यादें – 07

Yadein ~ 07

बात 14 अगस्त 2006 की है । 2005 में डबल प्रोमोशन के साथ सहायक प्राध्यापक बन चुके थे , घर बुक हो गया था और चमचमाती नई कार दरवाजे खड़ी थी । पैसों को लेकर थोड़ी तंगी थी । सो छुट्टियों के दिन किसी अन्य विश्वविद्यालय में एक्स्ट्रा क्लास लेने लगा था । इसी वक्त मित्र डॉ आर एस राय जो उस वक़्त एमिटी जयपुर के कर्ता धर्ता थे , ने मुझे गेस्ट लेक्चर के बुलाया । आने जाने ठहरने के अलावा 5 – 10 हज़ार की कमाई को सोच मैं एक दिन के लिए जयपुर निकल गया ।
14 अगस्त 2006 को संध्या पंडारा रोड़ , नई दिल्ली से वॉल्वो बस । मैं समय के साथ वहां मौजूद था । दोपहर का बढ़िया भोजन कर्नाटक भवन में अतुल सर करवा दिए – तब वो इंग्लैंड से लौट रेजिडेंट कमिश्नर बने थे । शायद अपनी गाड़ी से वो पंडारा रोड़ भी पंहुचवा दिए थे ।
वॉल्वो बस के आगे सवारी जुट गए । मरद जात – कुकुर । नज़र पड़ गयी – एक अत्यंत तीखी नैन नक्श वाले , ग्रीन कलर के कैपरी में , सांवले रंग की , उम्र में 5-6 साल छोटी दिखने वाली हसीना पर । मैंने आंखें बंद की और ईश्वर को पुकारा – हे ईश्वर , अगर तुम सचमुच में हो तो इन मोहतरमा का सीट मेरे बगल में हो । उस वक़्त मैंने ईश्वर को जोर से पुकारा – एक ऐसी पुकार जो मैंने कभी किसी परीक्षा में भी नही की थी । बस में घुसा । तब और गोरा चिट्टा , गंभीर और बेहतरीन गोल्डन रंग के चश्मे के साथ । खिड़की वाली सीट पर बैठा ही कि – वो आ गयी – क्या आप अपनी खिड़की सीट मुझे दे सकते है ? मैं एकदम से भक्क़ । मैं उनके चेहरे को देख रहा था लेकिन मन मे उन सारों नास्तिकों के लिए गाली निकल रहा था जो ईश्वर की मौजूदगी पर सवाल उठाते आये हैं । चंद सेकेंड में सीट की अदला बदली हो गयी । सीट के अदला बदली के बीच मैंने करीब 1008 बार ईश्वर को थैंक्स कहा ।
वॉल्वो स्टार्ट हुई । मैं ऐसे सफर में रीडर्स डाइजेस्ट रखता हूँ – भले ही उसकी अंग्रेज़ी टो टा के पढ़नी पड़े 😐 मैडम सोडूकु के एक इलेक्ट्रॉनिक गेम पैड पर व्यस्त । कुछ दूर के बाद वो बेवजह ही एक स्माईल । फिर सफर शांत । वॉल्वो जब गुड़गांव से गुजरने लगी तो – उन्होंने पूछा – आप क्या करते है ? मैंने जमाने की मासूमियत ओढ़ – बोला – शिक्षक हूँ । उन्होंने पूछा – कहाँ ? तो मैंने अपने कॉलेज का नाम बताया । उन्हें उस कॉलेज का नाम पता था तो उन्होंने पद पूछा तो मैं भी ‘सहायक प्राध्यापक’ बोला । अब बातों में वो खुल गईं – कहा – बहुत कम उम्र में । मैंने कहा – प्रतिभावान हूँ । वो जोर से हंसने लगी । मैं भी मुस्कुरा दिया । मैं तब तक अपने तरफ से कोई भी सवाल नही । फिर वो मेरे जयपुर जाने पर सवाल – मैंने जबाब दे दिया । फिर वो खिड़की की तरफ मुड़ गयी और मैं भी रीडर्स डाइजेस्ट को टो टा के पढ़ने लगा । थैंक्स गॉड – अभी तक वार्तालाप अंग्रेज़ी में नही हुई थी और मनीषा सिंह भी अभी तक मोबाईल पर टन टन नही की थी – कहाँ तक पहुंचे ।
इसी बीच उन्होंने चिप्स का पैकेट खोला और मेरे तरफ बढ़ा दिया । चिप्स के पैकेट से चिप्स निकालने और खाने के दौरान उंगलियां भी स्पर्श की । करेंट मुझे लगा – उनका मुझे नही पता । लेकिन मैं भद्रता और कुलीनता की खाल ओढ़ एक गंभीर मुद्रा में चुप ही रहा । बातों बातों में पता चला कि वो देश के नामी गिरामी स्कूल कॉलेज से पढ़ -वर्तमान में भारत सरकार में उच्च पद पर नई दिल्ली में आसीन हैं । मेरे ऊपर कोई फर्क नही पड़ा जो उनके चेहरे पर कौतूहल बन के उभरा । बातें होने लगी । बैच और कैडर भी बताया । मैंने भी अपनी पढ़ाई लिखाई और वर्तमान पेशा की दिक्कत इत्यादि का बयान किया । तब दालान शुरू नही हुआ था । सो मेरे पास बताने को कुछ ज्यादा नही था । लेकिन वो मेरे आव भाव से इम्प्रेस हो चुकी थी । यह मुझे उस वक़्त प्रतीत हुआ । उन्होंने ही कहा – फलाने जगह रास्ते मे गाड़ी रुकेगी वहां साथ मे चाय कॉफ़ी पियेंगे । मैंने भी कंधा उचका दिया- जैसी आपकी मर्जी ।
वॉल्वो रास्ते मे एक बहुत बड़े ढाबे पर रुकी । मैंने भी मालबोरो सिगरेट निकाला और वर्तमान के फवाद खान की तरह उसे जलाया । वो बड़ी गौर से देखने लगीं । फिर वो अपने टोट बैग से अपना विजिटिंग कार्ड निकालीं और बोली – कभी दिल्ली आना हुआ तो मिलिएगा । मैंने कार्ड पर एक सरसरी निगाह डाली और कार्ड को अपने वैलेट में रख दिया – आज भी वो सुरक्षित है 😐
फिर मैं उनके यूपीएससी के विषय इत्यादि पर सवाल किया । हम वापस बस में आ गए थे । अब संकोच एक परत निचे आ गयी थी – फिर से उन्होंने चिप्स का पैकेट खोला – इस बार उंगलियां बड़े निर्भीक होकर आपस मे मिल रही थी । उन्होंने कल के मेरे गेस्ट लेक्चर के बाद – जयपुर आने का न्योता भी दी । जिसे मैंने बड़े ही सज्जनता से मना भी किया । बातों से यही लगा कि वो जयपुर से ही है ।
मालूम नही क्या हुआ – बात राजनीति पर आ गयी । बिहार और उसकी राजनीति । यूपी की राजनीति और राजस्थान । मैंने बातों बातों बहुत कुछ बोल दिया । थोड़ा विकास और सामंतवाद की वकालत कर दी । वो अचानक से मेरी तरफ मुड़ी और बोली – ‘कहीं आप भुमिहार तो नही ?’ । मैंने कहा – जी हां , मैं एक भुमिहार हूँ ।
वो पल भर में खिड़की की तरफ मुड़ी और मैं अवाक । तब से बीच रास्ते एमिटी प्रांगण के सामने वॉल्वो रुकने और मेरे उतरने तक वो खिड़की की तरफ से एक झलक मेरी तरफ मुड़ के देखी भी नही 😐
हा हा हा …चुनावी माहौल है । तो यह कहानी याद आयी । सच्ची है ।
तब मैंने कसम खाया – किसी भी महिला से राजनीति की बात नही करूंगा ।
ज्ञान प्राप्त हुआ – किसी भुमिहार को सिर्फ और सिर्फ एक भूमिहारीन ही समझ सकती है ।
हा हा हा …

~ रंजन ऋतुराज / 24 मार्च , 2019

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