नवरात्र ~ ७ , २०२०

~ आज सप्तमी है । बिहार में देवी का पट खुल गया होगा । सर्वप्रथम देवी पूजन हमारे घर की बहन , बेटी और बहु करेंगी । देवी का आगमन और देवियों के द्वारा स्वागत ❤️
सब कुछ तो हमारी सभ्यता से ही है । जब कोई दुल्हन प्रथम बार ससुराल आती है तो उसका स्वागत भी घर की महिलाएं ही करती है :)) कितनी अचरज की बात है कि हिन्दू धर्म के जितने भी पर्व और त्योहार है , सभी किसानों के समय को या उनके सुविधा अनुसार ही बनाए गए हैं । किसान मूल हैं ।🙏
~ मैंने देखा है लोग अपनी शक्ति से ज्यादा दूसरों की शक्ति को तौलते हैं । यह उतना उचित नहीं है । खुद की शक्ति को पहचानिए । दो वक़्त की रोटी और एक छत के बाद , इस संसार में किसी से डरने की जरूरत नहीं है । अपना पॉजिटिव प्वाइंट समझिए । अपने खुद के प्रकृति को समझिए । आप अव्वल दर्जे के फ्रॉड हैं तो यह भी एक पॉजिटिव प्वाइंट है लेकिन उस शक्ति का आदर कीजिए । हम जैसे साधुओं को जान बक्श दीजिए । रोड किनारे , स्टेशन पर , मेला में फ्राउडगिरि कीजिए । हम जैसे लोग आपको प्रणाम कर के आगे बढ़ जायेंगे। यह मेरा स्वभाव है , आप चोर हैं , चोट्टा है , फ्रॉड है – हम अपनी मूल प्रकृति के अनुसार आपको नहीं टोकेंगे जब तक कि आपकी चोर कटाई से हमको कोई फर्क नहीं पड़ता । समाज है – हर तरह के लोग है , आप भी रहिए । खुशी खुशी अपना चोर और चोट्टा के ग्रुप में ।
हमको अपना पॉजिटिव प्वाइंट पता है । निगेटिव भी पता है । किसी का आठ आना भी नहीं मारेंगे । पैसा के मामले में पक्का ईमानदार । अब खूबसूरती नजर के सामने से गुजरेगी तो कनखिया के एक नज़र देखेंगे ही देखेंगे । अब वो एक घड़ी , पेन या कोई हम उम्र बेमिसाल हो । मूल प्रकृति है । पढ़ने में मन नहीं लगा तो कभी किसी को खुद को होशियार समझ कर बर्ताव नहीं किया । भाई , हम बकलोल और आप होशियार । अब आगे बढ़िये । अब बाप दादा हाथी रखता था तो वो लिखेंगे ही लेकिन अपना पटल पर । भांट की तरह दरवाजे दरवाजे नहीं । हे हे …मौसी जी , अहं बड नीक छीये । मार साला मऊग के । किसी की यही प्रतिभा । गीत गाते गाते अंगना में ढूक गए । हा हा हा । भाई , ई सब प्रतिभा हम में नहीं 🙏
तो घुमा फिरा के कहने का मतलब की आप अपने मूल प्रकृति को समझिए । मूल शक्ति वही है । आपका स्वभाव । वहीं से आपको इज्जत मिलेगी या बेइज्जती । बड़का फ्रॉड तो बड़का फ्रॉड के समूह में जाए – बहुत इज्जत मिलेगी । साधु के ग्रुप में जायेंगे तो बेइज्जती मिलेगी । बड़का साधु हैं तो साधु के समाज में रहे , वहीं इज्जत मिलेगी । फ्रॉड के समाज में जायेंगे तो गाली मिलेगी । देख साला साधु को , बैठ कर खाता है । हा हा हा ।
क्योंकि शक्ति का एक मंज़िल – सामाजिक प्रतिष्ठा भी है :))
: रंजन , दालान

मेरा गांव – मेरा देस – मेरा दशहरा

हर जगह का ‘दशहरा’ देखा हूँ 🙂 मुज़फ्फ्फरपुर –  रांची – पटना – गाँव – कर्नाटका – मैसूर – नॉएडा -गाज़ियाबाद 🙂
गाँव में बाबा कलश स्थापन करेंगे ! हर रोज पाठ होगा ! बाबा इस बीच दाढ़ी नहीं बनायेंगे ! पंडित जी हर रोज सुबह सुबह आयेंगे ! नवमी को ‘हवन’ होगा ! दशमी को मेला ! दशमी को हम सभी बच्चे मेला देखने जाते थे – हाथी पर् सवार होकर 😉 ( सौरी , मेरी हाथी वाली किस्से पर् कई भाई लोग नाक – भों सिकोड़ लेते हैं )…महावत को विशेष हिदायत …बगल वाले गांव के सबसे बड़े ज़मींदार के दरवाजे के सामने से ले चलो …जब तक मेरा हाथी उनका पुआल खाया नहीं …तब तक मन में संतोष कहाँ …😉  गाँव से दूर ब्लॉक में मेला लगता था ! जिलेबी – लाल लाल 🙂 मल मल के कुरता में ! फलाना बाबु का पोता ! कितना प्यार मिलता था ! कोई झुक कर सलाम किया तो कोई गोद में उठा कर प्यार किया ! किसी ने खिलौने खरीद दिए तो किसी ने ‘बर्फी मिठाई’ ! तीर – धनुष स्पेशल बन कर आता था ! लगता था – हम ही राम हैं 🙂 पर् किस सीता के लिए ‘राम’ हैं – पता नहीं होता ! 
रांची में याद है  नाना जी के एक पट्टीदार वाले भतीजा होते थे – एच ई सी में – हमको मूड हुआ – रावणवध देखने का – ट्रक भेजवाये थे ! ट्रक पर् सवार होकर हम ‘रावण वध’ देखने गए थे ! ननिहाल से लेकर अपने घर तक – दुश्मन से लेकर – दोस्त तक – ‘भाई ..बात साफ़ है ….मेरा ट्रीटमेंट एकदम ‘स्पेशल’ होना चाहिए …अभी भी वही आदत है …जहाँ हम हैं ..वहां कोई नहीं .. 😛
मुजफ्फरपुर में ‘देवी स्थान’ ! बच्चा बाबु बनवाए थे – सिन्धी थे – पर नाम ‘बिहारी’ ! अति सुन्दर – दुर्गा की प्रतिमा  ! वहाँ से लेकर कल्याणी तक मेला ! पैदल चलते चलते पैर थक जाता था 😦 चाचा जैसा आइटम लोग पीठईयाँ कर लेता 🙂 फिर बाबू जी एक आर्मी वाला सेकण्ड हैंड जीप ले लिए ! पूरा मोहल्ला उसमे ठूंसा जाता ! फिर रात भर घूमना 🙂 झुलुआ झुलना ! कुछ खिलोने – चिटपुटिया बन्दूक  !  उस ज़माने में दुर्गा पूजा के अवसर पर् – ओर्केस्ट्रा आता था ! शाम से ही आगे की कुर्सी पर् बैठ जाना और प्रोग्राम शुरू होने के पहले ही सो जाना 🙂 पापा मोतीझील के पूजा मार्किट से एक हरे रंग का ‘एक्रिलिक’ का टी शर्ट खरीद दिए थे – तब वो पी जी ही कर रहे थे – मोहल्ला के सीनियर भईया लोग के साथ घुमने गए थे – बहुत साल तक उस हरे रंग के टी शर्ट को ‘लमार – लमार’ के पहिने ..:)) 
पटना आ गया ! विशाल जगह था ! बड़ा ! माँ – बाबु जी घूमने नहीं जाते ! कोई स्टाफ साथ में ! भीड़ ही भीड़ ! मछुआटोली आते आते – लगता कहाँ आ गए ! तब तक आवाज़ आती – अमूल स्पेय की दुर्गा जी – पूरा भीड़ उधर ! ठेलम ठेल ! ये लेडिस के लाईन में घुसता है ? हा हा हा हा ! उफ्फ्फ …बंगाली अखाड़ा ! नवमी को दोस्त लोग मिलता – कोई बोलता – फलाना जगह का मूर्ती कमाल का है – फिर नवमी को ..वही हाल ! 
 गाँधी मैदान और पटना कौलेजीयट में तरह तरह का प्रोग्राम होता – पास कैसे मिलता है – पता ही नहीं था ! गाँधी मैदान गया था – महेंद्र कपूर आये थे ! देख ही लिए 🙂 एक बार मूड हुआ ‘गाँधी मैदान’ का रावण वध देखने का ! एक दोस्त मेरे क्लास का ही – हनुमान बना था – राम जी के साथ जीप पर् सवार था ! इधर से बहुत चिल्लाये – नहीं सुना 🙂 एक बार गए – फिर दुबारा नहीं गए ! बाद में छत पर् पानी के टंकी पर् चढ  कर देखने का एहसास करते थे 🙂
थोडा जवानी की रवानी आयी तो सुबह में – सुबह चार बजे ..:)) जींस के जैकेट में ….बाल में जेल वेल लगा के …जूता शुता टाईट पहिन के …:)) आईक – बाईक पर ट्रिपल सवारी …पूरा पटना रौंद देते थे …
नॉएडा आ गए ! बंगाली लोग का एक मंदिर है – कालीबाड़ी ! वहाँ जरुर जाते ! नवमी को मोहल्ले में ही ‘बंगाली दादा’ लोग पूजा करता था ! जबरदस्त ! अब यहाँ एकदम एलीट की तरह ! मल मल का कुरता ! बेटा भी ! दुर्गा माँ को साष्टांग ! हे माँ – इतनी शक्ति देना की ……….! फिर प्रोग्राम ! रविन्द्र संगीत और नृत्य ! ये लोग बड़े – बड़े कलाकार बुलाते हैं – कभी कुमान शानू तो कभी उषा उथप ! गाना साना सुने ! ढेर बंगाली दादा लोग हमको ‘बिहारी बाहुबली’ ही समझता था – सो इज्जत भी उसी तरह ! पर् अच्छा लगता था !

रंजन ऋतुराज – इंदिरापुरम !

07.10.2010

दस साल पुराना लेख है :))

नवरात्र ~ ६ , २०२०

~ खुद के आनंदित होने के बाद शक्ति का प्रमुख उपयोग रक्षा करना है । और शायद इसी रक्षा भाव से शक्ति की आराधना और स्थापना होती है । अगर देवी पूजन को देखें तो कई बार पर्वत और पहाड़ों पर घिरे गांव , टोले या कबीला में बहुत ही तीव्र भावना से होती है । शायद वो जगह प्राकृतिक आपदाओं से घिरे होते होंगे और खुद की रक्षा के लिए देवी की स्थापना । शायद यहीं से कुल देवी की स्थापना और पूजने की भाव निकलती होगी ।
लेकिन – शक्ति रक्षा करेगी या विपदा लायेगी , यह उसके पात्र की प्रकृति पर निर्भर करेगा । शक्ति का रूप पात्र के रूप से बदल जायेगा । जैसे मुख्यमंत्री नीतीश भी हैं और मुख्यमंत्री लालू भी थे , अब मुख्यमंत्री कि शक्तियों का उपयोग किस दिशा में होगी यह पात्र का व्यक्तित्व तय करेगा । जैसे गंगा कहीं बाढ़ लाती है तो वही गंगा कहीं उपजाऊ मिट्टी भी लाती है और वही गंगा फसलों को पानी भी देती है , अब गंगा तो सब जगह है लेकिन गंगा का आचरण बदल जायेगा , यह आचरण उसके बहाव के जगह पर निर्भर करेगा । गंगोत्री और कानपुर – दोनो जगह एक ही गंगा है लेकिन पानी अलग है ।
परिस्थितियां भी पात्र के रूप को बदल देती है । लेकिन सामाजिक परिस्थिति से आया बदलाव बदल भी सकता है । लेकिन जो ईश्वरीय देन है , वह बदलना मुश्किल है । वो कुछ समय बाद तेज होकर निकलेगा ही निकलेगा । अब यह तेज आपके लिए घातक है या फलदायक है , यह निर्भर करेगा कि शक्ति के सामने आप किस कोण पर खड़े हैं ।
आज नहीं बल्कि कई युगों से बढ़िया गुरु , स्कूल , कॉलेज इत्यादि इसलिए बनाए गए की वहां से निकले शक्तिशाली लोगों का पात्र गठन बढ़िया हो सके और कालांतर जब उनके अंदर सामाजिक शक्ति का समावहन हो तो पात्र अपनी मजबूती से उस शक्ति को समाज हित में प्रयोग कर सके ।
लेकिन सब फेल हो जाता है । जो द्रोणाचार्य अर्जुन के गुरु वही द्रोणाचार्य दुर्योधन के गुरु । ज्ञान की असीम सीमा लांघने वाले रावण भी अपनी मूल प्रकृति से नहीं बच सके । उसी घर , रहन सहन और भोजन के साथ विभीषण का चरित्र अलग था । दुर्भाग्य देखिए – राम भक्त होकर भी किसी हिन्दू ने अपने पुत्र का नाम विभीषण नहीं रखा और इतना ज्ञान के बाद भी रावण नाम का कोई दूसरा नाम नहीं हुआ ।
~ खैर , बात ईश्वरीय देन पात्र के बनावट और उसके अन्दर की शक्ति की है । पात्र के गठन पर बहस होनी चाहिए और समाज के द्वारा उस पात्र की विषमताएं कम करनी चाहिए । लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है और अंतोगत्वा हम ईश्वरीय देन चरित्र पर ही आधारित होकर शक्ति के उस वाहक के हिसाब से शक्ति का उपयोग या दुरुपयोग झेलते हैं ।
साथ साथ यह मान कर चलना होगा कि हर तरह कि शक्ति किसी एक ख़ास के पास नहीं हो सकती । यह एक प्यास है और यह प्यास कालान्तर एक कुंठा बन के भी रह जाती है । मेरे पास पैसा है तो राजनीति भी मेरे पॉकेट में होनी चाहिए इत्यादि इत्यादि । यह सोच गलत है । जिस दिन यह सोच आपके अंदर आयेगी उसी रोज से आपकी प्रमुख शक्ति का विनाश शुरू हो जायेगा । या फिर शक्ति बली मांगती है । दोनो बात सच है । आध्यात्मिक शक्ति तो मांगती ही मांगती है । यह बस अनुभव की बात है कि आपने बलि पर क्या चढ़ाया ।
लेकिन आम गृहस्थ के लिए किसी एक ख़ास प्रमुख शक्ति के सहारे जीवन काटना सबसे उपयुक्त है । बहुत छेड़ छाड़ में , वह शक्ति आपको ही तंग करना शुरू कर देती है । यह बात बहुत महत्वपूर्ण है – इसको गौर से सोचिए । या फिर पात्र की कमजोरी के कारण शक्ति उसे विचलित कर देती है ।
शायद इसी लिए हमारे समाज में एक मिश्रित जिन्दगी की शैली को प्रमुखता दी गई है । थोडा़ अध्यात्म हो तो थोडा़ संसार भी हो । धन हो तो दान का साहस भी हो ।
नवरात्र की ढेरो शुभकामनाएं …कल हमारे बिहार में देवी का पट खुल जायेगा । हालांकि बंगाल में पहले से ही देवी का पट खुल जाता है । मेरे बिहार में सप्तमी के रोज ।
शुभकामनाएं ….
: रंजन , दालान

नवरात्र – ५ , २०२०

~ बात ठीक दस साल पहले की है । दशहरा की छुट्टी में हम सपरिवार पटना में थे । एक शाम एक गहरे मित्र भोजन पर आमंत्रित किए। उनके घर गया तो उनका दो चार साल का बेटा बहुत रो रहा था। बहुत। उसकी मां परेशान परेशान । थोड़ी देर बाद मेरी पत्नी ने उसे अपने गोद में लिया और हनुमान चालीसा पढ़ने लगी । देखते देखते वो शान्त ही नहीं हुआ बल्कि सो भी गया ।
मेरे मन में यही बात आईं की हनुमान चालीसा महज एक कविता है और कविता में इतनी शक्ति कहां से आई । सैकडो साल से उस कविता को करोड़ों लोग रोज अपनी श्रद्धा से उसका जाप करते है । श्रद्धा और जाप का असर है कि उस कविता में इतनी शक्ति है । श्रद्धा विश्वास पैदा करता है और जाप एक ख़ास तरह कि ऊर्जा ।
कुछ साल पहले एक मित्र से थोड़े दिनों बाद एक समारोह में मुलाकात हुई , मेरी व्यक्तिगत श्रद्धा उसके लिए अनन्त थी और जैसे ही मैंने उसे देखा , मुझे ऐसा लगा कि मेरे अन्दर एक ऊर्जा का संचार हुआ । और ऐसा मेरे साथ हर बार हुआ । उसके अन्दर कितनी शक्ति , मुझे नहीं पता लेकिन मेरे अन्दर उसके लिए अनन्त विश्वास था और शायद उस श्रद्धा और विश्वास का असर था कि मै क्षण भर में खुद के अन्दर ऊर्जा पाता था । बाद में , मैंने उसका नाम ही क्वांटा रख दिया था । हा हा हा – ऊर्जा का पैकेट :))
~ माता पिता इतने शक्तिशाली क्यों होते है ? खून के रिश्ते के साथ साथ एक विश्वास । कई दफा लोगों की अपेक्षा अपने माता पिता से इतनी हो जाती है उम्र के आखिरी पड़ाव तक उनसे शिकायत होती है । लेकिन इस विश्वास की शक्ति आप कहीं भी पैदा कर सकते हैं और कहीं भी पा सकते हैं । शायद यह पहली नजर का कमाल होता है जब आपका दिल नहीं बल्कि आत्मा स्वीकार करती है । शरीर खत्म हो जाता है , दिल टूट सकता है लेकिन आत्मा नश्वर है । और जहां आत्मा गवाही देता है , वहीं ईश्वर होता है । मुझे अन्य धर्मों का नहीं पता , जहां मेरा विश्वास है – वहीं मेरा ईश्वर है । लेकिन यह सिर्फ पहली नजर नहीं बल्कि कई बार लगातार एक बिलिफ सिस्टम में रहने से भी होता है । इस पर लेख बहुत लंबा हो जायेगा ।
~ लेकिन ऐसी कई घटनाओं की अनुभूति होना भी अपने आप में एक शक्ति है । इस शक्ति का एहसास तभी होगा जब आप ध्यान मग्न होंगे । कोई अंत्र मंत्र की ज़रूरत नहीं । इस नवरात्र आप नौवें दिन मुझसे आंख नहीं मिला सकते :)) इतनी इंटेनसिटी होती है कि यह सिर्फ और सिर्फ दुर्गा को शक्ति है ।
जहां साधक है , वहीं देवी है या जहां देवी है वहीं साधक है 🙏❤️🙏
: रंजन , दालान

नवरात्र – ४ , २०२०

~ प्रेम में बहुत शक्ति है । लेकिन हर किसी की चाह अनकंडीशनल प्रेम की होती है । हा हा हा । मुझे लगता है – यह प्रेम सिर्फ और सिर्फ मां से ही प्राप्त होता है लेकिन इसमें भी एक कंडीशन है – आपको उन्हीं के कोख से जन्मना होगा । हा हा हा । हां , कई दफा हमें ऐसा लगता है कि सामने वाला हमे अनकंडीशनल प्रेम कर रहा है लेकिन ऐसा प्रतीत होना भी गलत है । दरअसल , वह आपसे प्रेम तो कर रहा है लेकिन आपसे अपेक्षा भी रख रहा है । अब आप उसकी कसौटी पर नहीं उतरे तो वो आपसे बदला नहीं लेे रहा बल्कि माफ कर देे रहा है । इसका कतई मतलब नहीं कि वो आपसे अनकंडीशनल प्रेम कर रहा है ।
~ कहीं किसी फिलॉसफर को पढ़ा कि महिलाएं माफ तो कर देती है लेकिन पुरुष माफ नहीं कर पाते । वहीं , पुरुष भूल तो जाते है लेकिन महिलाएं भूल नहीं पाते । इस पर एक लम्बा चौड़ा लेख भी कुछ एक वर्ष पहले लिखा था । मुझे लगता है, उम्र के साथ पुरुष भी माफ करना जान जाते हैं । यह कोई उनके हॉर्मन बैलेंस का बात नहीं होता बल्कि उन्हें अब इस संसार से विदाई के द्वार आभास होने लगते है । पुरुष जानवर के नजदीक होते हैं , तमाम उम्र / जवानी तरह तरह कि लड़ाई लड़ते है । लड़ाई का मतलब मार पीट नहीं बल्कि द्वंद्व भी हो सकता है । स्त्रियां द्वंद्व में नहीं होती और शायद इसलिए वो पुरुषों की इस लड़ाई को समझ नहीं पाती । तमाम उम्र घर से बाहर काम करने वाली महिलाओं का मन भी अन्दर की दुनिया / आंगन में ही होता है और तमाम उम्र पुरुष को कमरा में कैद कर दीजिए तो भी उसका मन बाहर की दुनिया में होता है । उदाहरण के लिए , मेरा पेट डॉग गूगल मेल है । दिन भर दरवाजे के पास बैठा रहता है कि जैसे गेट खुले और वो नजर बचा कर सीधे बाहर के प्रागंण में , जहां तक वो सूंघते सूंघते चला जाए :))
~ तो बात है प्रेम , माफी और भूलने की शक्ति । पुरुष को भूलने की शक्ति उसके ज़िन्दगी के सफ़र में एक वरदान है । अगर वो नहीं भूलेगा तो उसका सफर बीच किसी रास्ते अटक जायेगा । स्त्री के अन्दर माफ करने की शक्ति है वरना उसके साथ दुनिया में इतने जुल्म होते है कि वो बगैर माफ किए खुद खत्म हो जायेगी । पुरुष माफ करने लगे तो वो अपनी प्रकृति के हिसाब से लड़ाई हार जायेंगे और स्त्री भूलने लगे तो उसके मन की कोमलता ख़त्म हो जायेगी :))
~ लेकिन प्रेम तो सर्व शक्तिमान है । भावना के आगे सभी नतमस्तक हैं । गूगल / ट्विटर / या सोशल मीडिया के किसी भी अंग पर सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाने वाला शब्द ’ लव ’ है । इसकी क्षमता अनन्त है । इसके कई रूप है और हर सम्बन्ध का प्राण है । हालांकि रोमांटिक प्रेम एक ज़िद या अहंकार के साथ होता है जहां अलग अलग कंडीशन होते हैं । तभी इसे कभी पूर्ण प्रेम नहीं कहा गया । इन्द्रियों के आकर्षण से पैदा लिया प्रेम कब भटक जाए – कहना मुश्किल l
विशेष क्या लिखा जाए …मौसम में ठंड प्रवेश कर चुका है …देवी की कल्पना ही मन को प्रफुल्लित कर देती है …कभी साक्षात आ जाए तो क्या हो … :))
: रंजन , दालान

नवरात्र ~ ३ , २०२०

Devi #Shakti #NavRatra :

~ शक्ति आती है , आपको छूती है , आपसे अच्छे या बुरे कर्म करवाती है और फिर वही शक्ति क्षीण हो जाती है । यह शक्ति किसी इंसान विशेष , परिवार , टोला या मुहल्ले या किसी समुदाय के साथ अटैच हो सकती है । लेकिन शक्ति के विलुप्त होने के बाद भी उसकी आभा अगले कई सेकेंड , मिनट , घण्टे, दिन, महीना , वर्ष , या दसक तक बरकरार रहती है जिसके नशे में पात्र भी रहते हैं और उसकी इज्जत अन्य भी करते हैं लेकिन पात्र को यह समझना होगा कि अब शक्ति जा चुकी है या शक्ति का प्रभाव खत्म हो चुका है ।
~ ईश्वर , प्रकृति के बाद तीसरी जो सबसे बड़ी शक्ति है – वो है समाज । इस समाज के गठन में हजारों साल लगे और विडम्बना देखिए कि यह अधिकांश लोग इसी समाज की शक्ति में फंस कर अपनी ईश्वरीय या प्राकृतिक शक्ति को खो बैठते हैं । जैसे आप ईश्वर और प्रकृति से ऊपर नहीं है , ठीक उसी तरह आप समाज से ऊपर नहीं है । लेकिन समाज की अपनी सीमा है । एक मित्र भारत सरकार में ज्वाइंट सेक्रेटरी हैं , लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ कर लौटे हैं । एक दिन मैंने पूछा कि – आएं सर , लंदन के मेट्रो / ट्यूब में सफर करते वक्त भी आप खुद को आईएएस समझ तन के रहते थे , का ? आईआईटियन हैं सो मेरी बात का बुरा तो नहीं माने लेकिन झेंप गए । हा हा हा । फिर भी , आपको समाज की शक्ति को मानना ही मानना होगा । आप जितने लोग सामाजिक पटल पर सफल देखते हैं – वो कोई बहुत हाई आइक्यू के लोग नहीं होते , वो किसी शक्ति के उपासक नहीं होते । उनकी बस यही शक्ति होती है कि वो समाज के फॉर्म्युला को बखूबी जानते हैं और उसमें वो खुद को फिट करना जानते हैं । यह समाज कोई सरकार , संस्था या परिवार हो सकता है ।
और आप सारी समझ रख कर भी दांत चियारते रहते हैं । आपको समाज की प्रकृति को समझना होगा जो इंसानों की प्रकृति से बना है ।
~ लेकिन आपके अंदर एक और शक्ति होती है जो इस फॉर्म्युला को मानने से इन्कार करती है । जब आप अपने से ज्यादा स्थापित शक्ति को चैलेंज करेंगे तो आप या तो कुचल दिए जायेंगे या फिर आप विजेता बनेंगे । तीसरा कोई रास्ता नहीं है ।
हा हा हा …
नवरात्र की ढेरो शुभकामनाएं …ईश्वर ने जो प्रकृति दिया है , उसकी शक्ति के साथ मस्त रहिए :))
: रंजन , दालान

नवरात्र ~ २ , २०२०

~ अभी अभी दो चार दिनों पहले की बात है , हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के एक लेख में यह लिखा था कि अगर आप खुद को कमज़ोर महसूस कर रहे हैं , या डिप्रेशन में हैं या लो हैं फिर एक ऐसे मित्र की तलाश कीजिए जो आपके पूर्व में आपके बेहतरीन दिनों की याद करवाए ।
कहने का मतलब की शब्दों की ताकत । कल्पना कीजिए कि आपका कोई मित्र आपके लिए बढ़िया शब्द बोले , मन एकदम से प्रफुल्लित हो जाता है :))
अगर मेरे इर्द गिर्द कोई नहीं होता तो मै खुद के लिए ऐसे वातावरण तैयार कर लेता हूं । लेकिन यह एक आदत है – सामने वाले की खूबी को देखना और बोलना । बचपन का मेरा एक मित्र है , एकदम जान देने वाला दोस्ती । जब हमारी दोस्ती हुई थी , उस वक़्त उसके परिवार की वित्तीय स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन कालान्तर उसने बहुत पैसा कमाया । टीनएज में कम बुद्धि सो मैंने कुछ गलत शब्द इस्तेमाल कर दिए थे । आज तीस साल बाद भी उसको मेरे नकरात्मक शब्द याद है । कभी कभी वो चर्चा में उस बात को याद कर देता है और मै शर्मिन्दा हो जाता हूं । बात कुछ नहीं थी – मैंने उसे कुत्ता कह दिया था । हा हा हा । लेकिन यह बात उसे चुभ गई । ऐसा मेरे साथ भी हुआ है , मेरे एक सबसे अजीज ने बातों बातों मुझे बौना / बोनसाई पेड़ / सूखा हुआ पेड़ कह दिया क्योंकि मेरे व्यक्तित्व का सिर्फ एक पक्ष उन्हें नजर आया और उस दौरान वो दो अन्य नए मित्रों के लगातार संपर्क में थे । यह बात बुरी तरह चुभ गई । इस कदर चुभी की मै बहुत छटपटा कर , कुछ महीनों बाद खुद को अलग कर लिए । और कोई चारा नहीं था ।
साकारात्मक शब्द लोग भूल जाते हैं लेकिन आपके नकरात्मक शब्द लोगों को याद रहता है । अब मेरी उम्र के लोग जो जीवन के हर एक रंग को लगभग देख चुके हैं , जीवन के पहलू को समझ चुके हैं , ऊंच नीच देख चुके हैं – फिर क्यों तौलना ? अगर सामने वाला आपको तौल दिया तो ? तराजू तो सबके पास होती है , न ।
खैर , हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू के उस लेख में यही था कि आस पास बढ़िया मित्र रखिए जो आपके लिए बढ़िया शब्द बोले । कल एक मित्र से करीब 20 साल बाद मिला , बातों बातों में उसने कह दिया – अब हमारी जिन्दगी में वक्त ही कितना रह गया है कि नया एक्सपेरिमेंट करें । बात उसने सही कही लेकिन थोड़ी नकरात्मक थी । पूरी रात बोझिल रहा ।
सीता गीता , राम श्याम इत्यादि सिनेमा देखें होंगे । कैसे शब्दों की चोट से इंसान को बंधुआ की तरह रखा जाता है । दुर्भाग्य देखिए समाज का , ऐसे नकरात्मक शब्द आपके सबसे अजीज द्वारा ही बोले जाते हैं या फिर साइकोलॉजी है कि उनके ही शब्द आपको चोट पहुंचाते हैं ।
नकरात्मक छूत की बीमारी है । कोरोना से भी खतरनाक । नकारात्मकता से गुजर रहे किसी इंसान से दो मिनट गप्प कर लीजिए , यह नकारात्मकता आपको घेर लेगी । इसकी अपनी ही एक ख़ास शक्ति है । इससे बचने के लिए खुद के मन के इम्यून सिस्टम को मजबूत करना होता है ।
खैर … आज रविवार का दिन । धूप खिली हुई है । बेटा बोल दिया कि आपका ग्रामर का सिर पैर का कुछ पता ही नहीं चलता 😐 आज से रेन और मार्टिन शुरू 😂 कभी कभी टोकना भी बढ़िया होता है :)) शब्दों का प्रभाव ❤️
नवरात्र की ढेरों शुभकामनाएं …
: रंजन , दालान

नवरात्र – १ , २०२०

नवरात्र

सन 2012 से लगातार इस पटल पर शक्ति / देवी की विवेचना करता आया हूं । कुछ एक पाठक अवश्य से ही इसका इंतजार करते हैं । लेकिन यह अनुभव एक गोलचक्कर जैसा है – जहां से चले थे फिर वहीं पहुंच गए :))
लेकिन मै किसी मंज़िल की तरफ नहीं बढ़ा था । बस एक जिज्ञासा हुई और विवेचना शुरू किया । सबसे बड़ी खुशी तब हुई जब 2014/ 2015 / 2016 में मेरे कई लेख मुस्लिम समाज के भाई बहन पढ़े भी , लाइक भी किए और कमेंट भी । बड़ी रोचकता से वो पढ़े क्योंकि शक्ति की विवेचना धर्म से परे है ।
~ शक्ति का मूल उद्देश्य आत्मा की संतुष्टि है । किसी भी तरह कि शक्ति की । जैसे आपके पास बहुत सारा पैसा है तो अपना पासबुक देख पहली अनुभूति यह होनी चाहिए कि आपकी आत्मा प्रफुल्लित हो । लेकिन उस प्रफुल्लता के बाद इंसान संसार में फंस जाता है । संसार उससे उस शक्ति के प्रदर्शन की चाह रखता है । इसके कई वजह हो सकते हैं , शायद संसार में कई लोग उस खास शक्ति के बगैर होते हैं , जो आपकी शक्ति के सहारे खुद को शक्तिशाली महसूस करें इत्यादि इत्यादि ।
लेकिन यह नवरात्र एक ख़ास अनुभव की राते होती है । मुझे कर्मकाण्ड नहीं आता लेकिन अब मै इसके महत्व को समझता हूं । लेकिन जानता नहीं । मूल पूजा – केन्द्रित होना है । मन को बांधना । मन को किसी एक ख़ास जगह केन्द्रित रखना । प्रकृति के बहाव को वश में रखना ही योग है । और पूजा एक योग है । सारी शक्ति आपके मन में है ।
लेकिन शक्ति आयेगी , रुकेगी फिर वो आपको चंचल बनायेगी ही बनायेगी । और इसी चंचलता से बिखराव शुरू होगा और फिर एक दिन वो शक्ति फुर्ररर …हा हा हा । यह शक्ति किसी इंसान की हो सकती है , किसी समाज की हो सकती है , किसी गांव या टोला की हो सकती है ।
~ एक बात जो हमेशा स्त्री समाज कहता है कि पुरुष नवरात्र में देवी / दुर्गा की पूजा तो करते हैं लेकिन आम जीवन में वो आदर आस पास की महिला को नहीं देते । ” एक बात कहूंगा – पूजा किसी स्त्री की नहीं होती है , पूजा स्त्री के एक ख़ास रूप की होती है ” जो स्त्री आपकी प्रेमिका या पत्नी है , वो किसी की बेटी , बहन या मां भी है । जिसके हिस्से में जो रूप आयेगा , वह उसी रूप / नजर के हिसाब से उसे देखेगा । कभी किसी मां की बेइज्जती करते किसी पुत्र को देखा है ? अगर आवेश में कभी हुआ भी तो कौन ऐसी मां है जो अपने पुत्र को माफ नहीं की होगी ? फिर वही स्त्री अपने प्रेमी / पति को माफ क्यों नहीं करती ? बात नजर की है :))
खैर , दुर्गा स्त्री की वो भव्य रूप है जो पुरुष की कल्पना में होती है । सर्वशक्तिमान । कोई इन्हे मां रूप में देखता है तो कोई बेटी रूप में ।
~ मैंने सन 2015 में लिख दिया , दुर्गा को मै प्रेमिका रूप में देखता हूं । हुआ हंगामा । हा हा हा ।
~ पूजा भी अलग है । मै देवी के पास पुजारी रूप में नहीं जा सकता । घोड़े पर सवार उस राजकुमार की तरह जो देवी के पास गया , हाथ जोड़ प्रार्थना किया और उनका सारा आशीर्वाद पल भर में लिया और फिर घोड़े पर सवार आगे की ओर निकल पड़ा । यह कल्पना ही मेरे अन्दर रोमांच भरती है । उस एक क्षण में पूरे जिन्दगी की ऊर्जा मिलती है ❤️
आप सभी को नवरात्र की ढेरो शुभकामनाएं …
: रंजन , दालान , 2020 .

गांधी …

आज से पांच सौ साल बाद कोई विश्वास नहीं करेगा – कोई इंसान महात्मा बन कर – एक धोती में खुद को लपेट कर – वर्षों तक अपने विश्वास को कायम रखा ! “मेरे अन्दर एक सच है और वही सच मेरी लड़ाई को जिंदा रखेगा” – शायद यही जीवन दर्शन रहा होगा – महात्मा गांधी का ! बैरिस्टर थे – बड़े आराम से ज़िंदगी कट रही थी – कट जाती ! एक घटना ने उनके पुरे जीवन दर्शन को बदल दिया – किस कदर उनकी अंतरात्मा को चोट पहुँची होगी – कल्पना कीजिए – दक्षिण अफ्रीका का वो रेलवे स्टेशन – और गांधी को ट्रेन से उतार – उनके सामान को फेंक देना – गांधी ने एक दिन नस्लवादी विचारधारा को ही – इस देश से उखाड़ फेंका !
इंसान के रूप में जन्मे – खुद को महात्मा बनाए – अन्दर की जिद को बरकरार रखे – ‘अहिंसा’ को जीवित रखे – उनकी ‘अहिंसा’ को बहुत गलत ढंग से अपनाया गया है !
आसान नहीं है – उनकी बातों को सचमुच में अपने जीवन में उतार देना – एक बात तो है – इस देश में या कहीं भी – वही हज़ारों वर्ष तक जीवित रहेगा – जिसकी जीवन दर्शन ‘गंगोत्री’ की तरह साफ़ हो – यहीं दिक्कत होती है – जीवन के सफ़र में खुद की गंगोत्री कब मैली होकर कितने ज़हर फैलाती है – मालूम नहीं !
शायद मेरी नज़र में – वो कहते हैं – सामने वाले के अहंकार को जरुर ध्वस्त करो – ध्यान रहे – उसके अहंकार को ध्वस्त करते वक़्त – उसकी अंतरात्मा को न चोट पहुंचे – अगर वो जिद्दी है – फिर एक और महात्मा बन जाएगा – तुम्हारे वजूद को ही उखाड़ फेंकेगा !
गलत और सही कुछ नहीं होता – जो आपके मन में मजबूती से बस जाए – वही सही है – बशर्ते आप ‘महात्मा’ की तरह ‘जिद’ वाले हों ..:))
~ रंजन ऋतुराज / दालान / 02.10.2013

राष्ट्रकवि दिनकर की जयंती

दिनकर जी

आज राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर की जयन्ती है – जिनकी रचनाओं की धूम पुरे विश्व में रही हो – उनपर मै क्या लिखूं या न लिखूं – सिवाय इसके की – उनकी शब्दों को ही दोहराऊँ – वीर रस में डूबे उनके शब्द तो हमेशा से हमारे आपके मन को एक शक्ती देते आये हैं – अनायास ही उनकी जयन्ती की पूर्व संध्या पर उनकी बेहतरीन रचना जिसके लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला – “उर्वशी” को पढ़ा – बड़े इत्मीनान से सारी रात पढ़ा – ‘पुरुरवा’ और ‘उर्वशी’ के बीच के संवाद को – ‘पुरुरवा’ की विशालता को देख …’उर्वशी’ पूछ बैठती हैं – “कौन पुरुष ..तुम” …यह एक वाक्य का संवाद अपने आप में एक नारी के मन को कह देता है ….अद्वितीय रचना …जहाँ कल्पना भी रुक जाती है …थक हार कर शब्दों के साथ बह जाती है …और उस विशाल सागर में मिल जाती है …कभी फुर्सत में पढ़ें …’उर्वशी’ ….:))

वहीं से कुछ …दिनकर जी की श्रद्धांजलि में ….

पर, न जानें, बात क्या है !
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता ,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता.

विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.
………
“रूप की आराधना का मार्ग
आलिंगन नहीं तो और क्या है?
स्नेह का सौन्दर्य को उपहार
रस-चुम्बन नहीं तो और क्या है?”

सिर्फ शब्दों के हेर फेर कर देने से कविता नहीं बन जाती – किसी भी कविता में अपनी कल्पना को उसके हद से भी आगे ले जाना पड़ता है – शब्दों से एक चित्र बनानी पड़ती हैं – और उसे अपने जीवन दर्शन से सजाना पड़ता है …जो भी देखे मंत्रमुग्ध हो जाए ….
फिर से एक बार फिर ….इस महान साहित्यकार को नमन !
~ 23 Sep 2013 / RR / #Daalaan #DaalaanBlog

एक लेखक – चिंतक से ज़्यादा आकर्षक कोई और व्यक्तित्व नहीं होता , उसके चेहरे पर चिंतन की आभा केंद्रित हो जाती है और वो जबरदस्त आकर्षण पैदा करती है । बात रंग , रूप , कद , काठी या बाहरी आवरण की नही है – बात उस आभा की है जो उस चेहरे पर विद्यमान होती है … :)) और जब वह चिंतन पद्द या गद्द के रूप आमजन के बीच आता है , फिर उन शब्दों की जादू वर्षों ही नही बल्कि सदियों कायम रहती है ।

दिनकर उर्वशी के परिचय के अंत में लिखते हैं –
“किंतु, उस प्रेरणा पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं जिसने आठ वर्ष तक ग्रसित रख कर यह काव्य मुझ से लिखवा लिया।
अकथनीय विषय !
शायद अपने से अलग करके मैं उसे देख नहीं सकता; शायद, वह अलिखित रह गयी; शायद, वह इस पुस्तक में व्याप्त है। “

~ रामधारी सिंह दिनकर , पटना
23 जून, 1961 ई.

खोजता पुरुष सौन्दर्य, त्रिया प्रतिभा को,
नारी चरित्र-बल को, नर मात्र त्वचा को।
श्री नहीं पाणि जिसके सिर पर धरती है,
भामिनी हृदय से उसे नहीं वरती है।
पाओ रमणी का हृदय विजय अपनाकर,
या बसो वहाँ बन कसक वीर-गति पा कर ।
~ दिनकर

श्रद्धा और विश्वास …एक छोटी कहानी …

शायद काफी पहले …करीब पचीस – छब्बीस साल पहले …दूरदर्शन पर हर शुक्रवार एक सीरियल जैसा ही आधे घंटे का प्रोग्राम आता था – कथा सागर ! विश्व की बेहतरीन कहानीओं पर आधारित – श्याम बेनेगल भी कई एपिसोड डाइरेक्ट किये थे – कई कहानी आज तक याद है – रेनू की कहानी ‘पञ्चलाईट’ पर भी एक एपिसोड बना था !
एक कहानी थी – कुछ अनपढ़ लोग ईश्वर के भक्त हो जाते हैं – कुछ जप तप करने लगते हैं – पर उनको सही ढंग से नहीं पता – गलत उच्चारण – जैसे तैसे – पर पुरी श्रद्धा से – उनकी परीक्षा कुछ ज्ञानी लोगों द्वारा ली जाती है – उनको एक लबालब नदी से आर पार करना होता है – अपने जप तप की शक्ती से – सभी ज्ञानी को यही लग रहा था – ये अनपढ़ क्या नदी पार करेंगे – डूब जायेंगे – पर वो नदी पार ही नहीं किये – बल्की नदी को ऐसे पार किये जैसे वो किसी सड़क पर चल रहे हों – यह देख ज्ञानी अचरज में पड गए – भगवान् के पास गए – बोले – ये क्या – जिसे मंत्र का उच्चारण भी नहीं पता – उसमे इतनी शक्ती कैसे ? भगवान् ..मुस्कुराए …बोले …श्रद्धा है …अन्दर से …और हम वहीँ रहते हैं …वही देखते हैं !

~ रंजन / दालान / 19.09.2012

आदर्श …

मुझे नहीं लगता – हम अपने आदर्श ‘भगवान् बुद्ध’ / ‘महात्मा गांधी’ जैसे महापुरुषों में खोजते हैं – आदर्श हमेशा से आस पास के लोग ही होते हैं – भगवान् बुद्ध के साथ घूम रहे उनके चेलों के लिए ‘बुद्ध’ आदर्श रहे होंगे – नेहरु / पटेल के लिए महात्मा गांधी आदर्श रहे होंगे – पर हमारे लिए – वैसे ही लोग – जिन्हें हम देखे हों !
माता पिता के अलावा भी कई ऐसे लोग होते हैं – जिनकी खुबीयाँ हमको आकर्षित करती हैं – जैसे दादा / दादी , नाना / नानी , कोई गुरुजन , कोई सीनियर बॉस ….कोई भी ! एक ख़ास समय में ..जब हमें जरुरत हो ..उनके द्वारा उसी समय कही गयी कोई बात या उनका आचरण हमें इस कदर प्रभावित करता है – हम आजीवन उसको कैद रखते हैं फिर धीरे धीरे उनकी बात या उनका आचरण हमारे जीवन में प्रवेश करने लगता है !
मै कोई गलत या सही आचरण की बात नहीं कर रहा हूँ – बात है – आप किस वातावरण में पल बढ़ रहे हैं – अगर आपके इर्द गिर्द ‘बाहुबली’ लोग ही हों – और अगर आपका झुकाव भी उस तरफ हो – फिर उन बाहूबलीओं में ही आप अपने आदर्श खोजेंगे – उनकी जीवन शैली को अपनाने की कोशिश ….कुछ भी !
आपका आदर्श कैसा है …कौन बने …इसकी भी बहुत सारी वजहें होती हैं …आप कैसे पले – बढे से लेकर …आपको क्या लुभाता है …से लेकर ..आप किस चीज़ की कमी महसूस करते हैं …कई वजहें हैं …जिन्हें हम व्यक्तिगत जीवन की मान्यताएं कह सकते हैं …
बहुत कुछ है …समझने – सोचने को …व्यक्तित्व निर्माण एक कठिन एवं जटिल प्रक्रिया है …जो किताबों में नहीं मिलती ..:))
~ #ranjanrituraj #daalaan 18.09.2013
तस्वीर साभार ~ रंजन ऋतुराज / 18.09.2017

धर्माधिकारी …

आज से बहुत साल पहले की बात होगी – तब हम ग्रेजुएशन में थे – अचानक अखबार में छपी एक खबर आँखों के सामने आयी – खबर थी – विश्व प्रसिद्द “मनिपाल ग्रुप” के पाई बंधुओं में संपती को लेकर विवाद ! तब और आज भी ‘मनिपाल ग्रुप’ बहुत फेमस है ! खबर आने लगी – दोनों भाई के बीच उनका ‘शीपिंग’ के बिजनेस को लेकर कुछ लफड़ा था – तब ही हमको पता चला बड़े लोग अपने शीप ( समुद्री जहाज ) रखते हैं – उसके पहले हॉलीवुड स्टार को ही अपने नौका के बारे में सुना था – अब तो एक साधारण सा नदी वाला नाव बनाने में दस पंद्रह लाख तक का खर्च है !
खैर …बड़े अचरज की बात सामने आई – पाई बंधू किसी कोर्ट कचहरी में नहीं गए – बल्की उड़पी के पास के ही एक ‘धर्माधिकारी’ के पास गए और रातों रात बंटवारा हुआ और दोनों खुश ! शायद इसके कुछ समय पहले ही – धर्माधिकारी नाम से राजेश खन्ना की एक सिनेमा भी आयी थी – हालांकी मैंने नहीं देखा था – पर कानों में वो शब्द पड़े थे !
पर हम थोड़े परेशान हो गए – लगा – आखिर उस धर्माधिकारी में कौन सी बात इतनी ख़ास की देश का इतना बड़ा ग्रुप उसके पास – वो ना तो डॉक्टर है – ना ही कोई वैज्ञानिक – ना कोई वकील – ना कोई राजनेता – आखिर उसका व्यक्तित्व कैसा होगा – क्या न्याय उसकी स्वभाव हो गयी ?
दरअसल आपके व्यक्तित्व निर्माण में आस पड़ोस / घर परिवार के अलावा भी कई ऐसी घटनाओं / व्यक्ती का अनजाने में योगदान होता है बशर्ते आप कितना गौर फरमाते हैं !
क्रमशः
Rajesh Kumar Singh writes :

Only Dharmadhikari of that area is, Dr. D Veerendra Heggade, Dharmadhikari of sri Kshetra Dharmasthala. I have studied in SDM (Sri Dharmasthala Manjunatheshwara) institutions, controlled by this Man, a Jain who ironically presides over the most famous Shiva Temple of Southern India.He is also nicknamed ‘Rajarshi’ for Dharmasthala is a Kingdom in reality, owning thousands of acres of land, hundreds of Institutions and thousands of crores. Beside the temple, you will find a Car Museum which exhibits hundreds of imported cars, his personal selection! Several Prime Ministers and Presidents of India have paid visit to that village deep in Western Ghats forests to have his blessings. Political leaders of all affiliations in Karnataka swear by his acumen and visit him to have his advice. All over South Canara, North Canara, Mangalore, Udupi and Hubli-Dharwad districts of Karnataka you will find a picture of Heggadeji in almost every home.

23.04.2013 / दालान

इंजीनियर्स डे …

आज सर एम विश्वेसरैया जी का जन्मदिन है ! आज के दिन उनकी याद में भारत में ‘इंजीनियर्स डे ‘ भी मानते हैं ! उनको किस किस पदवी से नहीं नवाजा गया – कहना मुश्किल है ! मैसूर राज्य के दीवान / भारत रत्न और भी बहुत कुछ ! मैसूर का फेमस वृन्दावन गार्डेन / स्टेट बैंक ऑफ़ मैसूर ..यूँ कहिये ..कर्नाटका / मैसूर ही नहीं …पुरे दक्षिण भारत यहाँ तक की ग्वालियर तक उनकी बेमिसाल सीविल इंजीनियरिंग की झलक मिल जायेगी ! विरले लोग ऐसे पैदा होते हैं – करीब १०२ साल तक वो जिंदा रहे और समाज को अपना योगदान देते रहे !
अब इंजिनियर नहीं बन रहे – पढ़े फारसी बेचे तेल – चार साल पढ़ा – मैकेनिकल – नौकरी क्या कर रहा है – आईटी – मिडिल क्लास की मजबूरी भी है – छः साल तक साईंस पढ़ा – सब बेकार – दो साल एमबीए किया – चल दिया साबुन तेल बेचने 😦
अभी पढ़ रहा था – ब्रिटेन की रोयल एकेडमी ऑफ़ इंजीनियर्स ने नोबेल प्राईज़ के तर्ज़ पर पुरे विश्व में इंजिनीअरिंग के बढ़िया डिजाईन को पुरस्कार देगी – ज्यूरी में अपने दुसरे मैसूर वाले – नारायण मूर्ती भी हैं – इन्फोसीस में भी – इंजीनियरिंग डिजाईन को लेकर कुछ साल पहले कुछ काम किया था – नारायण मूर्ती बोले – सब बेकार – कुछ नहीं मिला – कोई नहीं मिला !
जब तक डिजाईन नहीं – इंजीनियरिंग नहीं – डिस्कवरी / नेशनल जिओग्राफी पर कुछ कुछ आता है – देखेगा कौन – स्मार्ट फोन में तो फेसबुक लोड है 😦
~ 15 September 2012

एक कहानी …

एक बहुत ही अमीर परिवार होता था । बहुत बड़ा महल था । लेकिन एक दिक्कत थी , महल के ठीक बगल वाले ज़मीन में एक गरीब परिवार हंसी खुशी रहता था । वो गरीब परिवार दिन भर की मेहनत मजदूरी कर के एक रुपया कमाता था और शाम तक उस परिवार का वो एक रुपैया खा पी के खत्म हो जाता था । फिर वो गरीब परिवार आधी रात तक ढोल बजाता , नृत्य करता और आसमां के खुले आंगन में सो जाता था । एक खास बात थी , वह गरीब परिवार पूरे दिन में एक ही रुपैया कमाता था ।
महल वाला अमीर परिवार जब सोने जाता , उनके कानों में पड़ोस वाले गरीब परिवार के ढोल – बताशा की आवाज़ आती , जिससे अमीर परिवार के नींद में खलल पड़ती । एक दो दफा अमीर परिवार के मुखिया ने उस गरीब परिवार के आदमी को बुला कर डांटा फटकारा भी लेकिन कोई असर नही हुआ , गरीब परिवार दिन भर में एक रुपया कमाता और आधी रात तक ढोल बताशा और नृत्य करता ।
एक दिन अमीर परिवार के मुखिया को एक आईडिया आया और उन्होंने गरीब परिवार के आदमी को बुलाया । और बोला – तुम लोग हर रात बहुत बढ़िया ढोल बताशा बजाते हो , हम सभी बहुत खुश हैं और ईनाम में 99 रुपैया दे रहे हैं । गरीब परिवार का आदमी बहुत खुश हुआ और 99 रुपये लेकर अपनी झोपड़ी में लौटा, परिवार वाले बहुत ही खुश हुए , वो बेचारे तो महज एक रुपैया ही कमाते थे , कभी एक साथ 99 रुपये नही देखे थे । अचानक उस गरीब परिवार का एक काबिल लड़का बोला , काश ये 99 रुपये , 100 के नम्बरी नोट में बदल जाते । उस गरीब आदमी को बात पसंद आई । लेकिन दिक्कत थी – पूरा परिवार मिल के पूरे दिन में एक रुपया ही कमाता , कभी किसी दिन एक पैसा भी नही बचता था । अब 99 सिक्के रुपैया को 100 के नोट में कैसे बदला जाए ।
एक दो दिन बाद पूरा गरीब परिवार इस चिंता से ग्रस्त रहने लगा कि कैसे 99 सिक्के को 100 के नम्बरी नोट में बदला जाए ।
ढोल बताशा , नृत्य सब बंद हो गया ! अब इस गरीब परिवार को 99 का चक्कर लग गया ।
अमीर परिवार को देर रात पड़ोस से ढोल बताशा की आवाज़ आनी बंद हो गयी , और वो चैन से सोने लगे 😉
~ बचपन मे सुनी हुई एक कहानी , 15.09.2017

हिन्दी दिवस …

आज हिंदी दिवस है – बचपन में ईकार को लेकर बड़ी मार पडी है – शब्दों के स्त्री लिंग / पुलिंग को भी लेकर – बताईये तो महाराज – एक बच्चा क्या क्या समझे 😦 ? ये बात हम पूछते भी तो किससे पूछते 😦 जिससे पूछते – वही दो चटकन देने को तैयार रहता – “घी, दही हाथी , मोती , पानी ” – ये सब पुलिंग हैं …बाकी के वो सारे शब्द जो दीर्घ ईकार से बने हैं – सभी स्त्रीलिंग – लीजिये , फोर्मुला आ गया ! मैट्रीक में सबसे कम नंबर हिंदी और अंग्रेज़ी में आये – गणीत / विज्ञान / संस्कृत में बहुत ज्यादा – हिंदी / अंग्रेज़ी में जस्ट पास …:( पूरा परसेंटेज घींच के निचे 😦
भाषण देना और लेख लिखना – बढ़िया लगता था – डॉ वचन देव कुमार से तनिक भी कमज़ोर लेख नहीं लिखते थे – व्याकरण से कोई लेना देना नहीं – बचपन में सिखाया गया – ” भाषा और सभ्यता दोनों हर चार कोस पर बदल जाती है ” – फिर ये व्याकरण कहाँ से आया ..भाई ? जब हर चार कोस पर बदल ही जाना है – फिर काहे को इतना हेडेक लें …हर समझदार भाषा लचीली होती है …समय / जगह के हिसाब से खुद में बदलाव – शुद्ध भाषा होना मतलब – अपने अस्तित्व पर ही खतरा !
अपनी अंग्रेज़ी को ही देखिये – समुन्दर है – हर साल टाइम्स ऑफ़ इण्डिया में एक खबर – ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी वालों ने फलाना – फलाना शब्द जोड़ लिए ..संस्कृत / लैटिन / अरबी ..संभवतः अपने आप में एक पूर्ण भाषा हैं …
ज्यादा हमको जानकारी नहीं है ..भाई …आठवां – नौवां में हिंदी पढ़े थे ..बस …जी भर पढ़े …उसके बाद ..जो बोलते हैं…वही लिखते हैं …
पर अब …थोडा बढ़िया ..बोलना – लिखना चाहते हैं …:))

रंजन / दालान / १४.०९.२०१३

हिंदी की जिम्मेदारी किन कन्धों पर होनी चाहिए – यह महत्वपूर्ण है ! सबसे ऊपर हैं – हिंदी के पत्र पत्रिका और पत्रकार – ये वो हैं जिन्हें हम हर रोज सुनते पढ़ते हैं – हिंदी को आकर्षक बनाने की जिम्मेदारी इन कन्धों पर है – जब तक यह आकर्षक नहीं बनेगी तब तक यह जन मानस को अपील नहीं करेगी और समाज हमेशा अपनी खूबी और गन्दगी दोनों ऊँचे तबके से लेता है – “बहाव हमेशा ऊपर से निचे होता है “- हिंदी को समाज के उस तबके में अपनी पैठ बढानी होगी ! कई बेहतरीन पत्रिका बिलकुल नीरस हो चुकी हैं – कालिदास / दिनकर / निराला / जयशंकर प्रसाद को लोग हर रोज नहीं पढ़ते हैं –
दूसरी बात – साहित्य / सिनेमा इत्यादी हमेशा काल को दर्शाता है – आज के दौर के बच्चों को प्रेमचंद के किस्से की कल्पना में ढालने में बहुत दिक्कत होगी – जुम्मन शेख जैसे पात्र जब तक उनके आँख के सामने नहीं आयेंगे – वो कहानी का मर्म नहीं समझ पाएंगे – समाज का एक बड़ा तबका शहरों और विदेशों में पल बढ़ रहा है – यह वही तबका है जो हर चीज़ों का मापदंड निर्धारीत करता है – दुसरे भी उसी को फौलो करते हैं – निराला / दिनकर इत्यादी के अलावा भी कई साहित्यकार हैं जिन्हें पढ़ा जाता है – उनको जमाने के हिसाब से अपनी कथाएं लिखनी होंगी ..लिखी भी जा रही हैं …पर मौलिकता के चक्कर में वो कभी कभी गंदी भी दिखने लगती हैं ….
कई बार समाज लिड करता है – कई बार समाज को दिशा दिखानी पड़ती है – हिंदी अखबारों के पत्रकारों के लिए यह बहुत आसान है – पर दुःख है – अंग्रेज़ी की नक़ल में वो बड़े बेढंगे दिखते हैं और तब एक दर्द होता है ! जो बढ़िया लेख हैं – समाज में जो कुछ असल में हो रहा है वो सब उसी रूप और रंग में हिंदी में भी नज़र आनी चाहिए !
हाँ …पढने वालों को भी अपनी परीपक्वता बढानी होगी …और मेरा यह मानना है …परिपक्वता पढ़ते पढ़ते बढ़ जायेगी ….
~ 14 September 2014 / दालान

हिंदी पत्रिकाएं अपने बूते नहीं चलती और फलतः बीच रास्ते में ही दम तोड़ देती हैं। अपने बचपन को जब याद करते हैं तो चंदामामा की पहली याद आती है। फिर मित्र प्रकाशन की मनमोहन।१९५५-५६ में पराग का प्रकाशन आरम्भ हुआ जिसकी अतिथि संपादक कामिनी कौशल जी थी। पराग के देखा-देखी नंदन का प्रकाशन आरम्भ हुआ। चुन्नू-मुन्नू,बालक आदि का प्रकाशन बच्चों को ज्ञान वर्धन के लिए मील का पत्थर साबित होने वाली थी। किन्तु आपसी स्पर्द्धा के कारण शिव पूजन सहाय तक बालक को युवा नहीं बना सके। देखा-देखी कई समाचार प्रकाशकों ने हिंदी क्षेत्र में बाल पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया,जिसमें कलकत्ता से प्रकाशित अमृत बाज़ार पत्रिका ने आनंद मेला ने पकड़ मजबूत की। एक बात गौर करने वाली है कि अधिकाँश बाल पत्रिकाएं गैर हिंदी संगठनों ने आरम्भ किया क्योंकि उन्हें इनमें लाभ नज़र आया। चंदामामा दक्षिण भारत से निकलती थी। मनमोहन मित्र प्रकाशन (बंगाली परिवार) से निकलती थी। आनंद मेला भी बंगाल से ही निकली। इसी प्रकार कई प्रकाशन लाभ के कारण पत्रकारिता जगत में आये और फिर कुछ दिनों में समेट कर निकल पड़े। इसी प्रकार हिंदी की अन्य पत्रिकाएं भी ,यथा धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान,सारिका आदि ,दम तोड़ कर ख़त्म हो गयी। एक पत्रिका कहानी नाम की निकलती थी, जिसकी कहानियाँ कलेजे को छूती थी। ज्ञानोदय,नवनीत जैसी ना जाने कितनी साहित्यिक पत्रिकाएं हिंदी पाठकों के बीच अपनी पैठ जमा ली थी,पर वह भी चली गयी। कुछ समय उपरांत नया ज्ञानोदय नाम से छपने लगी किन्तु मासिक से द्वै मासिक हो गयी ,पर रुक-रुक कर निकलती है। प्रेमचंद जी की हंस का पुनर्प्रकाशन उनके पुत्र अमृत राय ने आरम्भ किया और हिंदी साहित्य जगत को काफी उम्मीदें थी,पर संभवतः अमृत राय और श्रीपत राय के आपसी मनमुटाव में उसके प्राण पखेरू तिलमिलाने लगे तो राजेन्द्र यादव नें हंस का संपादन अपने हाथ में ले लिया। हंस ठीक ही चल रहा था पर फिर उसका भी अवसान हो गया। इसी प्रकार ना जाने कितनी पत्रिकाओं ने जन्म लिया और ना चल पाने के कारण बंद कर दी गयी। हमने तो बड़े चाव से इन पत्रिकाओं को सहेज कर रखा था।वर्ष १९५५ से धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दूस्तान ,सारिका आदि का संग्रह मैंने १९७१ के फरवरी महीने तक रखा।मार्च में मेरी बदली झरिया हो गयी तो माँ ने सारी पत्रिकाएं रद्दीवाले को बेच दी। बाद में जब पता चला तो मन मसोस कर रह गया। माँ के अनपढ़ होने का नुकशान मुझे उठाना पड़ा। इसके बाद मैंने संग्रह करना बंद कर दिया। बस खरीदता,पढता और बेच देता। लेकिन मन के एक कोने में साहित्य का कीड़ा जमा रहा और वह पिछले पांच-छह वर्षों पूर्व निकला। किन्तु इस बीच हिंदी की पत्रिकाओं की दुर्दशा देखता रहा, पर कुछ कह और कह नहीं सका था ।आज रंजन जी ने प्रसंग छेड़ा तो मन बिफर गया और अपनी यादों की पिटारी से कुछ नामचीन पत्रिकाओं को स्मरण कर लिया। धन्यवाद रंजन जी।
~ बालमुकुंद द्विवेदी / 14.09.2015 / कमेंट के रूप में

छवि …

दिन की थकान और देर शांत रात – मन में हलचल पैदा करती है – वहीं से मिज़ाज के हिसाब से विचार उत्पन्न होते हैं ।
मैंने कुछ दिन पहले ‘छवि’ को लेकर लिखा था । कई बार लिखा और सोचता हूँ – कोई भी इंसान एक ख़ास छवि में कैसे हर वक़्त बँधा रह सकता है । यह मेरी सोच वर्षों पुरानी है – जब मैं प्लस टू में था और छवि को लेकर एक संघर्ष था ।
जब प्रकृति ही एक छवि में रहने को इजाज़त नहीं देती है – समाज एक इंसान को अलग अलग छवि में रहने को कहता है फिर सामने वाला उससे एक ख़ास छवि की डिमांड क्यों करता है । कुछ अजीब नहीं लगता ?
आप एक ख़ास नक़ाब कब तक पहन रखेंगे ? चरित्र का वेग इतना तेज़ होता है कि वह नक़ाब को ज़्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पाता । चरित्र उभर कर आ ही जाता है – क्योंकि वह ईश्वरीय दें है ।
मैं एक शिक्षक था – स्वभाव से मज़ाक़िया । दिन भर कॉलेज में एक आदर्श व्यक्तित्व का नक़ाब ओढ़े ओढ़े थकान हो जाती थी तो दोस्तों के साथ समय :)) ऐसा हर किसी के साथ होता है ।
क्योंकि सबसे ऊपर है – इंसान का मिज़ाज । अब आप किस मिज़ाज में उसे देखते हैं – और आप वहीं से उसके लिए एक छवि बना लेते हैं । पर यह ग़लत है । मैंने अपने एक पुराने लेख में – अमिताभ बच्चन के पटना दौरा का वर्णन किया था – कैसे वो बिना हेयर ड्रेसर के नीतीश से नहीं मिले – मुख्यमंत्री आवास के अंदर वो अपने कार में तब तक बैठे रहे जब तक की उनका हेयर ड्रेसर नहीं आया । वो अपने बाल बिना सँवारे भी जा सकते थे ।
एक बार पढ़ा – हिंदी सिनेमा के कलाकार – राजकुमार गंजे थे – एक सुबह उनका नौकर उन्हें बिना बिग का देख – बेहोश हो गया ।
हर किसी की चाहत की हमें एक सच्चे इंसान से दोस्ती हो – पर क्या हम उस सच्चे इंसान को बर्दाश्त कर सकते हैं ? जब मेरे अंदर हर तरह की भावना – वैसा ही उस इंसान के साथ होगी ।
पर हम सभी को एक फ़ेक / नक़ाब वाला इंसान चाहिए । तभी उर्वशी के परिचय में – दिनकर लिखते हैं – समाज बिना नक़ाब के इंसान को बर्दाश्त नहीं कर पाता है ।
हेलो….एक बढ़िया नक़ाब मुझे भी देना …शरीफ़ वाला …:))

12.09.2016 / दालान

एक कविता …

अहंकार तुम्हारा शस्त्र है
उसके बगैर जीना व्यर्थ है …

शस्त्र के साथ हर जगह नहीं …
इसके बगैर भी हर जगह नहीं ….
अहंकार अग्रज के साथ नहीं ….
कुचल दिए जाओगे …
अहंकार अनुज के साथ नहीं …
घृणा के पात्र बन जाओगे ….
अहंकार प्रेम में नहीं …
दफ़न हो जाओगे ….
अहंकार गुरु के साथ नहीं …
कफ़न में लिपट जाओगे ….

आत्म सम्मान पर जब चोट लगे …
सब भूल जाओ …
अहंकार को कवच बना
खुद को जलाओ …

मानव ही धरती को रौंदता है …
है हिम्मत तो शेर भी डरता है …
यह जीवन बार बार नहीं आता है …
है हाथ में लगाम तो आसमान भी झुकता है …

जीवन अगर युद्ध है …
तुम्हारा अहंकार ही वो अश्व है …

जब अश्व पर चाबूक लगेगा …
हवा के संग बातें करेगा ….
जीने की कला सिखाएगा ….
कुचले हुए आत्म सम्मान को उठाएगा ….

कहाँ शस्त्र उठाना है ….
कहाँ शस्त्र गिराना है …..
यही सिखना जीवन है …..
प्रेम और युद्ध दोनों के बगैर जीवन अधूरा है ….


~ RR / 11.09.2014 / दालान

बेगूसराय …

बेगूसराय

बेगूसराय :
~ इस इलाके कि पहली याद यह है कि बहुत बचपन में रांची से मुज़फ्फरपुर के रास्ते सुबह चार बजे मोकामा राजेन्द्र ब्रिज पर , परिवहन निगम के लाल डब्बा बस पर , मां हमे जगा दिया करती थी – बरौनी रिफाइनरी का जगमगाता टाउनशिप । आधी नींद में बस की खिड़की से झांक उन रोशनियों को देखना । बहुत बढ़िया लगता था :))
~ बेगूसराय की दूसरी छवि यह है कि यहां के लोग बिहार के दूसरे ज़िले से ज्यादा उद्यमी हैं । कारण स्पष्ट है – खेत था , खलिहान था और आज़ादी के तुरंत बाद ही औद्योगिकरण हुआ । गंगा पार मोकामा भी एक औद्योगिक नगर बसाया गया । और कुछ खून और मिट्टी का भी असर । बोली मगही और मैथिली की मिक्स है और व्यक्तित्व में अग्रेषण है , जिसका फायदा भी इन्हें मिलता है और नुकसान भी । महिलाओं को अन्य ज़िले से ज्यादा सामाजिक महत्व और बराबरी का दर्जा है ।
~ बिहार में कम्युनिस्ट क्रान्ति का गढ़ बेगूसराय रहा है । बीहट के लाल – कॉमरेड चन्द्रशेखर बाबू से ज्यादा इज्जत शायद ही कोई बिहारी कम्युनिस्ट पाया हो ।
~ अग्रेशन का हाल यह है कि लोग कहते हैं कि सन 1957 में ही बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्री बाबू के पक्ष में यहां के रामदीरी गांव में मतदान केन्द्र हाइजैक कर लिया गया था ।
~ यहीं के थे – इंटरनेशनल सम्राट कामदेव सिंह । बिहार में जब 1986 में टाइम्स ऑफ इंडिया लॉन्च हुआ तो अपने पहले पन्ने पर कामदेव सिंह के किस्से का सीरीज कई दिनो तक छापा गया । ये वही कामदेव सिंह थे जिनकी छवि उस दौरान रॉबिनहुड की थी और कहते हैं गरीबों की बेटी की शादी में खुलकर अपना सहयोग करते थे और बिहार नेपाल बॉर्डर के हर एक सर सिपाही को सरकार के बराबर का तनख़ाह कामदेव सिंह के तरफ से मिलता था । इंदिरा गांधी के स्वागत में उन्होंने रजिस्ट्रेशन नंबर 1 से 40 तक सफेद एम्बेसडर की लाइन लगा दी थी । तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को अपने बिरादरी के सभी आईपीएस को कामदेव सिंह को मारने में लगा देना पड़ा था । कभी विस्तार से कामदेव सिंह की चर्चा होगी :))
~ बहुत शुरुआत में ही शहर के औद्योगिकरण होने के कारण , यहां बिहार के अन्य जिलों की तरह पैसा कमाना जुर्म नहीं माना जाता । हर घर ट्रक और एक ठीकेदारी करता नवयुवक मिल जायेगा । बिहार के कई बड़े ठीकेदार इस ज़िले से हैं ।
~ एक बात और है । यहां के लोगों में क्षेत्रवाद जबरदस्त है । विश्व के किसी भी कोना में एक बेगूसराय वाला दूसरे बेगूसराय वाला को बस बोली से पहचान मदद को तैयार हो जाता है । पांच लोगों के बीच अगर चार बेगूसराय वाले हैं तो पांचवा खुद ब खुद इग्नोर महसूस करेगा । मिथिला का यही एकमात्र असर यहां है ।
~ बाकी , बेगूसराय तो बेगूसराय ही है । सांसद अपनी मिट्टी के लोगों से नहीं चुनते हैं । मेरा स्कोप भी बनता है 😎
रंजन ऋतुराज / दालान / जिउतिया / 10.09.20

निर्णय …

आईक्यू के एक ख़ास बैंडविथ में – करोड़ों लोग होते हैं पर सामाजिक पटल पर उनके जीवन में बहुत अंतर होता है – उसकी एक ख़ास वजह होती है – ‘निर्णय’ ! जीवन एक सफ़र है और यह एक ऐसा सफ़र होता है – जिसमे ‘मंजिल’ नाम की कोई चीज़ नहीं होती – जहाँ तक जैसे पहुंचे – वही आपकी मंजिल हो जाती है ! पर हर चार कदम पर एक चौराहा होता है और उस चौराहे से किधर मुड़ना है – वहीँ आपका ‘निर्णय’ निर्धारीत करता है आप किधर की ओर रुख कर रहे हैं ! कई बार एक छोटी सी निर्णय आपके पुरे ज़िंदगी को बदल देती है – ये निर्णय सिर्फ इंसान को ही नहीं बड़े से बड़े संगठन से लेकर समूह तक को प्रभावित करती है !
एक उदहारण देता हूँ – अज़ीम प्रेम जी खाने वाले तेल के व्यापार से थे – एक निर्णय लिया – मुझे आईटी में जाना है – विप्रो को दुनिया जान गयी – अम्बानी ने लेट कर दिया – एअरटेल कहाँ से कहाँ पहुँच गयी ! इंसान वही है – उसकी आतंरिक मेरिट भी वही है – उसकी क्षमता भी वही है – बस एक निर्णय उसे आसमां तक पहुंचा सकता है – अगर बात सामाजिक पटल की हो तो !
कई बार निर्णय लेते वक़्त ‘स्टेकहोल्डर’ का भी ध्यान रखना होता है – इंसान कभी अकेला नहीं होता – यह एक भ्रम है की वो अकेला है और उसकी ज़िंदगी सिर्फ उसी की है – कई और लोग उसकी ज़िंदगी से जुड़े होते हैं – जितना बड़ा व्यक्तित्व उतने ज्यादा स्टेकहोल्डर – कई निर्णय में सबका ध्यान रखना होता है – कई बार बिना कुछ सोचे समझे निर्णय ले लिया जाता है – जो होगा देखा जायेगा – इसके लिए अन्दर से बहुत हिम्मत चाहिए होता है – ऐसे ही निर्णय में – हमें कई बार किसी ख़ास की जरुरत होती है – जो हमें बस यह दिलासा दे सके – जाओ आगे बढ़ो – तुम्हारा निर्णय सही है !
कई बार हमें अपने निर्णय के सकरात्मक और नकरात्मक दोनों के अंत तक सोच कर रखना चाहिए – सिर्फ एक पक्ष सोच लेने से – बाद में दिक्कत हो सकती है ! निर्णय और उसके फल में सिर्फ आप नहीं शामिल होते हैं – उसमे कई और लोग भी शामिल होते हैं – वो आपको मदद भी पहुंचा सकते हैं या फिर आपको कमज़ोर भी कर सकते है !
पर किसी भी हाल में …निर्णय लेते रहिये …ज़िंदगी आगे बढ़ते रहने का ही नाम है …:))


~ दालान / 10 Sep – 2014

उम्र …

हर रविवार सुबह नाश्ते के बाद – पान खाने जाता हूँ – मेरे गेट के सामने ही ‘पान वाला’ है – चौरसिया नहीं है पर मेरे गृह राज्य का ही है – कई गलत आदतें छूट गयीं हैं लेकिन हर इतवार पान खाना बंद नहीं होता – जब उसका लाल पिक होठों के बगल से हल्का निकलता है – खुद को दुनिया का सबसे बड़ा इलीट समझता हूँ और इसी नशे में हर वक्त रहता हूँ !
खैर …पान खाने के बाद ..दो कदम आगे बढ़ा ..पान वाला छोकरा बोला – ‘अंकल ..’ – हम ध्यान नहीं दिए ! फिर वो टोका – ‘अंकल…’ . अब बर्दास्त नहीं हुआ – मुड़े और बोले – क्या है रे …हम तुम्हारे ‘अंकल’ लगते हैं ? देंगे दू हाथ घुमा के …दो चार श्लोक गुस्सा में सुना दिए ! अब वो हक्का – बक्का रह गया ! फिर दूसरी गलती किया – बोला – कल भाभी जी ‘भुट्टा’ मंगाई थीं ..उसका पैसा भी बाकी है …अब मेरा पारा चढ गया ! बोले ..मेरी पत्नी को भाभी जी और हमको अंकल जी …तुम्हारा ‘गुमटी’ ( दूकान ) कल से नहीं लगेगा ! 😡
सच में ..भाई लोग ..बहुत दर्द होता है …’अंकल’ शब्द सुन के ! उसका एक रीजन है …मै इस शब्द को बहुत सुरक्षित ढंग से यूज करता हूँ …यहाँ तक की पिता जी के अधिकतर दोस्तों को भी ‘सर’ ही कहता हूँ – अंकल तब के स्थिती में – जब वो बहुत घरेलु / पिता जी के भी आदरणीय हों – तब के स्थिति में !
इण्डिया में सबसे एब्यूजड शब्द है – अंकल !
मेरी हमउम्र महिलायें अगर खुद को किसी से भी ‘आंटी’ कहलाना पसंद करें – वो उनका निर्णय होगा – पर मुझे गैरों से ‘अंकल’ कहलाना पसंद नहीं ! 😡
बात साफ़ ! अब कैटरीना ..किसी दिन गलती से ..सलमान को अंकल बोल दे ..क्या होगा 😉 😝

~ दालान / 9 Sep – 2012 / इंदिरपुरम

शिक्षक दिवस …कुछ दिल से …

बहुत सारे विषय पर लिखने का मन करता है ! कई लोग पर्सनल चैट पर प्रशंषा करते हैं – आगे खुल कर नहीं बोल पाते 🙂 ! आप सभी को मेरा लिखना पसंद आता है – यही बहुत बड़ी बात है ! बहुत सारे लोग जो यह भी जानते हैं की मै एक शिक्षक हूँ – उन्हें यह आशा जरुर होगी की मै शिक्षक दिवस पर कुछ लिखूंगा ! 
एक घटना याद है – उन दिनो “याहू मेस्सेंजर” पर चैट होती थी – एक सज्जन थे – ‘पनिया जहाज’ पर कैप्टन या इंजिनियर ! सुना है वैसे कामो में बहुत पैसा होता है ! खैर , परिचय हुआ – बिहार के थे ! मैंने भी अपना परिचय दिया ! अब वो अचानक बोल पड़े – “शिक्षक हो ? कैसे अपना और अपने परिवार का पेट पालते हो ? – कितना कमाते हो ? ” उनकी भाषा ‘कटाक्ष’ वाली थी ! मै कुछ जबाब नहीं दे पाया – सन्न रह गया ! जुबान से कुछ नहीं निकला – बस एक स्माईली टाईप कर दिया ! पर , उनके शब्द आज तक ‘कानो’ में गूंजते हैं ! 
कई घटनाएं हैं ! नॉएडा नया नया आया था ! जिस दिन ज्वाइन करना था – अपने ‘हेड’ के रूम के आगे दिन भर खड़ा रहा – मुझे उनसे मिलना था और उनके पास समय नहीं – मेरे ‘इंतज़ार’ करने का फल ये हुआ की – इम्रेशन बढ़िया बना ! सब्जेक्ट भी आसान मिला  – प्रथम एवं अंतिम बार “जम के मेहनत किया और पढाया” ! कई विद्यार्थीओं ने मेरे नाम के आगे “झा” जोड़ दिया था 🙂 
कुछ बैच ऐसे होते हैं – जिसमे आप २-३ सब्जेक्ट पढाएं तो वहाँ एक खास तरह का स्नेह बन जाता है ! फिर ता उम्र आप उनसे जुट जाते हैं ! एक रिश्ता बन जाता है ! एक विद्यार्थी था – दूसरे ब्रांच का ! उसे थोड़ी हिम्मत की कमी थी – अक्सर वो मिल जाता और मै उसको हमेशा यह बोलता की तुम अपने क्लास में टॉप कर सकते हो …फिर मैंने उसको जान बुझ कर उसके हौसले को बढ़ाने के लिए १-२ मार्क्स ज्यादा दिए – फिर वो आगे देखा न पीछे …अचानक फ़ाइनल इयर में पता चला की – वो टॉप कर गया है – क्लास में नहीं -पुरे यूनिवर्सटी में 🙂 कॉलेज आया तो अपने माता -पिता से मुझसे मिलवाया ! अछ्छा लगा था ! 
एक बार मै अपने हेड के कमरे में गया तो वहाँ एक वृद्ध सज्जन बैठे थे – उनदिनो मेरे हेड एक ‘सरदार जी’ होते थे ! शायद उनको मै बहुत पसंद नहीं था – पर मै इतनी सज्जनता से पेश आता की – उनके पास कोई और उपाय नहीं था – खैर उनके कमरे में बैठे सज्जन के बारे में पूछा तो पता चला की उनका ‘पोता’ हमारे यहाँ पढता है और  फेल कर गया है – अब वो नाम कटवा के वापस ले जाना चाहते हैं – मैंने बोला – आप एक कोशिश और कीजिए – मै उसका ध्यान रखूँगा – मै ज्यादा ध्यान नहीं रख पाया – पर , हाँ – कभी कभी टोक टाक दिया करता था – वो लड़का सुधर गया – पास करने के कुछ दिन बाद आया – मेरे केबिन में –  “पैर छूने लगा – मैंने मना कर दिया ” – धीरे से बोला – ‘सर , विप्रो में नौकरी लग गयी है ‘ – बंगलौर जाना है – सोचा आप से मिल लूँ ! इतनी खुशी हुई की – पूछिए मत – लगा आँखों से खुशी के आंसू छलक जायेंगे ! मुझे यह पूर्ण विश्वास है की – दुनिया की कोई ऐसा दूसरा पेशा नहीं है – जिसमे आपको ऐसी खुशी मिल सके  ! मुझे मैनेजमेंट गुरु बहुत पसंद आते हैं – और अक्सर मै एक ‘इलेकटीव’ पढाता हूँ – जिसमे मैनेजमेंट के कुछ                   ज्यादा भाग हैं ! अखबार में अगर कोई ऐसा आर्टिकल किसी मैनेजमेंट गुरु का अगर आ जाए तो – मै उसे बिना पढ़े नहीं छोड़ता – खास कर ‘ब्रांड मैनेजमेंट’ का ! खैर ये मेरी पुरानी आदत से – कोर विषय से अलग हट के ‘काम’ करना 😉 वैसे मेरी नज़र में ‘कंप्यूटर इंजिनीरिंग’ में ‘प्रोग्रामिंग’ के बाद अधिकतर  विषय बकवास ही होते हैं – और मुझे सब कुछ नहीं आता ! 🙂 
बाबू जी भी शिक्षक हैं ! जिस किसी दिन भी उनका क्लास होता है – उसके २ दिन पहले से वो ‘जम’ के पढते हैं – उनके कमरे में कोई नहीं जाता है ! 
खुद शिक्षक हूँ – पर मुझे मेरी जिंदगी में कोई ऐसा शिक्षक नहीं मिला – जो मेरी प्रतिभा को पहचान एक दिशा देता ! कुल मिलाकर – मेरे बाबु जी ही मेरे लिए दिशा निर्देशक के रूप में हैं – शुरुआती दिनों में उनके कई बात नज़रंदाज़ किया हूँ – अब दुःख होता है – खासकर उनकी एक सलाह – जब मैंने ‘मैट्रीक पास किया’ – मानविकी एवं समाज विज्ञानं  ले लो , पढ़ा होता तो शायद किसी बड़ी पत्रिका का संपादक या राज नेता होता ! माँ की  ट्रेनिंग भी बहुत महत्वपूर्ण है मेरे लिए – आम जिंदगी में मेरी शालीनता और त्याग जल्द ही नज़र आ जाती है – कभी इसका बुरा फल मिलता है – कभी लोगों में जलन तो कभी लोग महत्त्व भी देते हैं – मेरे इस गुण के लिए मेरी माता जी ही जिम्मेदार है – कुछ खून का असर है – कुछ ट्रेनिंग ! 
मेरी स्नातक ‘इलेक्ट्रोनिक एवं संचार’ अभियंत्रण में है ! ‘खुद जब विद्यार्थी था तब क्लास में आज तक मुझे कुछ समझ’ में नहीं आया ! जिसका रिजल्ट यह हुआ की  – मै  बहुत ही सरल अंदाज़ में कोई भी सब्जेक्ट पढ़ाना पसंद करता हूँ ! अब तो कुछ सालों से ‘प्योर लेक्चर’ – एक घंटा तक बक बक ! मुझे याद है – पटना के एक कॉलेज में पढाने गया था – पहले ही क्लास में वहाँ के डाइरेक्टर साहब बैठ गए – जो जाने माने शिक्षक होते थे और आजादी के समय अमरीका से  पढ़ कर लौटे थे – मेरा लेक्चर सुनने के बाद बोले – ” पढने की कोशिश करना – ज़माने बाद – कोई ऐसा मिला – जिसके अंदर ऐसी क्षमता हो जो  बातों को सरल अंदाज़ में विद्यार्थीओं को समझा सके – पर ज्ञान बढ़ाने के लिए तुमको पढ़ना होगा ” ! खुद विद्यार्थी जीवन में बहुत अच्छे मार्क्स कभी नहीं आये पर बहुत सारी चीज़ें बहुत जल्द समझ आ जाती थी – जिसने मुझे ‘खरगोश’ बना दिया और देखते देखते ‘कई कछुए’ आगे निकल गए ! 
मेरी दो तमन्ना है – एक मैनेजमेंट में कोई बढ़िया लेख लिखूं और ‘हाई स्कूल’ में पढाऊँ ! कंप्यूटर से पी जी करने के बाद भी – मैंने कई ‘हाई स्कूल’ में शिक्षक के रूप में नौकरी के लिए आवेदन दिया था – सब्जेक्ट – भूगोल , इतिहास , नागरीक शास्त्र 🙂 मुझे लगता है – अगर हाई स्कूल में हम चाहें तो बच्चों को जीवन में कुछ बड़ा सपना देखने को बढ़िया ढंग से प्रेरित कर सकते हैं ! 
कई लोग मुझे मिलते हैं जो भिन्न – भिन्न पेशा में हैं और कहते हैं – मै भी कुछ दिनों बाद ‘शिक्षक’ बनना पसंद करूँगा ! पर , बहुत कम लोग ‘शिक्षक’ बनने आते हैं और एक बेहरतीन विद्यार्थी होते हुए भी – बढ़िया शिक्षक नहीं बन पाते ! 
बहुत कुछ लिखने का मन था …लिख नहीं पाया …फिर कभी .. 

रंजन ऋतुराज सिंह – इंदिरापुरम !

05.09.2010

गप्प …दे गप्प …दे गप्प …

सुख क्या है ? आनन्द की अनुभूती कब होती है ? परम आनन्द कैसे मिले ? कई सवाल हैं ! हर उम्र और मौके के हिसाब से इन सब की व्याख्या है ! पर एक सुख है – वो है – ‘गप्प’ ! जिसे मेरे बिहार में ‘गप्पासटिंग’ भी कहते हैं ! और हम एक ऐसे परिवेश से आते हैं – जहाँ ‘गप्प’ की प्रधानता हमेशा से रही है !
अभी माँ – बाबु जी आये थे – देर रात तक गप्प – गप्प और गप्प ! सोफा पर लेट गए – उधर बाबु जी आराम कुर्सी पर – फिर चालू …बीच बीच में चाय आ रहा है …बालकोनी से बरखा की फुहार …गप्प ..गप्प ! थक गए – सो गए – फिर रविवार सुबह सुबह छ बजे ही उठ के गप्प …यह एक सुख है .. आनन्द है ! लेकिन परम आनंद तब है जब इस गप्प में किसी की ‘परनिंदा’ दिल खोल के की जाए – कोई खास – कोई पुराना मित्र – कोई नजदीक का रिश्तेदार – कोई सहकर्मी ..सच में ..ऐसा लगता है ..किसी ने दिल पर ‘बनफूल’ तेल लगा दिया हो …ठंडा – ठंडा सा एहसास !
हर मौसम में गप्प का मजा है ! जाड़े के दिन में बड़े पलंग पर रजाई के चारों कोने पर चार आदमी – चाय के बड़े मग को दोनों हाथ से पकड़ – गप्प पर गप्प ! थक गए – देर हो गयी – मन हल्का हुआ तब जा कर उठे ! गर्मी में ..छत पर ..एक तरफ से ढेर सारे चौकी – खटिया / सफ़ेद सूती वाला मच्छरदानी और मसनद …फिर बगल वाले चौकी पर लेटे / सोये ..किसी कजिन से गप्प …उस कजिन की परनिंदा जो अभी वहाँ नहीं है …मजा आ जाए …रात के दो बजे ..अब सोना चाहिए …कह के हलके मन से मसनद पर पैर चढ़ा गाढी नींद में ….फिर सुबह गप्प होगी !
किताब में लिखी चीज़ें ‘छुई’ हुई होती है ..जूठा सा लगता है ..जैसे किसी ने पहले भी उसे पढ़ा होगा …पर गप्प हमेशा ‘फ्रेश’ होता है ..ताजा होता है …कई भाव और सन्देश को लपेटे हुए ..किसी कोजी में ..गर्माहट के साथ !

~ 4 September / 2012 , Indirapuram

दो दुनिया …..

दो दुनिया

बिलकुल दो दुनिया होती है ! एक अन्दर की , एक बाहर की ! एक स्त्री की , एक पुरुष की ! एक निश्छल की , एक छल की ! एक प्रेम की , एक नफरत की !  एक साधू की , एक चोर की ! एक भगवान् की , एक हैवान की ! एक हमारी , एक आपकी ! एक नेता की , एक जनता की ! एक जल की , एक थल की ! एक मैदान की , एक मरुभूमि की ! एक लिविंग रूम की , एक बेडरूम की ! एक ओफ्फिस की , एक घर की ! हमारे आपके साथ भी दो दुनिया हर वक़्त साथ चलती है – एक दिल की , एक दिमाग की !   
बहुत बचपन की एक याद है , बाबा राजनीति में सक्रीय थे ! सुबह सुबह वो खुद से पान बनाते और एक बड़ा लोटा लेकर खेतों की तरफ निकल जाते ! एक सैर कर आते ! एक घंटा का सैर ! जब तक वो वापस दरवाजे पर आते तब तक दरवाजा पर सौ पचास लोगों की भीड़ जमा हो जाती थी ! कोई पैदल आता , कोई साईकील से , तो कोई मोटरसाईकल से ! जिसकी जैसी सामाजिक हैसियत वह अपना जगह खोज बैठ जाता ! कोई दालान में रखे बड़े चंपारण कुर्सी पर तो कोई चौकी पर , कोई यूँ ही ओसारा पर , तो कोई भुईयां पर ! बाबा बड़े आराम से , खादी के हाफ सफ़ेद वाली चेक बनियान और धोती में , एक मोटा जनेऊ और उंगली में बेहतरीन इटालियन मूंगा , वैसा मूंगा आजतक कहीं नहीं देखा  ! लोग उनको घेर लेते थे ! सुबह नींद खुल गयी तो मै भी दरवाजे / दुआर / दुरा पर चला जाता था ! मुझे यही लगता था , मेरे बाबा जैसा कोई नहीं ! फिर थोड़ी देर बाद , बाबा आँगन में आते , एकदम आहिस्ता आहिस्ता , पैर को दबा के ! लबे हैं , बेहद आकर्षक हैं , चेहरे पर एक मस्सा ! बहुत दबे पाँव आँगन में आते थे ! अपनी बाहरी दुरा / दुआर की दुनिया से आँगन की दुनिया में , दादी की दुनिया में ! दादी को हमसभी ‘दीदी’ कहते थे ! दीदी अपने भंसा में व्यस्त ! बाबा चुपके से आँगन के ओसारा के उस कोना में बैठ जाते थे जहाँ उनका ‘पान’ एक लकड़ी के डोलची में भिंगा कर रखा होता था , वहीँ अपने पैरों पर बैठ जाते , धीरे धीरे पान लगाते ! खूब आराम से , कत्था , रत्ना चाप ज़र्दा , कला पंजुम ! हम भी वहीं बाबा के पास बैठ जाते ! ‘दीदी’ भंसा घर में व्यस्त और कुछ हलके गुस्से में , भुनभुनाती हुई , बाबा अपनी तिरछी नज़र से भंसा घर की तरफ देखते ! दीदी भंसा घर से निकलते हुए ! बाबा एकदम हलके से , धीरे से भोजपुरी में बोलते – ‘दरवाजा पर कुछ लोग आये हुए हैं , कुछ कप चाय भेजवा दीजिये’ ! अचानक से दीदी का पारा गरम हो जाता और दीदी गुस्सा में कुछ कुछ बोलने लगती थीं ! हम बच्चे आँगन के पाए के इर्द गिर्द खेलते हुए , दीदी की बातों को सुनते ! बाबा फिर चुपके से अपने पान को चबाते दरवाजा / दुआर / दुरा पर निकल जाते ! दीदी फिर चाय बनवा कर दरवाजा पर भेज देती , साथ में बाबा के लिए खूब बड़ा फुलहा / कांसा के कटोरा में चिउरा – दही भी ! दीदी गुस्सा तो जरुर होती थी लेकिन थोड़ी ही देर बाद बाबा का मन रख लेती थीं ! मेरी माँ अपने सास ससुर के बारे में कहती थीं – ‘बाबु जी तो दीदी को रानी की तरह रखते हैं’ ! मै सोचता था – हम कोई राजा रजवाड़ा तो हैं नहीं, फिर ये रानी शब्द कहाँ  से आया ? 🙂 दीदी भी जब आँगन से बाहर जाती – बाबा के जमघट पर एक नज़र दूर से – सर पर पल्लो रखते हुए – किसी किचेन हेल्पर से पूछती – ‘मालिक को कुछ जरुरत तो नहीं’ !  यह पूछते वक़्त दीदी का गुस्सा कहाँ चला जाता था – आज तक समझ में नहीं आया !तब भी लगता था और आज भी लगता है , बाबा जिनसे मिलने के लिए दरवाजा पर सैकड़ों लोग खड़े हैं , वही इंसान आँगन में घुसते ही शक्तीविहीन , कोमल ! जो दीदी आँगन में इतना गुस्सा वही बाहर झांकते हुए इतना शांत !

बिलकुल दो दुनिया थी , बाहर की दुनिया जहाँ के बादशाह बाबा होते थे और अन्दर की दुनिया जहाँ की रानी दीदी होती थीं ! दोनों एक बैलेंस बना के रखे थे ! 
जब आँगन की दुनिया में कुछ गड़बड़ी , दीदी का सारा गुस्सा बाबा पर ! बाबा एकदम चुपचाप सुनते थे ! जब बाहर की दुनिया में कुछ गड़बड़ , बाबा एकदम गुस्सा में फनफनाते हुए आँगन में आते थे और दीदी एकदम शांत ! 
क्या बैलेंस था …उफ्फ्फ ! किसने सिखाया होगा , ये बैलेंस !मैंने एक कोण से दो दुनिया की एक झलक पेश करने की कोशिश की है ! न जाने ऐसी कितनी ‘दो दुनिया’ होती है ! 


कमेन्ट कीजिएगा …:))

~ रंजन / दालान / 13.06.2016

ताजिया …

आज तजिया है ! शहर शहर , गाँव गाँव तजिया निकला होगा ! मेरे गाँव में भी ! बचपन यादों की गली से झाँक रहा है ! कई दिन पहले से तजिया को सजाने का काम शुरू हो जाता था ! लम्बे और खूब ऊँचे तजिया !
“हसन – हुसैन” करते टोली आती थी ! दरवाजे पर ! भाला , लाठी , तलवार से सजाये हुए तजिया ! बाबा के गोद में बैठ दरवाजे पर उन तजिया को देखना ! लाठी भांजने वाले वो युवक ! कभी कोई चाचा / बड़ा भाई भी लाठी भांजता था ! भाले को चमकाना और तलवार युद्ध ! बहुत रोमांच पैदा करता था !
आँगन से दादी आती थी जिस लोटा से शिव को जल , उसी लोटा से तजिया को भी जल ! कोई धर्म नहीं पता , कोई इतिहास नहीं पता ! बस यही पता की आज तजिया है ! हसन हुसैन के शहादत का दिन !
‘शौर्य और शहादत” का दिन ! भोग तो सिर्फ अपना मन और तन लेकिन त्याग / शहादत को कई सदी पुजती है !
शाम होते होते सभी ताजिया का गाँव के पास वाले उस आम के बगीचा वाले खेत में जमा होना , वहीँ किसी ठेला से जिलेबी खाना और फिर इस घमंड से अपने घर वापस आना की – मेरे गाँव वाले तजिया को सबने सबसे बढ़िया कहा !
ज़िन्दगी कहाँ से कहाँ आ गयी लेकिन जब बचपन यादों की गलिओं में झांकता है- न जाने कितने अनमोल खजाने खोज लाता है !
हां , बिहार के मुजफ्फरपुर इलाके में वहां की एक हिन्दू जाति ‘भूमिहार’ भी इस शहादत में बड़े गर्व से अपने तजिया निकालती है या उस जुलुस में उसी परंपरा से शामिल होती है ! टाईम्स ऑफ़ इण्डिया ने कई बार इसकी चर्चा भी की है ! पश्चिमी उत्तरप्रदेश के त्यागी ब्राह्मण / पंजाब के मोह्याल ब्राह्मण को ” हुसैनी ब्राह्मण ” भी कहा जाता हैं क्योंकि यही लोग करबला में हसन हुसैन की रक्षा के लिए गए थे ।
शौर्य / वीर गाथा / शहादत के किस्से – धर्म , जाति , परिवार से ऊपर उठकर – उनके गीत गाये जाते हैं !
सलाम ………हसन हुसैन …!!!!
~ रंजन
“ अयाचक , सैनिक , हुसैनी और सामंती “

ताजिया का ही अपभ्रंश है तज़िया 🙏

2016