दू ठो ‘पोंच’ उसके लिए भी ऑर्डर हुआ – अब वो झ्प्पू भईया के पैसा से ‘पोंच’ खा रहा था – मन ही मन खुश – कैसा जतरा है – मुफ्त में दू ठो ‘पोंच’ मिल गया ! अब उसका धर्म बनता है – झ्प्पू भईया का बड़ाई – अब चिम्पू पोंच का पैसा पैसा ..बड़ाई कर के चुकता करेगा – भईया ..आपका हीरो होंडा गजब …भईया आपका चप्पल गजब …भईया ..आपका घड़ी गजब ! झ्प्पू भईया भी समझ गए …चलते चलते …एक – एक और ‘पोंच’ का ऑर्डर हुआ !
मेरे बिहार में ‘पोंच’ का फैशन है – जिसको बाकी के भारत में ‘हाफ फ्राई’ कहते हैं ! ‘पोंच’ को एक मध्यम आकार के ‘कलछुल’ में घी या करुआ तेल में बनाया जाता है ! कई भाई बंधू जो एक बार में छः ‘पोंच’ खड़े खड़े डकार लें – उन्हें उनके मित्र मंडली में ‘पोंचवा’ की उपाधी दी जाती है ।
~ दालान / १२.११.२०१३

गोभी … :))

फूलगोभी की इस तस्वीर को देख आप मक्खन भूल जाएंगे । सीजन आ गया है । सुबह सुबह नहा धों कर , हल्का गीला गरम भात पर दो चम्मच घी और ‘ गरम गरम गोभी आलू ‘ का सब्जी । उसके बाद रोजी रोटी कमाने निकल जाइए ।


गोभी जबरदस्त कमजोरी है । सालों भर चाहिए । अब वो १०० रुपए किलो मिल रहा है या रुपैया का एक किलो – कोई फर्क नहीं पड़ने वाला ।
नया नया नोएडा गया था । सुबह सुबह नाश्ते में घी से लथपथ दो पराठा और छोटी थाली / छिपली में गरम गरम आलू गोभी का सब्जी , हरा धनिया डाला हुआ । मस्त नाश्ता के बाद । बजाज चेतक पर दे किक …दे किक ।
आलू गोभी की भुजिया भी बेहद पसंद । मेसरा में पढ़ता था – हॉस्टल नम्बर 5 के मेस में , साढ़े चार रुपया में , बड़का कढ़ाही से , छनौटा से गरम गरम फ्रेंच फ्राय जैसा भुजिया । भर पेट खाइए और चैन से सिंगल रूम में एक नींद । नवंबर के महीना में , भागलपुरी अंटी चादर ओढ़ । मेरे जेनेरेशन में कहा जाता था कि मणिपाल और मेसरा में लोग पढ़ने कम और खाने ज्यादा जाता था । हा हा हा ।
नॉन वेज छूट गया है । निल । बस कभी कभार अंडा , वो भी प्रोटीन के लिए । आजकल एकदम सात्विक भोजन का मन करता है ।
रात में गोभी पराठा । अभी गांव गया था तो एक रात मस्त पराठा । थोड़ा जला हुआ तावा पर – बड़का बड़का गोभी पराठा । इस सीजन आपके किचेन गार्डन में गोभी के फूल नहीं निखर रहे , फिर सब बेकार । सुबह सुबह किचेन गार्डन में टहलते हुए – हां जी , ये वाला फूल खिल रहा है , आज भात दाल पर इसी फूल का ‘ बचका ‘ बनेगा । एकदम सरसों के तेल में छनाया हुआ – गोभी का बचका । खाइए और खटिया धर लीजिए , बरामदा में । सब कुछ लौट आएगा लेकिन यह वक़्त / मौसम और मिजाज़ कहां से लौटेगा ।
वैसे भी 2019 खत्म होने में बस पौने दो महीना रह गया है । अब , सब नया काम 2020 से शुरू होगा ।
तब तक जाड़ा का आनंद लेने दीजिए … :))
~ रंजन / दालान / 07.11.2019

सोच …फुर्सत में अवश्य पढ़ें

लिखने से पहले ..मै यह मान के चल रहा हूँ …मेरी तरह आप भी किसी स्कूल – कॉलेज में पढ़े होंगे – जैसी आपकी चाह और मेरिट या परिस्थिती ! अब जरा अपने उस ‘क्लास रूम’ को याद कीजिए – चालीस से लेकर सौ तक का झुण्ड – कुछ सीनियर / जूनियर को भी याद कर लीजिये ! “एक क्लासरूम में लगभग एक ही मेरिट के विद्यार्थी – पर सबका मकसद अलग अलग ..:)) “
किसी को पढने में मन लगता है तो वह अपने मन लगाने के लिए पढ़ रहा है – किसी के खानदान में सभी पढ़े लिखे हैं – इसलिए वो पढने आ गया – नहीं पढ़ेगा तो लोग क्या कहेंगे – किसी को पढ़ लिख के नौकरी पकड़ना है – इसलिए वो पढ़ रहा है – कोई अपने परिवार का प्रथम जो ग्रेज्युएट होने जा रहा – इसलिए वो भी है – किसी को टॉप करना है तो वो प्रथम बेंच पर बैठा हुआ है – कोई ज्ञान के लिए पढ़ रहा है – भले पास करे या फेल -कोई मेरी तरह भी-नहीं पढ़ेगा तो बढ़िया कुल खानदान में बियाह नहीं होगा टाईप 😂
मेरिट एक – वातावरण एक – बस मकसद / सोच अलग अलग – पुरी ज़िंदगी की दिशा और दशा ही बदल गयी – वही पढ़ाई पढ़ के कोई कम्युनिस्ट का नेता बन गया तो कोई टाटा संस में वाईस प्रेसिडेंट ( विनोद मिश्र और गोपालकृष्णन दोनों आईआईटी – खड़गपुर से सत्तर के दसक में साथ साथ पढ़े ) ! कई बार वो मकसद / सोच जिन्दगी के बीच राह में बदल भी जाती है ! एक बहुत ही करीबी मित्र से यूँ ही गप्प हो रही थी – बहुत ही बढ़िया कूल खानदान का और विश्वस्तरीय स्कूल कॉलेज से पढ़ाई – कहने लगा ‘शौक’ के लिए पढ़ा – पढ़ते वक़्त कभी लगा ही नहीं – पैसा भी कमाना लक्ष्य है – जिस प्रथम दिन नौकरी के लिए जाना था – बाथरूम में फूट – फूट कर रोया !
अपने जीवन की एक छोटे हिस्से की बात बताता हूँ – बंगलौर में नौकरी करता था – यह पता था – आज नहीं तो कल वापस लौटना है – और जब लौटना ही है – फिर क्यों न वह ज़िंदगी जी लो – जो शायद पटना में नहीं मिले – सुबह कंपनी – दोपहर कर्नाटका सेक्रेटेरियेट में भोजन – शाम एमजी रोड – और वीकएंड सुबह इंडियन कॉफ़ी हॉउस में डोसा ..जी भर जिया …आज से 18-19 साल पहले – जितनी मेरी क्षमता उससे बड़ी ज़िंदगी मैंने जी – उस हद तक जी की अब कोई प्यास नहीं ! मकसद ही अलग था ! दिल्ली गया – पिता जी का दबाब – फिर से नौकरी करो – जब वहां गया – एक ही महिना में खुद के लिए फ़्लैट खोजने लगा – बीआईटी – मेसरा की बढ़िया नौकरी छोड़ दी – लगा वापस रांची चला गया – दिल्ली या आसपास अपना फ़्लैट नहीं हो पायेगा – चाईल्ड साइकोलोजी – बड़े लोगों का महानगर में अपना फ़्लैट होता है ! जिस साल रजिस्ट्री करवाया – दिल्ली से आधा मोहभंग – और जिस दिन लोन चुकता किया – पूरा मोहभंग – मकसद ही अलग था – कभी किसी को यह नहीं बताया – मै नॉएडा के एक बेहतरीन कॉलेज में प्रोफ़ेसर हूँ – मकसद प्रोफ़ेसर बनना था ही नहीं !
कौन गलत है और कौन सही है – कहना मुश्किल है ! दरअसल हम इतनी छोटी दुनिया से आते हैं और अपने हाथ में एक सामाजिक स्केल लेकर बैठ जाते हैं और उसी स्केल से हर किसी को नापने लगते हैं ..
उसी पद पर बैठ – लालू / राबडी ने सामाजिक न्याय का रथ चलाया – उसी पद पर बैठ नितीश विकास की बात सोचे – उसी पद पर बैठ वर्तमान मुख्यमंत्री अलग बात कह रहे हैं – सबका मकसद अलग अलग – कल कोई और आएगा – उसका मकसद अलग होगा !
और यह मकसद – उसके आंतरिक व्यक्तित्व से निकलता है …:))

मुझे ऐसा लगता है – ज़िंदगी या किसी भी अन्य चीज़ के लिए ‘सोच’ के तीन आधार है – १) ईश्वरीय देन २) परिवेश / खून ३) वर्तमान – अब इन तीनो में जो कुछ आपके उस सोच पर हावी होगा – वैसे ही आपके एक्शन या प्लान होंगे !
यह ईश्वरीय देन है जिसके कारण एक ही परिवेश / एक ही कोख से जन्मे / एक ही वर्तमान में जी रहे
दो लोग ज़िंदगी के प्रती अलग अलग सोच रखते हैं या अपना मकसद बनाते हैं ! हर एक इंसान को ईश्वर एक अलग सोच देकर इस धरती पर भेजता है ! उस सोच को आप बदल नहीं सकते – अगर आपको लगता है – आपकी कोई एक ख़ास सोच गलत है – फिर उसको बदलने के लिए बहुत ही कठोर साधना की जरुरत होती है – जिसे हम मन का निर्मलता भी कह सकते हैं ! जैसे अलग अलग जानवर अपनी अलग अलग विशेषता के लिए जाने जाते हैं – ठीक वैसे ही इंसान भी है – अब ईश्वर ने आपकी सोच भेड़िया वाला बना के भेजा है फिर आप शेर की तरह वर्ताव नहीं कर सकते – ईश्वर ने आपका दिल चूहा वाला दिया है – फिर आप हमेशा एक डर में जियेंगे – यह कोई समाज या परिवेश नहीं बदल सकता है – यह इंसान अपनी असीम ‘विल पावर’ से बदल सकता है – इसी तरह सकरात्मक सोच भी होते हैं – जिसका फायदा इंसान अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक उठाता है !
दूसरा महत्वपूर्ण है – परिवेश – आप किस परिवेश में पले बढे हैं – मेरी बड़ी दादी कहती हैं – आदमी कहीं भी चला जाए – जहाँ का जन्मा होता है वह उसके साथ हमेशा रहता है ! मेरे एक दोस्त है – काफी वर्षों से बाहर ही सेटल है – बचपन का नहीं पर बचपन जैसा ही है – जब कभी पटना आएगा – मै फोन करूंगा – मुलाक़ात होगी ? उधर से जबाब – गाँव जा रहा हूँ – बेटी को बकरी / देसी गाय का दर्शन करवाना है – उसके पिता भी भारत सरकार से रिटायर है – किताबों के जबरदस्त शौक़ीन – घर में ट्रंक के ट्रंक किताब – एक दिन पूछा – तुम्हारे ..पापा का क्या हाल है …दोस्त का जबाब आया …गाँव गए हुए हैं ..तोडी / सरसों तुडवाने …:)) अब सोचिये …एक इंसान प्रिंस स्टाईल जीवन …खेतों में घुसा हुआ – यह परिवेश ..खून का असर है …मै जिस समाज से आता हूँ – वहां का लड़का हारवार्ड में भी टॉप करके – अगर बिहार आया तो वो एक नज़र अपने खेतों को जरुर देखना चाहेगा – अगर नहीं देख पाया तो उसका हिसाब किताब जरुर लेना चाहेगा …:))
जीवन के सोच को लेकर – परिवेश का बहुत महत्व है – कई बार मै उस तरह के इंसान से बहुत नजदीक हो जाता हूँ – जिसका परिवेश / लालन पालन मुझ जैसा हुआ हो – जिसको हम ‘बेसिक क्लास’ कहते हैं – आप कहीं भी चले जाएँ – आपका बेसिक क्लास क्या है – वही क्लास आपके संबंधों को मधुर या ज़िंदा रखेगा और इस बेसिक क्लास का आपके वर्तमान वैभव से / वर्तमान कठिनाई इत्यादी से कुछ नहीं लेना देना होता है !
एक और अनालौजी देना चाहूंगा – मै जब नॉएडा में पढ़ाने लगा तो देखा एक क्लास में तीन तरह के विद्यार्थी हैं – प्रथम जो दिल्ली या आस पास के हैं – दूसरी या तीसरी पीढी दिल्ली में सेटल है – दुसरे लखनऊ या आस पास बड़े शहर से हैं और तीसरे जो पूर्वी हैं ! अब तीनो ग्रुप एक ही क्लास – एक ही शिक्षक – एक ही सिलेबस – पर तीनो ग्रुप का जीवन के लिए अलग अलग गोल ! पहला ग्रुप – सेकेण्ड ईयर से ही अमरीका / यूरोप के बेहतरीन कॉलेज में पीजी में एडमिशन के लिए तैयारी – लखनऊ या आस पास बड़े शहर वाले – किसी मल्टीनेशनल में किसी तरह से नौकरी हो जाए – मिल गया – शर्ट का दो बटन खोल कैपस में घूम रहा ! तीसरा पूर्वी वाला – पब्लिक सेक्टर / सरकारी नौकरी के लिए बेचैन – हर बार समझाया – यार ..मेरिट है …फुल स्कॉलरशिप मिल जायेगी – जीआरआई दो – अब वो ऐसे परिवेश से आते थे – उनकी हिम्मत नहीं हो पाती – अब अगर उनको कैम्पस में किसी मल्टीनेशनल में नौकरी मिल गयी – वो उदास है – क्यों भाई ..क्यों उदास हो …पिता जी को क्या बोलेंगे …नौकरी सरकारी थोड़े न है …हा हा हा हां ….:))
आपका परिवेश …आपका जड़ ..आपकी सोच को किस हद तक प्रभावित करता है …कभी सोचियेगा .:)

मैंने बहुत पहले दालान ब्लॉग पर लिखा था – आखिर वो कैसी घड़ी रही होगी – जब एक बैरिस्टर ‘मोहन दास करम चंद् गांधी’ को “महात्मा गांधी” बनने को मजबूर किया ! ट्रेन से सामान फेंकने की घटना तो न जाने कितने और अश्वेत के साथ भी हुई होगी – पर सब के सब तो महात्मा गांधी नहीं बन पाए !
वाल्मीकि / गौतम बुद्ध / गैलेलियो / अरिस्टो / प्लेटो / महात्मा गांधी और वो सभी जो काल की सीमा तोड़ अपनी पहचान बना सके – सबके के उस वर्तमान जीवन में कोई न कोई ऐसी घटना जरुर हुई जो उनकी पुरी दिशा बदल दी ! पर असल सवाल यह उठता है – ऐसी घटना तो बहुतों के जीवन में भी होता आया होगा या है – सब तो वो नहीं बन पाते !
अब अगर मै एक आधी रात उठ – सत्य की तलाश में – घर छोड़ निकल जाऊं – क्या मै भी गौतम बुद्ध बन सकता हूँ ? …:)) क्या मै भी हजारों साल तक ज़िंदा रह सकता हूँ ?…:))
फिर वो क्या चीज़ है ..जो इनको महान बनाया ! इस बात पर एक मित्र से बात किया – उसने कहा जो मेरा भी मानना है – जिज्ञासा ! आपके अन्दर कितनी जिज्ञासा है और वो कैसी जिज्ञासा है ! सेब तो किसी के भी माथे पर गिर सकता है – पर वो सेब नीचे ही क्यों गिरा – यह एक जिज्ञासा न्यूटन को अमर कर दिया ! ट्रेन से सामान कितनो का फेंका गया – पर ऐसा क्यों – महात्मा गांधी बना दिया ! हर कोई पाप करता है – अपने परिवार के भरण पोषण के लिए – कोई अंगुलीमाल डाकू से ऋषी नहीं बन पाया !
कोई एक घटना – मामूली ही – इतने जोर से अन्दर धक्का देती है – जैसे ज्ञान का फव्वारा खुल पड़ता है – पर याद रहे – जैसे – एक बंद पाईप से पानी बह रहा है – और आप उस पाईप को कहीं से छेद कर दे या काट दें – फव्वारा वहीँ से खुल जाएगा – शर्त है …उस पाईप के अन्दर पानी बहता होना चाहिए …..:))
हाँ …जिसके अन्दर वो जिज्ञासा शुरू से होती है …उसी को कोई घटना …उसकी समझ खोल सकती है …अगर जिज्ञासा नहीं है …फिर बड़ी से बड़ी घटना भी जीवन के छोटे से रहस्य को खोल नहीं सकती …
थैंक्स ….:)))
~ रंजन ऋतुराज / 3,4,5 नवम्बर 2014

रंजन ऋतुराज / नवंबर , 2016

मिर्च ही मिर्च …

तीखी मिर्ज …

मिर्च की इतनी वैराईटी देख मन खुश हो गया । मां की याद आई । उनके खाने में आग में सेका हुआ मिर्च अवश्य होता था । फिर अपना बचपन याद आया – रगड़ा चटनी । लहसुन और हरा मिर्च का चटनी । आह । दिन में चावल दाल के साथ रगड़ा चटनी ।
मेरे ससुराल में मिर्च की जबरदस्त खेती होती है। अजीब किसान है – मंगरैला , सौंफ , मिर्च यही सब की खेती । लेकिन उनके हाता में सूखते लाल मिर्च अच्छे लगते थे। मेरे अनुज है – बॉबी बाबू , सिविल सर्वेंट है । आ गए नोएडा – बोले – भाई जी , आज मटन हम बनाएंगे । हरा मिर्च और लहसुन का जबरदस्त पेस्ट बनाए और मटन बनाते बनाते गरम मसाला डालना भूल गए । हा हा हा ।
मिर्च के बारे में कहा जाता है – जो जितनी छोटी , वो उतनी ही तीखी । अब लोग अपने गमले में मिर्च लगाने लगे हैं । हम कभी बाज़ार गए तो सब्जी विक्रेता से पूछते है – यह मिर्च कितनी तीखी है । उसने कहा – बहुत तीखा । हम बोलते है – रहने दो । हा हा हा । अब बताइए – मिर्च की विशेषता तो इसी में है न …वो कितनी तीखी है ।
हम मिर्च का आँचार बढ़िया बना लेते है। एक हॉर्लिक्स का खाली बोतल / डब्बा लीजिए । उसको दे सर्फ ..दे सर्फ बढ़िया से साफ कीजिए । फिर हरे मिर्च का पेट हल्का काट के उसको उस डब्बे में डालिए । दो चार नींबू को काट कर उसमे डालिए । फिर थोड़ा अदरक । धूप में पांच छह दिन सूखा दीजिए । मस्त सेक्सी हरे मिर्च का अंचार तैयार । दाल भात पर मस्त खाइए ।
कभी कभी सोचते हैं – नौकरी चाकरी नहीं रहेगा तो मिर्च का अचार बना के बेचेंगे । घर घर – दिन में ।
हा हा हा … अब किसान परिवार से आते हैं तो यहीं सब न फोटो डालेंगे ।
खैर , आज भी प्रतिदिन मेरे मुख्य भोजन में एक हरा मिर्च अवश्य होता है ।
~ रंजन / दालान / 04.11.2019

इंदिरा जी …

आज स्व श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत दिवस है ! आज से ठीक २९ साल पहले श्रीमती गांधी की हत्या कर दी गयी थी ! तब हम हाई स्कूल में होते थे – घर में कोंग्रेसी वातावरण होता था ! घर के “दालान” में श्रीमती गांधी के अलावा महात्मा गांधी / नेहरू / राजेन बाबू इत्यादी की तस्वीरें होती थी – फ्रेम की हुई ! चाईल्ड साइकोलॉजी – यही आदर्श बन गए – तब जब उनमे से एक उस वक़्त देश का प्रधानमंत्री हो ! मै उनका बहुत ही बड़ा फैन हुआ करता था – उसकी एक वजह थी – एक बचपन से अपने दादा जी की साइकिल हो या लाल बत्ती कार – जब तक स्कूल में रहा – खूब घुमा – जब बाबा के साथ राजनीतिक लोगों के यहाँ जाता – लोग नेहरू – इंदिरा का उदहारण देते और मै खुद में श्रीमति गांधी की छवी देखता – “पिता का पत्र पुत्री के नाम ” एवं “वानर सेना” की कहानियां बहुत लुभाती थी – जो हम स्कूल में पढ़ते थे !
सन चौरासी के फरवरी महीने में कांग्रेस के सीनियर लोगों की एक मीटिंग होने वाली थी – दिल्ली में ! अपने बाबा के साथ मै भी हो चला ! तब हम सभी २६ , महादेव रोड ठहरे थे – वह जगह थी हमारे इलाके के लोकसभा सांसद शहीद नगीना राय का डेरा – अगले दिन मीटिंग थी – सुबह से हम भी ज़िद पद अड़ गए – कई लोग समझाए – तुम उब जाओगे फलाना ढेकना – अब हम कहाँ मानने वाले – दिल्ली आये ही थे – प्रधानमंत्री से मिलने – बिना मिले कैसे चले जाएँ 😦 खैर सभी लोग मान गए – जबतक लोग तैयार होते – हम भाग के प्रगति मैदान से एक सौ रुपैया में कैमरा खरीद लाये – ब्लैक & व्हाईट इंदु फिल्म्स के साथ ! तब बड़े बड़े लोकसभा सांसद इत्यादी भी अपनी कार नहीं रखते थे – सभी लोग ऑटो से मीटिंग के तरफ निकले ..:))
वहाँ पहुँचने पर अद्भुत नज़ारा था – बाबा सभी बड़े कोंग्रेसी से परिचय करा रहे थे – सबको पैर छू कर प्रणाम कीजिये – आशीर्वाद लीजिये ! पोर्टिको में खड़ा थे – तब तक तीन ऐम्बैसडर कार तेज़ी से आयी – सभी लोग सतर्क हो गए – अंतिम कार से अपने सर साड़ी का पल्लू को सम्भालते श्रीमती इंदिरा गांधी – मैंने अपना पूरा रील वहीँ खाली कर दिया और वो जैसे ही पास आयीं – पैर छू एक आशीर्वाद लिया …:)) एक हाईस्कूल के बच्चे के साफ़ दिमाग में जो खुछ घुस सकता था – घुस गया – आजीवन के लिए :))
उसी साल उनसे दूसरी मुलाकात हुई पटना में – उनकी मृत्यु से ठीक पंद्रह दिन पहले – पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में – तब जब बिहार के प्रथम वित्त मंत्री श्री अनुग्रह नारायण सिंह के छोटे पुत्र श्री सत्येन्द्र बाबू वापस कांग्रेस ज्वाइन कर रहे थे – दिन था – सोलह ओक्टूबर – हम कहाँ मानने वाले थे – स्टेज से बिलकुल सटे हुए कुछ कुर्सीयां रखी हुई थी – बाबा अन्य नेताओं के साथ पीछे बैठे थे – और हम सांसदों के बैठने वाली कुर्सी पर – किसकी मजाल जो मुझे उठा दे ..:)) अबोध मन …लगा …जब श्रीमती गांधी के नज़दीक रहूंगा – वो शायद पहचान लेंगी – यह वही लड़का है …जो फरवरी में मुझसे मिला था …:)) सचमें ..एक मन क्या क्या सोच लेता है …:))
इस मुलाक़ात के पंद्रह दिन बाद उनकी हत्या हो गयी …उसके बाद राजनीति में बहुत बदलाव आया …इसपर क्या टिपण्णी करूँ …पर मेरा यह पुरजोर मानना है …चाईल्ड साइकोलॉजी पुरे जीवन पर शासन करती है …
श्रीमति गांधी को श्रद्धांजली !!

रंजन , दालान

31.10.2013

आम्रपाली …

वैजयंती माला

“इतने बड़े महल में , घबराऊँ मैं ‘बेचारी’ ” ।
इस गीत में जब लता मंगेश्कर की आवाज़ वैजयंती माला के होंठ से , तब जब वो जिस अदा से ‘बेचारी’ बोलती हैं , कसम से दिल पर कोई छुरी नही चलती है , लगता है जैसे इस मासूम दिल को कोई रेंत रहा है …उफ्फ्फ । ऐसे जैसे दिन भर ये दिल रेंत वाने को ही बना है । रेंत लीजिए , आपका ही दिल है । रख लीजिये , आपका ही दिल है टाईप फीलिंग आने लगता है ।
सिनेमा के रिलीज़ के वक़्त मेरे पिता जी प्लस टू में रहे होंगे और अभी मेरे बच्चे प्लस टू में आ गए लेकिन मेरे मन से ये गीत न कल गया , न आज गया और न कल जायेगा ।
निर्देशक लेख टंडन महान थे , इस सिनेमा की कॉस्टयम डिजाईनर भानु अतथैया ने कॉस्टयम डिजाईन को समझने के लिए कई दिन अजंता और एलोरा की गुफाओं में गुजारा । शायद एक महिला ही दूसरे महिला की खूबसूरती को समझ सकती है , वर्ना हम पुरुष तो यूँ ही बदनाम रहते हैं ।
बाकी थोड़ा बहुत ‘गुन्डा’ तो हर पुरुष होता है लेख टंडन , रंजन ऋतुराज ही हो गए तो कौन सा पहाड़ टूट गया । जो बिल्कुल भी गुन्डा नही है , वह पुरुष नही मउगा है , ऐसा हम नही हर एक ‘बेचारी’ वैजयंती माला के होंठ कहते है ।

~ रंजन / दालान / 24.10.2017

हवाई यात्रा नहीं किए हैं …

हम आज तक हवाई जहाज़ पर नहीं चढ़े हैं 😐 आपकी क़सम । जब कोई फ़ेसबुक पर हवाई अड्डा पर चेक इन करता है – कैसा कैसा दो मन करने लगता है । हमारे जैसा आदमी के अंदर हीन भावना आती है । 😐 फिर हम कल्पना करने लगते है…
बचपन में छत से एकदम ऊँचा हवाई जहाज़ नज़र आता था । छत से ही टाटा करते थे – मन भर देख भी नहीं पाते थे – दौड़ कर अजिन कज़िन को बुला कर दिखाने के चक्कर में ही हवाई जहाज़ आसमान से ग़ायब हो जाता था 😐 तब तक कोई बड़ा अजिन कज़िन का हवा शुरू – कैसे उसके नाना जी हवाई जहाज़ पर चढ़े थे , मन एकदम से चिढ़ जाता था । जलन होती थी । यहां पांच पीढ़ी में कोई हवाई जहाज पर नहीं चढ़ा और उसके नाना जी हवाई जहाज पर ही घूमते है ।
मेरा जन्म भी मिडिल में भी मिडिल और उसके भी मिडिल क्लास में हुआ 😐 ब्रह्मा जी पिछला जनम में मेरे ‘गुंडागर्दी’ से परेशान रहे होंगे , धर के बिहार के मिडिल क्लास में टपका दिए 😟 स्कूल में भी ‘बस यात्रा , रेल यात्रा , चाँदनी रात में नौका विहार ‘ इत्यादि पर लेख लिखने को आता था लेकिन कोई शिक्षक ‘हवाई यात्रा’ पर पैराग्राफ़ तक लिखने को नहीं बोला । हिन्दी स्कूल का यही दिक्कत । अंग्रेजी वालों के यहां पैराग्राफ लिखने को आता होगा । मालूम नहीं । यहां तो रेलयात्रा पर ही निबंध लिखने में हाईस्कूल खत्म हो गया ।
कॉलेज में कुछ दोस्त यार हवाई जहाज़ वाले थे । सेमेस्टर परीक्षा के बाद सबसे अंत में होस्टल छोड़ते थे और हवाई जहाज से सबसे पहले अपने घर पहुँच जाते थे । ब्रह्मा जी पर ग़ुस्सा आता था । जेनरल बॉगी में सूटकेस पर बैठ कर यात्रा करना होता था 😐

कभी कभी किसी को एयरपोर्ट पर सी ऑफ करने जाते हैं तो मन मे उदासी की कैसा दोस्त है , कभी तो बोलेगा – चलो रंजन , इस बार तुम भी हवाई जहाज पर चढ़ लो । मुंह मारी ऐसा धनिक लोग का ।
कभी कभी चार्टेड से पटना दिल्ली करने का मन । एकदम सफ़ेद ड्रेस में , सफेद बुशर्ट , सफेद पैंट और सफेद जूता और हरा ग्लास वाला गॉगल्स । घस्स से पटना हवाई अड्डा पर स्कॉर्पीओ रुका – फट फट गेट खुला , खट खट बंद हुआ । लेदर वाला पतला ब्रीफ़केस , अरमानी का गागल्स , सीधे चार्टेड के अंदर । चेला चपाटी टाटा किया । एक मुस्कान एयर होस्टेस को 😎 सीधे दिल्ली वाया लखनऊ !
~ रंजन ऋतुराज / दालान / 26.10.2016

सेंधमारी , चोरी और डकैती …

सेंधमारी , चोरी और डकैती :
बचपन का गाँव याद आता है । भोरे भोरे एक हल्ला पर नींद ख़ुलती थी । बिना हवाई चप्पल के ही बाहर भागे तो पता चला रमेसर काका के घर सेंधमारी हुआ है । 😳 नयकी कनिया के घर में अर्धचंद्रकार ढंग से दीवार तोड़ – उनका गहना ग़ायब । कोई देवर टाइप मज़ाक़ कर दिया – आया होगा कोई पुराना आशिक़ 😝 सेंधमारी का अपना अलग औज़ार होता था – बिना आवाज़ के मोटा दीवार तोड़ देना कोई मज़ाक़ नहीं । अब सेंधमारी नहीं होता है , कला विलुप्त हो गयी है । लेकिन सेंधमारी को कभी सिरीयस नहीं लिया गया । इस कला को ना तो इज़्ज़त मिली और ना ही धन ।
एक होता है – चोरी । सेंधमारी से थोड़ा ज़्यादा हिम्मत । छप्पर छड़प के घर में ‘हेल’ गए । मुँह में नक़ाब लगा कर – थोड़ा ‘मऊगा’ टाइप । अधिकतर चोर हल्की फुल्की सामान चोरी करते हैं । परीक्षा में भी चोरी । ताक झाँक से लेकर पुर्ज़ा तक । वक़्त सिनेमा में राजकुमार टाइप चोर भी – निगाहें मिलाते मिलाते रानी साहिबा का हार ग़ायब ! दिल का भी चोरी , चोर जैसा चुपक़े चुपके आहिस्ता आहिस्ता । लेकिन चोरी कैसा भी हो – कितना बड़ा भी चोरी हो – उसे सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिली । चोर अपने आप में एक गाली है – क्या ‘चोर’ जैसा मुँह बनाए हुए हो ।
एक होता है – डकैती । सुनील दत्त टाइप घोड़ा पर सवार । काला टीका । बंदूक़ के नाल पर रूपैया रख – ठाएँ । माँ भवानी किया और बीच बाज़ार उठा लिया । अब बैठ कर गीत गाते रहिए – रात है कुछ मध्यम मध्यम , वहीदा रहमान टाइप । डकैत ले गया – सब कुछ । डकैती का क़िस्सा भी थोड़ा स्टेटस वाला , स्कूल में हवाबाज़ी – मेरे घर डकैती हुआ था , बेंच पर हाथ मुँह रख ख़ूब चाव से सुनते थे । डकैत आया और दिया दो तबड़ाक ‘पुत्तु चाचा’ को । 😝 डकैत संस्कार वाले होते हैं । न्याय देते हैं । डकैती को सामाजिक इज़्ज़त है – सर सिपाही भी घबराते हैं । डकैत का ललाट चमकता है । डकैती गाली नहीं है । डकैत को गोली लगती है और चोर बँधा के पिटाता है और सेंधमार कभी पकड़ा नहीं जाता है 😎
लेकिन सेंधमारी , चोरी और डकैती तीनों का मंज़िल एक ही है – अब आप क्या करते है – यह आपके आंतरिक व्यक्तित्व पर निर्भर करता है 😝
~ रंजन ऋतुराज / दालान / 2016

ये जो अक्टूबर है .. न …

ये जो ऑक्टोबर है न …इसे शरद का वसंत भी कहते है । गोधुलि की बेला के बाद से ही हल्की ठंड की एहसास शुरू हो जाती है । तुम्हें पता है – गोधुलि की बेला किसे कहते हैं ? सूरज के ढलते ही चरवाहे अपने गाय के साथ वापस लौटते है …एक तरफ़ सूरज ढल रहा होता है और उसकी किरणों के बीच गाय के ख़ुरों से जो धूल उड़ती है …बड़ी पवित्र नज़र आती है । उसे ही गोधुलि कहते हैं …:)) हाँ …गाय के गले में बंधी घुँघरू की आवाज़ भी ..:))
पर तुम्हारे शहर में तो बड़ी कोठियाँ और लॉन होते हैं । ऑक्टोबर की शाम – बड़े लॉन में – मखमली घास पर एक बेंत की कुर्सी जिस पर तुम और …और एक कुर्सी ख़ाली …बरामदे में एक मध्यम रौशनी …और अंदर उस बड़े ड्रॉइंग रूम से बिलकुल उस मध्यम रौशनी की तरह बोस के स्पीकर से सैक्सोफ़ोन की धुन …बेहतरीन दार्जिलिंग चाय …
पर वो एक कुर्सी ख़ाली …बेंत वाली …लॉन के बीचोबीच …
अब तो ठंड भी लग रही होगी …कहो तो कुर्सी बरामदे में रखवा दूँ …उस अकेली कुर्सी को वहीं लॉन में अकेला छोड़ ….
~ RR / दालान / 25.10.2016

नवरात्र ~ ९ , २०२०

देवी

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
~ आज महानवमी और कल विजयदशमी । ढेरो शुभकामनाएं । देवी पूजन के 9 रात और शक्ति के एक रूप रचनात्मकता की पूजा के मेरे भी 9 साल ।
ढेरो सवाल आते हैं । सबका ज़बाब मुश्किल है । उम्र , अनुभव और महसूस करना – शायद इन्हीं के इर्द गिर्द आपके सभी सवाल के जवाब है ।
लेकिन मेरा मानना है कि जब तक देवी खुद आपको नहीं चुनेंगी , आप इनके रहस्य को नहीं समझ पायेंगे । मै बात देवी की कर रहा हूं ना की शक्ति की । मेरी नजर में , शक्ति पात्र के साथ है और देवी अपने पात्र के पास :)) शक्ति बिना शिव के नहीं और देवी बिना साधक के नहीं :))
इसी 9 साल में मैंने दुर्गा सप्तशती को छोड़ अनेकों दुर्गा स्तुति के संस्कृत में लेखनी पढ़े जिन्हें आप श्लोक भी कह सकते हैं , गूगल केे कारण ट्रांसलेशन भी मिला । कुल मिला कर यही लगा कि जितने भी साधक रहे वो मूलतः देवी की प्रशंसा ही किए । पूजा की शुरुआत उन्होंने मां रूप से की और अंतोगत्वा देवी की आराधना वो प्रेमी रूप में करने लगे । अब आप ललिता सहस्रनाम को ही पढ़ लीजिए , साधक देवी के इतने नजदीक हो गए की वो देवी के शारीरिक अंगों की स्तुति करने लगे हैं । यह मां रूप में असम्भव है । लेकिन यह इजाजत भी देवी हर किसी को नहीं देे सकती । यह बिल्कुल एक स्त्री और पुरुष के उस प्रेम की तरह है जो आत्मा से शुरू होकर मिलन तक जा पहुंचता है । यह आसान भी नहीं है । कठोर साधना । जब तक भाव नहीं उत्पन्न होगा – प्रेम का कोई भी रूप व्यर्थ है । आप कहां तक डूबते हैं , यह आपकी साधना तय करेगी और साधना की पराकाष्ठा आपकी आत्मा में पनप रहे पूजा रूपेण प्रेम से होगी ।
लेकिन यह एक अलग ही दुनिया है । इसका अंत कहां है – किसी को नहीं पता । नशा नहीं कह सकते क्योंकि नशा भी कभी न कभी टूटता है । यह श्रृंखला कभी नहीं टूटता । बचपन में साधकों के बारे में सुनता था । अब महसूस किया हूं । गृहस्थ जीवन में भी साधना सम्भव है और शायद इसी लिए नवरात्र का जन्म हुआ ।
लेकिन अंतोगत्वा मांगना बहुत मुश्किल है और वो भी खुद के लिए । हां , पूजा के बाद करबद्ध इंसान देवी के सामने खड़ा हो सकता है , अपने परिवार , मित्र के लिए मांग सकता है । लेकिन खुद के लिए …मुश्किल है । जो मिल जाए वही परसाद है । नहीं मिला तो पास रहने का वो क्षण ही परसाद है ।
क्योंंकि साधना के बाद साधक भी देवी के समकक्ष हो जाता है – इस भावना के साथ की अगर तुम शक्ति हो तो हम शिव है 🙏 क्षमाप्रार्थी हूं । और समकक्षों से मांगा नहीं जाता …जो मिल जाए … उसे सहज भाव से स्वीकार किया जाता है …
कुछ तो मिला ही होगा …एक नज़र ही सही । और ये क्या कम है कि एक नजर पड़ गई :))
सभी को महानवमी की ढेरो शुभकामनाएं 🙏
: रंजन , दालान 🙏❤️🙏

नवरात्र ~ ८ , २०२०

~ असंख्य शक्तियां है । आप यह नहीं कह सकते कि फलाना शक्ति ही महत्वपूर्ण है । फिर भी , हम पुरुषों को पद को लेकर बड़ी लालसा होती है । क्योंकि हम बाहरी दुनिया यानी समाज में उठते बैठते हैं । पुरुषों में यह आचरण जेनेटिक है । मुहल्ले में दुर्गा पूजा हो रही है , नवयुवक मंडली बना तो सबसे पहले पद पर फैसला होगा । हा हा हा । मुन्ना को संयुक्त सचिव पद नहीं मिला तो वो विद्रोह कर दिया । हा हा हा । सामाजिक नेतृत्व भी व्यक्तित्व/ कद के हिसाब से पद बांटता है । कई दफा यहां भी झोल । फिर भी , पद का बहुत महत्व है । स्त्रियां भी इसे ही प्रमुख समझती है । मंत्री जी का भतीजा है तो वही बढ़िया प्रेमी होगा । एक भोजपुरी गाना है – हमरा पीछे लागल बा मोछमुंडा , हीरो होंडा लेे के – लईका के नेता ह , नेता के लईका ह । मतलब की – मेरे पीछे एक एक लड़का पड़ा हुआ है जो हीरो होंडा चलाता है , फिर वो खुद विद्यार्थियों का नेता है और सबसे अच्छी बात की वो किसी नेता का पुत्र भी है । हा हा हा । स्त्री मनो विज्ञान को भी किसी पुरुष ने गीत का शब्द दिया । लेकिन यह सच है ।
~ लेकिन पुरुष का कर्तव्य हैं कि वो अपने सामाजिक पद के हिसाब से अपने कद को बढ़ाए । अब बन गए ससुर और दिन भर आंगन में खटिया पर बैठे रहिएगा , कुछ दिन बाद आप अपनी इज्जत खो बैठेंगे । जिस दिन ससुर बने , उसी दिन आंगन का त्याग कर दालान पर झोला डंडा लेकर बैठ जाइए । आपका कद भी सुरक्षित और पद की गरिमा भी । अब आप रट रटा के बहुत बडा़ अफसर बन गए और दिन भर सोशल मीडिया पर गीत , नाक में क्लिप लगा के , मउगा टाइप । एक दो दिन बाद आप अपना आकर्षण खो बैठेंगे । बहुत पुरुषों की आदत होती है , पत्नियों के सखी सहेली के बीच हाई फाई बात करने की । पहला दिन तो बढ़िया लगता है – मेरी दोस्त के पति कितने हंसमुख है , कोई ईगो नहीं इत्यादि इत्यादि और एक आप हैं इत्यादि इत्यादि । इसी बीच कुछ दिन बाद कोई हाई आइक्यू महिला रही तो बोल देगी – फलनवा के पति भारी मउग है , मुंह तक्का टाइप 😂
~ पद मिले तो अपने कद का बदलाव कीजिए । योग कीजिए । प्रकृति के बहाव पर नियंत्रण रखिए । योग का मतलब नहीं कि अर्ध नग्न फोटो इंस्टाग्राम पर डालिए – टॉय बॉय बनने के चक्कर में 😂 किसी को सुष्मिता सेन के टॉय बॉय का नाम नहीं पता । कोई अर्जुन कपूर को इज्जत नहीं देता है । मिस्टर प्रियंका चोपड़ा बउआ लगता है 😂
~ बड़ी मुश्किल से पद मिलता है । भारत में भेड़िया धसान है । लोग किसी भी पद के लिए, कोई भी राजनीति चल देते हैं । माइक्रोसॉफ्ट के सत्य नडेला लिखते हैं , माइक्रोसॉफ्ट जैसी संस्था के वीपी किसी भी वक्त एक दूसरे के पीठ पर छुरा चलाने को तैयार थे । वो अमरीका है , इसका मतलब नहीं कि वहां के पुरुष अपने प्रकृति को भूल जाएं :))
बाकी …आज महागौरी का दिन 🙏❤️🙏
: रंजन , दालान

नवरात्र ~ ७ , २०२०

~ आज सप्तमी है । बिहार में देवी का पट खुल गया होगा । सर्वप्रथम देवी पूजन हमारे घर की बहन , बेटी और बहु करेंगी । देवी का आगमन और देवियों के द्वारा स्वागत ❤️
सब कुछ तो हमारी सभ्यता से ही है । जब कोई दुल्हन प्रथम बार ससुराल आती है तो उसका स्वागत भी घर की महिलाएं ही करती है :)) कितनी अचरज की बात है कि हिन्दू धर्म के जितने भी पर्व और त्योहार है , सभी किसानों के समय को या उनके सुविधा अनुसार ही बनाए गए हैं । किसान मूल हैं ।🙏
~ मैंने देखा है लोग अपनी शक्ति से ज्यादा दूसरों की शक्ति को तौलते हैं । यह उतना उचित नहीं है । खुद की शक्ति को पहचानिए । दो वक़्त की रोटी और एक छत के बाद , इस संसार में किसी से डरने की जरूरत नहीं है । अपना पॉजिटिव प्वाइंट समझिए । अपने खुद के प्रकृति को समझिए । आप अव्वल दर्जे के फ्रॉड हैं तो यह भी एक पॉजिटिव प्वाइंट है लेकिन उस शक्ति का आदर कीजिए । हम जैसे साधुओं को जान बक्श दीजिए । रोड किनारे , स्टेशन पर , मेला में फ्राउडगिरि कीजिए । हम जैसे लोग आपको प्रणाम कर के आगे बढ़ जायेंगे। यह मेरा स्वभाव है , आप चोर हैं , चोट्टा है , फ्रॉड है – हम अपनी मूल प्रकृति के अनुसार आपको नहीं टोकेंगे जब तक कि आपकी चोर कटाई से हमको कोई फर्क नहीं पड़ता । समाज है – हर तरह के लोग है , आप भी रहिए । खुशी खुशी अपना चोर और चोट्टा के ग्रुप में ।
हमको अपना पॉजिटिव प्वाइंट पता है । निगेटिव भी पता है । किसी का आठ आना भी नहीं मारेंगे । पैसा के मामले में पक्का ईमानदार । अब खूबसूरती नजर के सामने से गुजरेगी तो कनखिया के एक नज़र देखेंगे ही देखेंगे । अब वो एक घड़ी , पेन या कोई हम उम्र बेमिसाल हो । मूल प्रकृति है । पढ़ने में मन नहीं लगा तो कभी किसी को खुद को होशियार समझ कर बर्ताव नहीं किया । भाई , हम बकलोल और आप होशियार । अब आगे बढ़िये । अब बाप दादा हाथी रखता था तो वो लिखेंगे ही लेकिन अपना पटल पर । भांट की तरह दरवाजे दरवाजे नहीं । हे हे …मौसी जी , अहं बड नीक छीये । मार साला मऊग के । किसी की यही प्रतिभा । गीत गाते गाते अंगना में ढूक गए । हा हा हा । भाई , ई सब प्रतिभा हम में नहीं 🙏
तो घुमा फिरा के कहने का मतलब की आप अपने मूल प्रकृति को समझिए । मूल शक्ति वही है । आपका स्वभाव । वहीं से आपको इज्जत मिलेगी या बेइज्जती । बड़का फ्रॉड तो बड़का फ्रॉड के समूह में जाए – बहुत इज्जत मिलेगी । साधु के ग्रुप में जायेंगे तो बेइज्जती मिलेगी । बड़का साधु हैं तो साधु के समाज में रहे , वहीं इज्जत मिलेगी । फ्रॉड के समाज में जायेंगे तो गाली मिलेगी । देख साला साधु को , बैठ कर खाता है । हा हा हा ।
क्योंकि शक्ति का एक मंज़िल – सामाजिक प्रतिष्ठा भी है :))
: रंजन , दालान

मेरा गांव – मेरा देस – मेरा दशहरा

हर जगह का ‘दशहरा’ देखा हूँ 🙂 मुज़फ्फ्फरपुर –  रांची – पटना – गाँव – कर्नाटका – मैसूर – नॉएडा -गाज़ियाबाद 🙂
गाँव में बाबा कलश स्थापन करेंगे ! हर रोज पाठ होगा ! बाबा इस बीच दाढ़ी नहीं बनायेंगे ! पंडित जी हर रोज सुबह सुबह आयेंगे ! नवमी को ‘हवन’ होगा ! दशमी को मेला ! दशमी को हम सभी बच्चे मेला देखने जाते थे – हाथी पर् सवार होकर 😉 ( सौरी , मेरी हाथी वाली किस्से पर् कई भाई लोग नाक – भों सिकोड़ लेते हैं )…महावत को विशेष हिदायत …बगल वाले गांव के सबसे बड़े ज़मींदार के दरवाजे के सामने से ले चलो …जब तक मेरा हाथी उनका पुआल खाया नहीं …तब तक मन में संतोष कहाँ …😉  गाँव से दूर ब्लॉक में मेला लगता था ! जिलेबी – लाल लाल 🙂 मल मल के कुरता में ! फलाना बाबु का पोता ! कितना प्यार मिलता था ! कोई झुक कर सलाम किया तो कोई गोद में उठा कर प्यार किया ! किसी ने खिलौने खरीद दिए तो किसी ने ‘बर्फी मिठाई’ ! तीर – धनुष स्पेशल बन कर आता था ! लगता था – हम ही राम हैं 🙂 पर् किस सीता के लिए ‘राम’ हैं – पता नहीं होता ! 
रांची में याद है  नाना जी के एक पट्टीदार वाले भतीजा होते थे – एच ई सी में – हमको मूड हुआ – रावणवध देखने का – ट्रक भेजवाये थे ! ट्रक पर् सवार होकर हम ‘रावण वध’ देखने गए थे ! ननिहाल से लेकर अपने घर तक – दुश्मन से लेकर – दोस्त तक – ‘भाई ..बात साफ़ है ….मेरा ट्रीटमेंट एकदम ‘स्पेशल’ होना चाहिए …अभी भी वही आदत है …जहाँ हम हैं ..वहां कोई नहीं .. 😛
मुजफ्फरपुर में ‘देवी स्थान’ ! बच्चा बाबु बनवाए थे – सिन्धी थे – पर नाम ‘बिहारी’ ! अति सुन्दर – दुर्गा की प्रतिमा  ! वहाँ से लेकर कल्याणी तक मेला ! पैदल चलते चलते पैर थक जाता था 😦 चाचा जैसा आइटम लोग पीठईयाँ कर लेता 🙂 फिर बाबू जी एक आर्मी वाला सेकण्ड हैंड जीप ले लिए ! पूरा मोहल्ला उसमे ठूंसा जाता ! फिर रात भर घूमना 🙂 झुलुआ झुलना ! कुछ खिलोने – चिटपुटिया बन्दूक  !  उस ज़माने में दुर्गा पूजा के अवसर पर् – ओर्केस्ट्रा आता था ! शाम से ही आगे की कुर्सी पर् बैठ जाना और प्रोग्राम शुरू होने के पहले ही सो जाना 🙂 पापा मोतीझील के पूजा मार्किट से एक हरे रंग का ‘एक्रिलिक’ का टी शर्ट खरीद दिए थे – तब वो पी जी ही कर रहे थे – मोहल्ला के सीनियर भईया लोग के साथ घुमने गए थे – बहुत साल तक उस हरे रंग के टी शर्ट को ‘लमार – लमार’ के पहिने ..:)) 
पटना आ गया ! विशाल जगह था ! बड़ा ! माँ – बाबु जी घूमने नहीं जाते ! कोई स्टाफ साथ में ! भीड़ ही भीड़ ! मछुआटोली आते आते – लगता कहाँ आ गए ! तब तक आवाज़ आती – अमूल स्पेय की दुर्गा जी – पूरा भीड़ उधर ! ठेलम ठेल ! ये लेडिस के लाईन में घुसता है ? हा हा हा हा ! उफ्फ्फ …बंगाली अखाड़ा ! नवमी को दोस्त लोग मिलता – कोई बोलता – फलाना जगह का मूर्ती कमाल का है – फिर नवमी को ..वही हाल ! 
 गाँधी मैदान और पटना कौलेजीयट में तरह तरह का प्रोग्राम होता – पास कैसे मिलता है – पता ही नहीं था ! गाँधी मैदान गया था – महेंद्र कपूर आये थे ! देख ही लिए 🙂 एक बार मूड हुआ ‘गाँधी मैदान’ का रावण वध देखने का ! एक दोस्त मेरे क्लास का ही – हनुमान बना था – राम जी के साथ जीप पर् सवार था ! इधर से बहुत चिल्लाये – नहीं सुना 🙂 एक बार गए – फिर दुबारा नहीं गए ! बाद में छत पर् पानी के टंकी पर् चढ  कर देखने का एहसास करते थे 🙂
थोडा जवानी की रवानी आयी तो सुबह में – सुबह चार बजे ..:)) जींस के जैकेट में ….बाल में जेल वेल लगा के …जूता शुता टाईट पहिन के …:)) आईक – बाईक पर ट्रिपल सवारी …पूरा पटना रौंद देते थे …
नॉएडा आ गए ! बंगाली लोग का एक मंदिर है – कालीबाड़ी ! वहाँ जरुर जाते ! नवमी को मोहल्ले में ही ‘बंगाली दादा’ लोग पूजा करता था ! जबरदस्त ! अब यहाँ एकदम एलीट की तरह ! मल मल का कुरता ! बेटा भी ! दुर्गा माँ को साष्टांग ! हे माँ – इतनी शक्ति देना की ……….! फिर प्रोग्राम ! रविन्द्र संगीत और नृत्य ! ये लोग बड़े – बड़े कलाकार बुलाते हैं – कभी कुमान शानू तो कभी उषा उथप ! गाना साना सुने ! ढेर बंगाली दादा लोग हमको ‘बिहारी बाहुबली’ ही समझता था – सो इज्जत भी उसी तरह ! पर् अच्छा लगता था !

रंजन ऋतुराज – इंदिरापुरम !

07.10.2010

दस साल पुराना लेख है :))

नवरात्र ~ ६ , २०२०

~ खुद के आनंदित होने के बाद शक्ति का प्रमुख उपयोग रक्षा करना है । और शायद इसी रक्षा भाव से शक्ति की आराधना और स्थापना होती है । अगर देवी पूजन को देखें तो कई बार पर्वत और पहाड़ों पर घिरे गांव , टोले या कबीला में बहुत ही तीव्र भावना से होती है । शायद वो जगह प्राकृतिक आपदाओं से घिरे होते होंगे और खुद की रक्षा के लिए देवी की स्थापना । शायद यहीं से कुल देवी की स्थापना और पूजने की भाव निकलती होगी ।
लेकिन – शक्ति रक्षा करेगी या विपदा लायेगी , यह उसके पात्र की प्रकृति पर निर्भर करेगा । शक्ति का रूप पात्र के रूप से बदल जायेगा । जैसे मुख्यमंत्री नीतीश भी हैं और मुख्यमंत्री लालू भी थे , अब मुख्यमंत्री कि शक्तियों का उपयोग किस दिशा में होगी यह पात्र का व्यक्तित्व तय करेगा । जैसे गंगा कहीं बाढ़ लाती है तो वही गंगा कहीं उपजाऊ मिट्टी भी लाती है और वही गंगा फसलों को पानी भी देती है , अब गंगा तो सब जगह है लेकिन गंगा का आचरण बदल जायेगा , यह आचरण उसके बहाव के जगह पर निर्भर करेगा । गंगोत्री और कानपुर – दोनो जगह एक ही गंगा है लेकिन पानी अलग है ।
परिस्थितियां भी पात्र के रूप को बदल देती है । लेकिन सामाजिक परिस्थिति से आया बदलाव बदल भी सकता है । लेकिन जो ईश्वरीय देन है , वह बदलना मुश्किल है । वो कुछ समय बाद तेज होकर निकलेगा ही निकलेगा । अब यह तेज आपके लिए घातक है या फलदायक है , यह निर्भर करेगा कि शक्ति के सामने आप किस कोण पर खड़े हैं ।
आज नहीं बल्कि कई युगों से बढ़िया गुरु , स्कूल , कॉलेज इत्यादि इसलिए बनाए गए की वहां से निकले शक्तिशाली लोगों का पात्र गठन बढ़िया हो सके और कालांतर जब उनके अंदर सामाजिक शक्ति का समावहन हो तो पात्र अपनी मजबूती से उस शक्ति को समाज हित में प्रयोग कर सके ।
लेकिन सब फेल हो जाता है । जो द्रोणाचार्य अर्जुन के गुरु वही द्रोणाचार्य दुर्योधन के गुरु । ज्ञान की असीम सीमा लांघने वाले रावण भी अपनी मूल प्रकृति से नहीं बच सके । उसी घर , रहन सहन और भोजन के साथ विभीषण का चरित्र अलग था । दुर्भाग्य देखिए – राम भक्त होकर भी किसी हिन्दू ने अपने पुत्र का नाम विभीषण नहीं रखा और इतना ज्ञान के बाद भी रावण नाम का कोई दूसरा नाम नहीं हुआ ।
~ खैर , बात ईश्वरीय देन पात्र के बनावट और उसके अन्दर की शक्ति की है । पात्र के गठन पर बहस होनी चाहिए और समाज के द्वारा उस पात्र की विषमताएं कम करनी चाहिए । लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है और अंतोगत्वा हम ईश्वरीय देन चरित्र पर ही आधारित होकर शक्ति के उस वाहक के हिसाब से शक्ति का उपयोग या दुरुपयोग झेलते हैं ।
साथ साथ यह मान कर चलना होगा कि हर तरह कि शक्ति किसी एक ख़ास के पास नहीं हो सकती । यह एक प्यास है और यह प्यास कालान्तर एक कुंठा बन के भी रह जाती है । मेरे पास पैसा है तो राजनीति भी मेरे पॉकेट में होनी चाहिए इत्यादि इत्यादि । यह सोच गलत है । जिस दिन यह सोच आपके अंदर आयेगी उसी रोज से आपकी प्रमुख शक्ति का विनाश शुरू हो जायेगा । या फिर शक्ति बली मांगती है । दोनो बात सच है । आध्यात्मिक शक्ति तो मांगती ही मांगती है । यह बस अनुभव की बात है कि आपने बलि पर क्या चढ़ाया ।
लेकिन आम गृहस्थ के लिए किसी एक ख़ास प्रमुख शक्ति के सहारे जीवन काटना सबसे उपयुक्त है । बहुत छेड़ छाड़ में , वह शक्ति आपको ही तंग करना शुरू कर देती है । यह बात बहुत महत्वपूर्ण है – इसको गौर से सोचिए । या फिर पात्र की कमजोरी के कारण शक्ति उसे विचलित कर देती है ।
शायद इसी लिए हमारे समाज में एक मिश्रित जिन्दगी की शैली को प्रमुखता दी गई है । थोडा़ अध्यात्म हो तो थोडा़ संसार भी हो । धन हो तो दान का साहस भी हो ।
नवरात्र की ढेरो शुभकामनाएं …कल हमारे बिहार में देवी का पट खुल जायेगा । हालांकि बंगाल में पहले से ही देवी का पट खुल जाता है । मेरे बिहार में सप्तमी के रोज ।
शुभकामनाएं ….
: रंजन , दालान

नवरात्र – ५ , २०२०

~ बात ठीक दस साल पहले की है । दशहरा की छुट्टी में हम सपरिवार पटना में थे । एक शाम एक गहरे मित्र भोजन पर आमंत्रित किए। उनके घर गया तो उनका दो चार साल का बेटा बहुत रो रहा था। बहुत। उसकी मां परेशान परेशान । थोड़ी देर बाद मेरी पत्नी ने उसे अपने गोद में लिया और हनुमान चालीसा पढ़ने लगी । देखते देखते वो शान्त ही नहीं हुआ बल्कि सो भी गया ।
मेरे मन में यही बात आईं की हनुमान चालीसा महज एक कविता है और कविता में इतनी शक्ति कहां से आई । सैकडो साल से उस कविता को करोड़ों लोग रोज अपनी श्रद्धा से उसका जाप करते है । श्रद्धा और जाप का असर है कि उस कविता में इतनी शक्ति है । श्रद्धा विश्वास पैदा करता है और जाप एक ख़ास तरह कि ऊर्जा ।
कुछ साल पहले एक मित्र से थोड़े दिनों बाद एक समारोह में मुलाकात हुई , मेरी व्यक्तिगत श्रद्धा उसके लिए अनन्त थी और जैसे ही मैंने उसे देखा , मुझे ऐसा लगा कि मेरे अन्दर एक ऊर्जा का संचार हुआ । और ऐसा मेरे साथ हर बार हुआ । उसके अन्दर कितनी शक्ति , मुझे नहीं पता लेकिन मेरे अन्दर उसके लिए अनन्त विश्वास था और शायद उस श्रद्धा और विश्वास का असर था कि मै क्षण भर में खुद के अन्दर ऊर्जा पाता था । बाद में , मैंने उसका नाम ही क्वांटा रख दिया था । हा हा हा – ऊर्जा का पैकेट :))
~ माता पिता इतने शक्तिशाली क्यों होते है ? खून के रिश्ते के साथ साथ एक विश्वास । कई दफा लोगों की अपेक्षा अपने माता पिता से इतनी हो जाती है उम्र के आखिरी पड़ाव तक उनसे शिकायत होती है । लेकिन इस विश्वास की शक्ति आप कहीं भी पैदा कर सकते हैं और कहीं भी पा सकते हैं । शायद यह पहली नजर का कमाल होता है जब आपका दिल नहीं बल्कि आत्मा स्वीकार करती है । शरीर खत्म हो जाता है , दिल टूट सकता है लेकिन आत्मा नश्वर है । और जहां आत्मा गवाही देता है , वहीं ईश्वर होता है । मुझे अन्य धर्मों का नहीं पता , जहां मेरा विश्वास है – वहीं मेरा ईश्वर है । लेकिन यह सिर्फ पहली नजर नहीं बल्कि कई बार लगातार एक बिलिफ सिस्टम में रहने से भी होता है । इस पर लेख बहुत लंबा हो जायेगा ।
~ लेकिन ऐसी कई घटनाओं की अनुभूति होना भी अपने आप में एक शक्ति है । इस शक्ति का एहसास तभी होगा जब आप ध्यान मग्न होंगे । कोई अंत्र मंत्र की ज़रूरत नहीं । इस नवरात्र आप नौवें दिन मुझसे आंख नहीं मिला सकते :)) इतनी इंटेनसिटी होती है कि यह सिर्फ और सिर्फ दुर्गा को शक्ति है ।
जहां साधक है , वहीं देवी है या जहां देवी है वहीं साधक है 🙏❤️🙏
: रंजन , दालान