स्त्री – पुरुष / स्पर्श

स्त्री और पुरुष जब एक दुसरे से नजदीक आते हैं ! स्पर्श की अनुभूति या स्पर्श का होना ही प्रेम का परिचायक है ! स्त्री 'मन के स्पर्श' को प्रेम कहती है और पुरुष 'तन के स्पर्श' को प्रेम की मंजिल समझता है ! यह स्पर्श कैसा होगा - यह उन्दोनो के प्रेम की इन्तेंसिटी … Continue reading स्त्री – पुरुष / स्पर्श

वसंत : फरवरी या मार्च …

धरा ने वसंत को पूरी तरह जिया भी नहीं की पतझड़ की आहट होने लगी है । अचानक से धूप तीखी हो गयी है । ऐसे जैसे मार्च अपने वक़्त से पहले आ कर - फ़रवरी का हिस्सा छिन रहा हो । ग़लत बात लगती है , किसी के हिस्से में प्रवेश करना । ऐसा … Continue reading वसंत : फरवरी या मार्च …

ये इश्क़ है …मेरी जां …

ये इश्क़ है , मेरी जाँ … दरवाज़े बंद कर दो , खिड़कियाँ बंद कर दो । चाहो तो ख़ुद को किसी क़ैदखाने में क़ैद कर दो । भले इस जहाँ को छोड़ किसी और जहाँ चले जाओ । ये इश्क़ है , मेरी जाँ …

माँ… स्मृतियों में 🙏

माँ माँ ( 8th May 1949 - 5th Feb 2013 ) माँ , आज शाम माँ अपनी यादों को छोड़ हमेशा के लिए उस दुनिया में चली गयीं - जहाँ उनके माता पिता और बड़े भाई रहते हैं ! पिछले बीस जनवरी को माँ का फोन आया था ...मेरी पत्नी को ...रंजू से कहना ...हम उससे ज्यादा उसके … Continue reading माँ… स्मृतियों में 🙏

हर ज़िन्दगी एक कहानी है …

हर ज़िंदगी एक कहानी है ! पर कोई कहानी पूर्ण नहीं है ! हर कहानी के कुछ पन्ने गायब हैं ! हर एक इंसान को हक़ है, वो अपने ज़िंदगी के उन पन्नों को फिर से नहीं पढ़े या पढाए, उनको हमेशा के लिए गायब कर देना ही - कहानी को सुन्दर बनाता है ! … Continue reading हर ज़िन्दगी एक कहानी है …

आत्माएं भाव की भूखी होती है …

आत्माएं भाव की भूखी होती है और उसी भाव से आत्म विश्वास पनपता है । भाव बहुत महत्वपूर्ण है । आज माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला के बारे में पढ़ रहा था । उन्होंने अपने बचपन के स्कूली क्रिकेट की चर्चा की । उन्होंने कहा - एक स्कूल क्रिकेट मैच के दौरान , गेंदबाजी करते … Continue reading आत्माएं भाव की भूखी होती है …

लेखक और काल

मुझे ऐसा लगता है - जो कोई भी लेखक है - किसी भी रूप में - साहित्यकार हो या फ़िलॉसफ़र । मूलतः वो अपने 'काल' से ही अपनी रचना को सजाते हैं । शेक़सपियर हों या कालिदास या फिर प्रेमचंद । सभी ने अपनी रचना के मूल में 'मानव स्वभाव' को रखा और उसको अपने … Continue reading लेखक और काल

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस :))

चाय पर चर्चा और आज अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस है 🙂 ।माँ बहुत चाय पीती थी । हर वक़्त चाय चाहिए । सो बहुत बचपन से हम दोनों भाई बहन को भी चाय चाहिए होता था । चाय के चक्कर मे बहुत कुछ छूटा है - परीक्षा तक भी - तो उसी चाय के चक्कर मे … Continue reading अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस :))

सरौता …कहां भूल आए … :))

" सरौता कहां भूल आए …प्यारे नंदोइया "~ पद्म विभूषण गायिका स्व गिरिजा देवी जब इस गीत को बेहद सलीके अंदाज़ से गाती थी ,समा बन्ध जाता था :))हम शायद उस पीढ़ी से आते हैं , जहां बचपन कि स्मृतियों में सरौता बसा हुआ है । पुरुष के महिन चाल चलन का यह भी एक … Continue reading सरौता …कहां भूल आए … :))

इलेवन मिनट्स …

वर्षों पहले की बात है । विश्वविद्यालय के तरफ़ से प्रायोगिक परीक्षाएँ में परीक्षक बन मुझे आगरा जाना हुआ । आस पास के दो तीन कॉलेज में प्रायोगिक परीक्षा समाप्त करवा मैंने एक टैक्सी ले ली । आगरा में ही 'इलेवन मिनट्स' किताब ख़रीद ली । उम्र कम थी - किताब बस दो घंटे में … Continue reading इलेवन मिनट्स …

गुल्लक …

गुल्लक बेहद पसंद । कहीं से भी आओ और पॉकेट में खनखनाते चंद सिक्कों को गुल्लक में डाल निश्चिंत । फिर उस गुल्लक के भरने का इंतजार ताकि उसे फोड़ा जा सके । कभी किसी को कड़कड़ाते नोट गुल्लक में डालते नहीं देखा । हमेशा सिक्के ही ।पर कभी कभी ऐसा लगता है क्या इतने … Continue reading गुल्लक …

ओनली बुलेट …

पटना में घर घर बुलेट , हर हर बुलेट हो गया है । जिसको देखिये वही बुलेट हांक रहा है । हाफ लिवर का आदमी भी बुलेट लेकर घूम रहा है । अरे भाई , तुम्हारा कोई इज्जत नही है लेकिन बुलेट का इज्जत तो है …न । अकेले बुलेट स्टैंड पर नही लगेगा लेकिन … Continue reading ओनली बुलेट …

शब्द छवि बनाते हैं …

मै कोई साहित्यकार / लेखक / पत्रकार / कवी / शायर नहीं हूँ - बस जो जब दिल में आया लिख दिया - करीब ठीक दस साल पहले - मैंने यूँ ही रोमन लिपि में हिंदी भाषा में - रामेश्वर सिंह कश्यप उर्फ़ लोहा सिंह से प्रेरित होते हुए - खुद पर ही एक बेहतरीन … Continue reading शब्द छवि बनाते हैं …

छठ क्या है ?

छठ क्या है ? छठ यही है 🙏~ किसी भी बिहारी के लिए यह समझा पाना की छठ क्या है । दुनिया का सबसे मुश्किल काम । जाति को कौन पूछे – धर्म की दीवारें गिर जाती है ।~ भावनाओं का वह सागर किस तूफान पर होता होगा जब गांव के नथुनी मियां कहते हैं … Continue reading छठ क्या है ?

छठ : जब ले माई बिया …

आज नहाय - खाय है ! हल्का ठण्ड ! कुहासा भी है ! कम्बल से बाहर निकला तो देखा - दरवाजे पर हुजूम ! बाबा का खादी वाला शाल ओढ़ - चाचा का हवाई चप्पल ले के …बाहर ! कुर्सियां सजी है - लोग बैठे हैं !अहा …मिंटू चाचा …एक कुर्सी पर चुप चाप ! … Continue reading छठ : जब ले माई बिया …

छठ की यादें : रंजन ऋतुराज

कल से ही अखबार में 'छठ पूजा' को लेकर हो रही तैयारी के बारे में समाचार आने लगे ! आज तो दिल्ली वाला 'हिंदुस्तान दैनिक' फूल एक पेज लिखा है ! कल दोपहर बाद देखा - फेसबुक पर् शैलेन्द्र सर ने एक गीत अपने वाल पर् लगाया था - शारदा सिन्हा जी का ! गीत … Continue reading छठ की यादें : रंजन ऋतुराज

रवीश कुमार की यादों में छठ

रविश कुमार शौक से पत्रकार है - मेरे पड़ोसी से मेरा ही परिचय देने लगे - "हम यादों में जीते हैं" - आज के 'प्रभात खबर' के पहले पन्ने पर छपी - उनकी बेहतरीन लेख - छठ पूजा पर - "सामूहिकता सिखाते छठ घाट"‘नरियलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुग्गा मेड़राए, ऊ जे खबरी … Continue reading रवीश कुमार की यादों में छठ

छठ पर गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी का एक लेख …

अक्सर पिछले छह दशकों की वीथियों में घूम ही आती हूं। उन स्मृतियों में सब हैं, दादा-दादी, मां-पिताजी, भाई-बहन और ढेर सारे चाचा-चाचियां और सेवक-सेविकाएं। उन्हीं रिश्तों के बीच होली-दिवाली, दुर्गा पूजा, चौथचंदा, सरस्वती पूजा और व्रत-त्योहार। सबसे ऊपर रहती है छठ पर्व की स्मृति। कितना सुहाना, कितनी आस्था। दादी द्वारा कितने सारे निषेध। चार … Continue reading छठ पर गोवा की पूर्व राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी का एक लेख …

मेरा गांव – मेरा देस – मेरी दिवाली :))

एक बार फिर दिवाली आ गया ! हर साल आता है ! यादों का मौसम एक बार फिर आया ! अभी अभी पटना से लौटा हूँ - कई लोग फिर से बोलने पूछने लगे - 'दिवाली में भी आना है ?' अरे ..मेरे भाई ..हम पेटभरुआ मजदूर हैं ..कहाँ इतना पैसा बचाता है कि ..हर … Continue reading मेरा गांव – मेरा देस – मेरी दिवाली :))

पोंच …

जाड़ा आ ही गया ! मेरे बिहार में जाड़ा के आते आते ही आपको गली - गली में हर चार कदम पर 'अंडा' का दूकान मिल जाएगा । - चार वर्ष का बच्चा से लेकर सत्तर साल के बुढा तक दुकानदार मिल जाएगा - इसी उम्र का खाने वाला भी ! एक ठेला पर सजा … Continue reading पोंच …

गोभी … :))

फूलगोभी की इस तस्वीर को देख आप मक्खन भूल जाएंगे । सीजन आ गया है । सुबह सुबह नहा धों कर , हल्का गीला गरम भात पर दो चम्मच घी और ' गरम गरम गोभी आलू ' का सब्जी । उसके बाद रोजी रोटी कमाने निकल जाइए । गोभी जबरदस्त कमजोरी है । सालों भर … Continue reading गोभी … :))

सोच …फुर्सत में अवश्य पढ़ें

लिखने से पहले ..मै यह मान के चल रहा हूँ …मेरी तरह आप भी किसी स्कूल - कॉलेज में पढ़े होंगे - जैसी आपकी चाह और मेरिट या परिस्थिती ! अब जरा अपने उस 'क्लास रूम' को याद कीजिए - चालीस से लेकर सौ तक का झुण्ड - कुछ सीनियर / जूनियर को भी याद … Continue reading सोच …फुर्सत में अवश्य पढ़ें

मिर्च ही मिर्च …

तीखी मिर्ज ... मिर्च की इतनी वैराईटी देख मन खुश हो गया । मां की याद आई । उनके खाने में आग में सेका हुआ मिर्च अवश्य होता था । फिर अपना बचपन याद आया - रगड़ा चटनी । लहसुन और हरा मिर्च का चटनी । आह । दिन में चावल दाल के साथ रगड़ा … Continue reading मिर्च ही मिर्च …

इंदिरा जी …

आज स्व श्रीमती इंदिरा गांधी की शहादत दिवस है ! आज से ठीक २९ साल पहले श्रीमती गांधी की हत्या कर दी गयी थी ! तब हम हाई स्कूल में होते थे - घर में कोंग्रेसी वातावरण होता था ! घर के "दालान" में श्रीमती गांधी के अलावा महात्मा गांधी / नेहरू / राजेन बाबू … Continue reading इंदिरा जी …

आम्रपाली …

वैजयंती माला "इतने बड़े महल में , घबराऊँ मैं 'बेचारी' " ।इस गीत में जब लता मंगेश्कर की आवाज़ वैजयंती माला के होंठ से , तब जब वो जिस अदा से 'बेचारी' बोलती हैं , कसम से दिल पर कोई छुरी नही चलती है , लगता है जैसे इस मासूम दिल को कोई रेंत रहा … Continue reading आम्रपाली …