बड़ा शहर , छोटा शहर

बड़े शहरों की अपनी कई खासियत है ! भावविहीन चेहरों के अन्दर सच में ‘भाव’ खाने की आदत नहीं होती ! किसी के पास पैसा है – वो बड़ी गाड़ी / बंगला ‘झमकाता’ तो जरुर है पर खुद की खुशी के लिए ना की खुद को बड़ा दिखाने के लिए ! कल ही एक मित्र जो विदेश में है – मैंने बातों बातों में पूछा – हॉस्पिटल आना जाना कैसे होता है – उसने अपने शहर के रेल की बात कही – फिर बोला ..यार अब इस रेल में सामने वाला अरबपति है या ख़रबपति – कोई फर्क नहीं पड़ता ! जैसे हम अपनी सीट पर बैठे हैं – वो भी बैठा हुआ है – छोटे शहरों के ‘अंटा घंटा’ से दूर हूँ – जिन्दगी में एक सहूलियत है !
दिल्ली में यही चीज़ लुभाती है – कोई अनजान आपको तौलता नहीं है – अगर आप सौ करोड़ के मालिक है तो सामने वाला दो सौ करोड़ का मालिक हो सकता है – और उसे भी पता है – वो तीसरा पांच सौ करोड़ का मालिक है ! सभी अपने काम और खेल में व्यस्त हैं !
सौभाग्यवश – अपनी परिधी को तोड़ते हुए – एक से बढ़ कर एक बड़े लोगों से मुलाक़ात हुई – कभी किसी को जटिलता में बंधा हुआ नहीं देखा – अब आप बड़े शहर में किसको क्या दिखाएँगे ? एक बहुत छोटा उदहारण देता हूँ – मेरे इंदिरापुरम आवास के दसवें तल्ले पर – एक सुप्रीम कोर्ट के जज का फ़्लैट था – हर इतवार वो पुरे परिवार आते थे – अपनी कैमरी कार से – कोई लटका झटका नहीं – नमस्ते अंकल ..नमस्ते आंटी …कैसे हो प्रोफ़ेसर …हो गया ! पहले तल्ले पर लोकसभा के काफी सीनियर पदाधिकारी का फ़्लैट – हमदोनों एक साथ निकलते थे – उनकी लाल बत्ती कार मेरे पार्किंग के ठीक पीछे – रोज वो अपने ड्राईवर को डांटते – हर रोज एक ही बात – कभी लोकसभा आओ – खुद से घुमायेंगे …:))
अब चलिए ..पटना …पिछले साल वहां के लिटरेचर फेस्टिवल …गुलज़ार अपनी नज़म पढ़ रहे हैं …उनके मंच के ठीक पास …सायरन बजाता ‘सर सिपाही’ का कार रुका …एकदम से अजीब लगा – किसको दिखा रहो हो ? एक अस्सी साल के नौजवान को क्या दिखाओगे …उसकी बोलती नज़्म के सामने तुम्हारी सायरन बहुत छोटी लगी …एक पल में तुम वहीँ पहुँच गए – जहाँ से उठ के आये थे …उसी अपने छोटे शहर के छोटे से गली में – जहाँ ‘रट्टू ‘ को ही तेज़ और पढ़ाकू माना गया ! अगले दिन अखबारों में आपके छोटेपन के किस्से भी छपे ! उसी दिन देर शाम – गुलज़ार के साथ विश्वप्रसिद्द ‘सुबोध गुप्ता’ – जिनकी कला पुरे विश्व में छाई हुई है – तुमसे गिडगिडा रहे थे – पटना मेरी जन्मभूमी है – मुझे कुछ जगह दे दो – अपनी कला यहाँ स्थापित करूंगा ! और तुम थे – अपनी कलम की जटिलता और सायरन से आगे बढ़ ही नहीं पाये – इंसान भी क्या करे – जहाँ का जन्मा होता है वह चीज़ उसको आजीवन नहीं छोड़ती !
इसलिए – मै हर एक युवा से कहता हूँ – जितना दम – उतने बड़े शहर में तब तक रहो – जब तक वो शहर तुम्हारे अन्दर ना घुस जाय – बड़ा शहर कुछ करे या न करे – तुम्हारे अन्दर के छोटेपन को समाप्त तो जरुर कर देगा !
~ रंजन / दालान / 12.01.15

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