प्रेम और युद्ध

दिनकर लिखते हैं – ” समस्या युद्ध की हो अथवा प्रेम की, कठिनाइयाँ सर्वत्र समान हैं। ” – दोनों में बहुत साहस चाहिए होता है ! हवा में तलवार भांजना ‘युद्ध’ नहीं होता और ना ही कविता लिख सन्देश भेजना प्रेम होता है ! युद्ध और प्रेम दोनों की भावनात्मक इंटेंसिटी एक ही है !Continue reading “प्रेम और युद्ध”

प्रकृति , धरा और ऋतुराज

धरा – सखी , ये किसकी आहट है ?प्रकृति – ये वसंत की आहट लगती है ..धरा – कौन वसंत ? हेमंत का भाई ऋतुराज वसंत ?प्रकृती – हाँ , वही तुम्हारा ऋतुराज वसंत …:))धरा – और ये शिशिर ?प्रकृति – वो अब जाने वाला है …धरा – सुनो , मैं कैसी दिख रही हूँContinue reading “प्रकृति , धरा और ऋतुराज”