इलेवन मिनट्स …

वर्षों पहले की बात है । विश्वविद्यालय के तरफ़ से प्रायोगिक परीक्षाएँ में परीक्षक बन मुझे आगरा जाना हुआ । आस पास के दो तीन कॉलेज में प्रायोगिक परीक्षा समाप्त करवा मैंने एक टैक्सी ले ली । आगरा में ही ‘इलेवन मिनट्स’ किताब ख़रीद ली । उम्र कम थी – किताब बस दो घंटे में , रास्ते में ही ख़त्म कर दिया । वक़्त के साथ सब भूल गया लेकिन उस किताब में लिखी एक बात याद रह गयी – ” हम इंसान दर्द को एँज़ोय करते हैं ” !
तब यह बात मन में अटक गयी । कई गीत भी दर्द पर लिखे जा चुके हैं – ‘किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार’ । शायद यह दर्द का ही कारोबार है की कई बार राजनीति में भी इसी दर्द को सहानुभूति वोट के लिए इस्तेमाल किया जाता है । इश्क़ तो पूरा से दर्द और सहानुभूति का ही खेल है ।
रेडियो जॉकी शशि ने जब मुझसे कुछ पूछा तो मैंने रेडियो मिर्ची पर कहा था – शायद हम तरह की भावनाओं को एँज़ोय करना चाहते हैं और घृणा भी एक पवित्र भावना है । जैसे एक सर्किल है , जिसके शून्य डिग्री पर प्रेम है और 360 डिग्री पर घृणा है – जब घृणा हद से पार गुज़र जाएगी , काँटा 360 डिग्री के पार फिर से शून्य डिग्री पर स्थित एक प्रेम पर जा पहुँचेगा । और यह काँटा हमेशा क्लॉकवाइज़ घूमता है ।
एक दफ़ा एक लड़की ने एक लड़के को कहा – बहुत प्रेम किए , अब हम दोनो को अलग हो जाना चाहिए । लड़के ने पूछा – क्यों ? लड़की बोली – एक कशिश रह जाएगी , नहीं मिल पाने की । लड़का हैरान था । लड़की को सम्पूर्ण प्रेम चाहिए था – प्रेम के बाद के दर्द का ।
मिलन तो प्रेम की पूर्णाहती है । दर्द प्रेम को ज़िंदा रखता है ।
कुछ अजीब नहीं है – भावनाओं का खेल । दर्द को भी एँज़ोय करने की तमन्ना 😳

29.11.2016

Published by ranjanrituraj

I write :))

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