घड़ी ….

अविनाश / ब्लैक डायल

बहुत दिनों तक हाथ में घड़ी पहन सोने की आदत बनी रही – इस बीच कई बार घड़ी स्लो हो जाती और देर से नींद खुलती – बहुत अफ़सोस और कुछ खोया खोया सा महसूस होता था – अब इस ग्लानी से ऊपर उठ चूका हूँ – लगता है – पाया ही क्या हूँ जो खोने का गम रखूं !
करीब पचीस साल पहले – अपनी पहली घड़ी खरीदी थी – बाबु जी पैसे दिए थे – साइकिल से हांफते हुए – एक दम से – पटना के हथुआ बाज़ार पहुँच गया था – अकेले ! बाबु जी हिदायत दिए थे – ‘एच एम टी ‘ का ‘जनता’ खरीदना – सफ़ेद डायल वाला ! मुझे वो पसंद नहीं पड़ा – अविनाश ले लिया काला डायल वाला ! एक बार वो चोरी भी हो गया – घर में जो पोचारा ( रंग ) करने आया था – उसी ने चोरी कर लिया – फिर दो चार हाथ दिए तो पायजामा से निकल के टेबुल पर रख दिया !
घर में एक परंपरा थी – ऐसी प्रथम घड़ी पुरुष या महिला अपनी शादी के वक्त छोटों को दे देते थे – बाबू जी भी अपनी घड़ी छोटे चाचा को दिए थे – ‘जनता’ ! पर चाचा अपनी शादी के वक्त अपनी पुरानी घड़ी मुझे नहीं दिए – परंपरा टूट गयी !
प्लस टू के बाद चाचा कुछ पैसे दिए – बस पकड़ बीरगंज ( नेपाल ) पहुँच गया – भर दम शौपिंग किया – एक और घड़ी ले लिया – उसके अंदर ‘लाल दिल’ बना हुआ था – क्वार्ट्ज़ घड़ी – बाबु जी बहुत गुस्साए – बोले – ‘छुछुन्दर’ जैसा लग रहा है – पर हम छुपा लिए – कॉलेज में कुछ ही दिन पहने – जिस दिन मुझे लगा – सचमुच में छुछुन्दर जैसा लग रहा है – होस्टल के मेस वाले को दे दिए – फेंकने में दर्द हो रहा था ! चावी वाला ‘अविनाश’ हाथ में बंधा रहा !
शादी के बाद गोल्डन टाइटन मिला – पहला दिन से ही पसंद नहीं आया – मौका के तलाश में था – पत्नी ने एक बार कुछ तीखा बोला – हम एक पल बिना गवाएं -ससुराली घड़ी सीधे खिडकी से बाहर वाले गड्ढे में – जाओ ..अब ऐश करो !
अब सस्ते घड़ी पहनने लगा – सौ रुपैये वाले – डेढ़ सौ रुपैये वाले – कई लोग टोके – कोई फर्क नहीं – एक मित्रवत शिक्षक और मेरे विद्यार्थी ‘हज’ करने गए तो एक महंगी घड़ी लेकर आ गए – आदत नहीं थी – पापा को दे दिया और उनसे उनका बयालीस साल पुराना ऑटोमैटीक सीको ले लिया – अलमीरा में रखा हुआ है !
कुछ साल पहले सास इंदिरापुरम आयीं थीं – ससुराल से मिला घड़ी का पूछताछ चालू हुआ – फिर वो थोडा ताव में आ गयीं – एक काफी ज्यादा महंगी घड़ी खरीद दीं – कोई फायदा नहीं – वो भी आलमीरा में बंद है !
छोटी बहन की शादी के समय – मन था – अपने बहनोई को खूब बढ़िया घड़ी दूँ – मना कर दिए – अरमान अरमान ही रह गए और अब मै देने से रहा !
अब मोबाईल या टैबलेट या लैपटॉप पर ही समय देखने का आदत हो गया है – वो भी क्या दौर था – जब मै ‘अविनाश’ पहन के नहा भी लेता था – अंदर पानी चला जाता – फिर धुप में उसको सुखाओ :))
~ 27 August / 2012

हाफ पैंट

हाफ पैंट भी गजब का ड्रेस है – हम जैसे छोटे शहर से आये लोग इसको पहनते ही ‘फुल्ल कॉन्फिडेंस’ में आ जाते हैं ! कार भी स्टाईल से चलाने लगते हैं – क्या कहें ..हम ! आज कल ठेहुना तक वाला फैशन में है – यूनी सेक्स – दस पॉकेट तो होगा ही ! बाज़ार में गाड़ी पार्क किये – पार्किंग टिकट किस पॉकेट में रखे – पता नहीं 😦 गाड़ी वापस लेते वक्त – कुत्ता की तरह सब पॉकेट खोजिये – हाँफते हुए – मालूम नहीं कहाँ गया ! बचपन में ब्लू चेक लूंगी लोगों को पहनते देखे थे – अब वैसा ही चेक वाला हाफ पैंट आ गया है !
बबलू दिल्ली आया था – कलक्टर बनने – मगध ट्रेन से आता था – जाता था ! स्टेशन पहुँचते ही हाफ पैंट और रात में भी नकली रेबैन और कान में वाक् मैन – मैडोना का कैसेट पहली दफा उसके पास ही देखे थे – बस देखते रह गए थे – बोला ..कभी आओ ..दिल्ली ..मुखर्जी नगर ..और बढ़िया बढ़िया गाना सुनायेंगे – कैसेट दिखायेंगे ! बाबु जी से बोले – हमहू जायेंगे – दिल्ली – हाफ पैंट में – मगध से ! मालूम नहीं क्या हुआ – बबलू को हाफ पैंट पहनते पहनते – किसी हाफ पैंट वाली से मुहब्बत हो गया – कलक्टरी गया तेल लेने – अब वो मोमो खाने लगा ! पटना आता था – मोमो के किस्से – हम समोसा ( सिंघाडा ) वाले उब गए थे सुनते सुनते ! सुने हैं – अब उसका अपना खुद का वहीँ कहीं ‘मोमो का ठेला’ लगता है – दोनों हाफ पैंट में ही मोमो बेचते हैं – लाल खूब तीखा चटनी के साथ !
वूडलैंड ने तो और कहर ढाया हुआ है – उसका हाफ पैंट में कॉन्फिडेंस तो बहुत है – लेकिन बुलेट से भी भारी – भादों में धो दीजिए तो कातिक में सूखेगा ! सब ठीक है – लेकिन जब चिम्पू भी उसको पहन लेता है – क्या कहें …उसको देख ..चिम्पू का दो बरतुहार ( लडकी वाला – शादी हेतु ) भाग गया ! चिम्पू ..अब उसी हाफ पैंट में …प्रगति मैदान में …मेला के टाईम ‘घुघनी – चिउरा’ बेचता है …हाथ में कलछुल लिए हुए …!!!

~ रंजन / 25.08.12 / दालान ब्लॉग

सोशल मीडिया के लोग ….

लाईकबाज , कमेंटबाज़ , शेयरबाज़ और पोस्टबाज़ :
इस फेसबुक पर तरह तरह का आइटम लोग नज़र आता है , कुछ लोग लाईकबाज होता है । आप कुछ भी पोस्ट कीजिये , भाई जी का लाईक जरूर से रहेगा । आप सड़ा अंडा , टमाटर , कद्दू कुछ भी लिख दीजिये , भाईजी का एक लाईक टप से आ गिरेगा । ऐसे आइटम लोगों को इससे कोई मतलब नही की आप क्या लिखे हैं । उन्हें यह लगता है कि फेसबुक पर लाईक करना उनका धर्म है । शांतप्रिय लोग है ये । आलतू फालतू कमेंट कर कभी आपका मन नही दुखाते । बस लाईक किये और चल दिये ।
दूसरे लोग होते हैं ‘कमेंटबाज़’ ! आप कुछ भी लिखिए , इनका एक कमेंट अवश्य ही रहेगा । हर घंटे 58 मिनट ये ऑनलाइन होते हैं । जब तक ये अपने दोस्तों के वाल पर कमेंट नही करेंगे , रात में इनको नींद नही आती है । कभी कभी आधी रात नींद तोड़ कर भी ये कमेंट करते है । कई दफा दोस्तों का पोस्ट सूंघ कर भी ये कमेंट कर देते है । इनको पोस्ट के विषय वस्तु से मतलब नही होता । कभी कभी पता चलता है कि कहीं किसी अपने दोस्त के वाल पर अपने कमेंट के अस्तित्व की रक्षा में …दे रिप्लाई …दे रिप्लाई । ऐसे लोग अपने कमेंट की रक्षा को लेकर काफी सजग रहते हैं ।
शेयरबाज़ : ऐसे लोग के अंदर अहंकार मात्र भर भी नही होता । ये कुछ भी शेयर कर सकते हैं । सन्नी लियोन की तस्वीर से लेकर बाबा भोलेनाथ की तस्वीर तक । इन्हें इससे मतलब नही होता कि इनके शेयर करने से किसी को ज्ञान की प्राप्ति हुई या नही हुई । बस शेयर करना इनका नैतिक कर्तव्य होता है । हाथ मे मोबाईल आया नही की …दे शेयर …दे शेयर । ऐसे ही जीव जंतु व्हाट्स एप्प पर सुबह सुबह गुलाब के फूल के बीच अपना नाम और गुड मॉर्निंग फारवर्ड करते है । इनके 300 – 400 के बीच मित्र होते है और इनके द्वारा किये गए शेयर को एक भी लाईक नही मिलता । औसतन एक दिन में करीब 10 से 20 शेयर मिलता है । सोशल मीडिया पर एक बहस भी है कि जो लोग प्रतिदिन 10 से कम शेयर करते हैं , उन्हें शेयरबाज़ की श्रेणी में रखा जाय या नही ।
दे शेयर …दे शेयर …दे शेयर ।
पोस्टबाज़ : अधिकतर हिंदी पत्रकार टाइप । सुबह नींद खुलते ही इनको यह भ्रम हो जाता है कि देश की जनता एक हाथ मे लोटा और दूसरे हाथ मे मोबाईल लेकर इनका ‘फालतू’ पोस्ट पढ़ने को तैयार है । फेसबुक की प्राचीर से ये अपना भाषण शुरू कर देते हैं । अखबार पढ़ कुछ आलोचना , कुछ तीखा मीठा । इनका कोई अपना विचार नही होता । बेविचार होते हैं । जो करेंट टॉपिक मिला उसी पर कुछ घिस दिए । इनके पांच हज़ार दोस्त और करीब हज़ार दस हज़ार फॉलोवर होते हैं । अगर दिन में दो तीन पोस्ट नही करें तो रात में कै दस्त की दिक्कत होने लगती है । इनको रात में भुतहा सपना आने लगता है । मित्र उठो जागो , फेसबुक की प्राचीर से तुमको देश को संबोधित करना है । जनता तकिया पर माथा रख , हाथ मे मोबाईल लेकर तुम्हारे पोस्ट का इंतज़ार कर रही है । जागो वत्स , जागो । ले …अब ये आधी रात …एक पोस्ट टपका देते हैं । कुछ फालतू लोग आधी रात भी लाईक / कमेंट कर देते हैं । इन्हें मैं ‘बेचैन आत्मा’ ही कहना पसंद करूंगा । इनको घर परिवार में कोई टोकता भी नही । परिवार वाले भी सोचते होंगे – जे बलाय , फेसबुक पर बिजी है – इसको डिस्टर्ब मत करो ।
और बाकी आप जैसे निर्लज्ज भी होते है जो पोस्ट पढ़ मजा लेते है , मुस्कुराते हैं लेकिन एक लाईक / कमेंट / शेयर नही करते हैं । इन्हें लगता है कि लाईक / कमेंट / शेयर से पोस्टवाला कहीं मशहूर न हो जाये ।
जय हो …;)
~ रंजन ऋतुराज ‘पोस्टबाज़’ । 25.08.18 / दालान ब्लॉग

दालान लिट्रेचर फेस्टिवल की कहानी

अंजू की गुड़िया : एक कहानी
गर्मियाँ आते ही, मैं और मेरे तमाम, हमउम्र भाई-बहन, टाइमपास के नये-नये तरीके ढूँढते ! उन्ही में से एक खेल होता गुड्डे-गुड़िया का ! सिर्फ़ एक घर नही, पूरा मोहल्ला ही बरामदे में बसा लेते हम ! जो बरामदे से निकलता, हाँक देता- “हटाओ ये टीम-टाम!” ! गर्मी की उन लंबी दोपहरियों में, बिना पंखे के, घंटों गुड्डे-गुड़ियां खेलते रहते ! गर्मी-सर्दी का एहसास बच्चों को नही, बड़ों को होता ह !| बचपन कहाँ सर्दी-गर्मी के एहसास का मोहताज होता है?
और हां, छोटा भाई बनता, गुड़िया का नौकर ! “जाओ जाके गुड़िया को घुमा के लाओ”- उससे जान बचाने के लिए हम कहते, पर वो महाशय यूँ गये और पलक झपकते ही वापिस हाजिर ! अंजू के गोरे गुलाबी गुड्डे की शादी, मेरी सफेद बालों वाली गुड़िया (या कहें बुढ़िया से!), सिर्फ़ एक शर्त पर होती, कि दहेज में मुझे अपनी गुड़िया की पुश्तैनी, कुंडे-लगी, मरून कपड़े से मॅढी, दिग्गज अटैची, और हरी साड़ी ज़रूर देनी पड़ती; वरना शादी कैंसेल !
अंजू गुडियों के मामले में मुझ से बहुत धनी थी ! शोभना दीदी गुड़िया बनाने की कला में माहिर थी, कपड़े की ऐसी जीवंत गुड़ियाँ बनती, कि बस प्राण फूकनें की कसर रह जाती ! कभी जार्जेट के सफेद दुपट्टे काट कर, तो कभी पुरानी सिल्क साड़ियों के बॉर्डर से तैय्यार की गईं गुडियों की वो साड़ियाँ, मन को लुभाती भी, और जलाती भी ! उन्ही में से एक थी, खूबसूरत पीली साड़ी ! जार्जेट के सफेद दुपट्टे को पीले रंग में रंग कर, ऊपर से लाल छीटें मार कर बनी वो साड़ी ! साड़ी क्या थी, आँखों की किरकिरी! कई बार अंजू की मनुहार करती, आपसी विनिमय से बात बनाने की कोशिश करती, कि किसी तरह वह साड़ी मुझे दे दे, मगर सब बेकार !
गाँव में भागवत होना तय हुआ था ! ताई के साथ, अंजू, प्रीति और मैं भी गाँव गई ! हम जब भी गाँव जाते, दो ही चीज़ों का सहारा होता- गुड्डे-गुड़ियाँ, और गाँव में रखी ढेरों पॉकेट बुक्स, जिसमें होती राजा-रानी, और परियों की मन को बाँध लेने वाली कहानियाँ !
सावन का महीना था, भागवत की आरती के बोल, सुबह-शाम माहौल को गुंजायमान करते, पर मेरा मन आरती में नही, गुड़िया की उस साड़ी के पल्लू में बँधा पड़ा रहत|!| देखते ही देखते, हफ़्ता निकल गया; शाम को हम सब शहर वापिस आने वाले थे ! धीमी-धीमी पानी की फुहारें पड़ रहीं थी ! दोपहर में यूँ भी उस बड़ी दो-मंज़िली हवेली में, सूना हो जाया करता, नौकर-चाकर भी ना होते उस समय; अजीब-सा सन्नाटा तना रहता ! मैने चुपचाप गुड़िया के सामान से साड़ी निकाल ली थी, दबे पाँव सीढ़ी चढ़कर, गोल कमरे को पार कर, पीछे की बाउंड्री से झाँक कर देखा- गढ़ी चढ़ने का रास्ता साफ दिखाई दे रहा था ! मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा ! गला सूखने लगा ! पानी तेज हो गया था, मैनें देर नहीं की ! साड़ी को मुट्ठी में दबा कर, ज़ोर-से झटका दिया और नीचे फेक दिया ! ये क्या, वह तो झाड़ी में ही अटक गई थी ! गीले मन और आँखों से आखरी बार साड़ी को जी-भर के देखा ! झाड़ी के उपर खुल के बिखरी हुई कितनी सुंदर लग रही थी! चुप-चाप सीढ़ी से नीचे उतर आई थी मैं, पर अंजू को तो पता चलना ही था, सो चल गया ! बहुत ढूँढा, रोई भी बेचारी, मगर साड़ी होती तो मिलती? “जल्दी चलो! वापिस नही जाना क्या?” ताई चिल्ला रहीं थी, गाड़ी तैय्यार थी; अंजू को दिलासा दे कर, मैं तेज़ी से गोल कमरे की सीढ़ियाँ चढने लगी ! बाउंड्री से झाँक कर नीचे देखा, साड़ी अभी भी हवा में लहरा रही थी ! मगर यह क्या? रंग कहाँ गये इसके सारे? पानी से साड़ी बदरंग हो चुकी थी ! बरसात के पानी ने, ना लाल रंग को छोड़ा, ना पीले को ! गाड़ी में बैठ गई थी मैं- ना बरसात थमने का नाम ले रही थी, ना ही आँसू !


~ श्रीमती रत्ना सिंह , एमए ( अंग्रेज़ी साहित्य एवं साइकोलोजी ) , स्कूल एवं कॉलेज में पढ़ाने का अनुभव – दालान की प्रशंसक !


दालान लिटरेचर फेस्टिवल सावन – 2015 के दौरान प्रकाशित मौलिक कहानी ।

ख्याल …

एक भोर से देर रात तक में – न जाने कितने ख़याल आते हैं – अलग अलग रंग की भावनाओं में रंगे हुए – तेज़ प्रवाह वाली नदी की तरह , छप्पर उड़ा देने वाली आँधी की तरह । ये ख़याल आते हैं और चले जाते हैं । मन के पटल पर कुछ निशान छोड़ जाते हैं – वो ख़याल , वही अलग अलग रंगों वाले ।
हाथ में कलम और मुँह में उस क़लम की ढक्कन – मैं उन ख़यालों को रोकने की कोशिश करता हूँ – रुक गए तो वो लेखनी बन गए , नहीं रुके तो न जाने किधर निकल गए ।
बढ़ती उम्र ने रोज आते जाते उन ख़यालों और उन भावनाओं को समझना शुरू कर दिया है । अब पता चलने लगा है – किन्हे रोकना है और किन्हे जाने देना है ।
शायद कुछ ऐसा ही तुमने एक बार मुझसे कहा था …सुनो ..मुझे तेरी हर बात याद क्यों रहती , क्यों मैं इस ख़याल को रोक रहा हूँ …तकिए के नीचे …घड़ी के पास । ख़याल वक़्त के साथ रहेंगे बड़े हो जाएँगे ।
सुनो…तुम कुछ पेंटिंग क्यों नहीं करते …अलग अलग ख़यालों को अलग अलग भावनाओं के रंग में …गुल्लक को कभी पेंट किया है ? गुल्लक भर जाते हैं तो …हम फोड़ देते हैं …।
डरते हो …ख़यालों को पेंट करने से …बहुत डरपोक हो । डरो मत …कुछ गुल्लक कभी नहीं फूटते …कहीं किसी आलमिरा के कोने में चुपके से पड़े रहते हैं । वार्डरॉब में उस टंगे हुए पुराने सूट के पीछे । आधे भरे – आधे ख़ाली गुल्लक । सुनहरे रंग से पेंट किए हुए – वक़्त पर काम आने का विश्वास दिलाते हुए ….ख़्वाबों के शक्ल में भावनाओं से रंगे गुल्लक …
~ दालान , 11.37 PM / 20अगस्त , 2016

गुलज़ार …

Gulzar – Happy BirthDay Sir 🙂

‘खट्टी मीठी आँखों की रसीली बोलियाँ
बोलिए सुरीली बोलियाँ ‘

  • गृहप्रवेश का यह गीत एक तड़के सुबह से आँखों में गूंज रहा है ! जब आप आगे लिखते हैं – ‘रात में घोले चाँद की मिश्री – दिन के गम नमकीन लगते है – नमकीन आँखों की नशीली बोलियाँ’ !
    बस उसी वक़्त दिन ठहर जाता है और न जाने कब दिन घुल के सांझ और फिर रात हो जाता है ! एक बात कहता हूँ – मैंने कभी आपको सुना नहीं , सच में ! हर बार – आपको महसूस किया !
    कोई मुझसे पूछे की गुलज़ार कौन है ? मै तो यही कहूँगा – पिछले चालीस सालों से उम्र के उसी पडाव में खड़ा एक इंसान ! कई बार सोचता हूँ – कोई कैसे एक ख़ास उम्र में तमाम उम्र जी सकता है – चालीस वाले उम्र में ! जब आप चालीस के पहले थे तब भी आप उसी उम्र में लिखते थे और अब जब 83 वसंत ,पतझड़ , सावन देख चुके हैं – तब भी आप चालीस के लिए ही लिखते हैं :))
    कोई मुझसे पूछे की गुलज़ार कौन है ? मै तो यही कहूँगा – जीवन के इस सफ़र में गुलज़ार नाम की एक गली है , जहाँ कई बार ज़िन्दगी रुक सी जाती है ! तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी भी तो एक नज़र इस गली को देखती ही होगी ! और हम जैसे तो बस उस गली में ही अपना बसेरा बना लेते है 🙂 हाँ , वही गली जहाँ गुलज़ार अपनी नज़्म पेश करते हैं , जैसे कोई पास आया तो इलाईची दाना की तरह लेकिन उनके नज़्म हाथ कहाँ लगते हैं , बस दिल में घुल जाते हैं और बस घुलते रहते हैं 🙂
    अब मै क्या लिखूं , पिछले पांच – छः सालों में आपको सुना , देखा पढ़ा और महसूस किया !
    लेकिन आप आये भी तो मेरी चालीस में , या तो आप खड़ा मेरा इंतज़ार कर रहे थे या वक़्त ने मुझे आप तक पहुंचा दिया ! जो भी हो , आपका आना बढ़िया लगा और आपका ठहरना तो और बढ़िया ..:))
    मेरे और मेरी लेखनी की तरफ से आपको शुभकामनाएं और प्रणाम …:)
    ~ रंजन ऋतुराज / दालान ब्लॉग / १८.०८.२०१७

इस धूप में लैला की रूह नज़र आती है – कभी तिलमिलाती है – कभी मुस्कुराती है
चुप चाप मीठी धूप मेरे घर तक टपक गयी – टुकुर टुकुर देखा और प्यार हो गया :)))
~ गुलज़ार

अटल जी की स्मृति में …

अटल जी

आंखें बंद हो गयी होंगी । धड़कने रुक गयी होंगी । पर काल के कपाल पर लिखी हुई स्मृति भला कब बंद होती हैं या रुकती हैं ।
सन 1957 में लोकसभा और उनके भाषण से मंत्रमुग्ध नेहरू जी और वहीं से एक भविष्यवाणी – देश का होने वाला प्रधानमंत्री । कितना ओजस्वी वो भाषण रहा होगा कि महज 30 – 32 के एक नौजवान में देश का तत्कालीन प्रधानमंत्री आने वाले समय का प्रधानमंत्री घोषित करता है । अदभुत ।
नमन है उस मिट्टी को , नमन है उस कोख को । नमन है उस लोकतंत्र को जहां ऐसे नेता को भी पनपने का मौका मिला । नमन है उनके उस व्यक्तित्व को जिसे उन्होंने सर्वमान्य बनाया । व्यक्तित्व में राजनीतिक ओछापन नही था । सन 1977 में मोरारजी भाई के नेतृत्व वाली सरकार में विदेश मंत्री बने । साउथ ब्लॉक के गलियारे से नेहरू जी की तस्वीर हटा ली गयी – वाजपेयी जी को बहुत बुरा लगा और उन्होंने पुनः नेहरू जी की तस्वीर को साऊथ ब्लॉक के गलियारे में लगवाया । व्यक्तित्व में बडपन्नता थी – तभी तो वो जनसंघी होते हुए भी सर्वमान्य थे ।
सर्वमान्य थे तभी तो सन 1992 में कांग्रेस राज में भी उन्हें पद्म विभूषण मिला । यह किसी से खैरात में नही मिली थी – यह एक विपक्षी नेता की अपनी खुद के विशाल व्यक्तित्व की कमाई थी ।
उनके दौर में ही हमारे वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार को विकास की राजनीति का पाठ मिला । बतौर प्रधानमंत्री देश को चौड़े सड़कों से बांध देने की कल्पना उनकी ही थी – उनके इस कार्य करने की कला का छाप साफ साफ श्री नीतीश कुमार पर दिखता है ।
गोधरा कांड से दुःखी थे – वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री को ‘ राजधर्म ‘ की सलाह दे दी । आडवाणी बीच मे आ गए वरना ‘राजधर्म’ क्या होता है – देश का प्रधानमंत्री एक मुख्यमंत्री को बताने को तैयार बैठा था ।
कंधार घटना उनके काल मे हुई लेकिन यह सर्वविदित है कि इस घटना में भी वो मजबूर किये गए थे । कारगिल को जीत उन्होंने पाकिस्तान को अपने तेज व्यक्तित्व का परिचय दिया । पोखरण में परमाणु विस्फ़ोट कर विश्व को फिर से चकित भी किया ।
देश किस दिशा में घूम रहा है – वाजपेयी जी वर्षों पहले मौन हुए और मौन ही निकल गए ।
राजनीति कोई भी कर सकता है लेकिन नेतृत्व एक विशाल व्यक्तित्व ही करता है – वो घर हो , मुहल्ला हो , गाँव हो या राज्य – देश । नेतृत्व किसी पद की मोहताज नही होती और मुझे यह निश्चित पता है कि अश्रुपूर्ण जनता उन्हें एक प्रधानमंत्री पद से भी ऊंचे पद के रूप में स्वीकारी है ।
अलविदा । राष्ट्र हमेशा आपका ऋणी रहेगा ।
~ रंजन ऋतुराज / 16.08.2018

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

पिछले कुछ साल में – इंटरनेट के माध्यम से हज़ारों लोगों के बात चीत और उनके मनस्थिती को समझते हुए यही पाया हूँ की – देश या इस देश के इंसान अभी भी व्यक्तिवाद के पीछे पागल है ! मेरी यहाँ पर दूसरी राय है !
मैंने हमेशा संस्था को महत्वपूर्ण समझा है ! उस संस्था के शिखर पर बैठा इंसान का बहुत हद तक महत्व नहीं है क्योंकि जब वह संस्था मजबूत होगी – कोई भी आये या जाए – बहुत फर्क नहीं पड़ता है !
परिवार से लेकर विश्व तक – हर एक नेतृतव का यह धर्म है की वह संस्था को मजबूत बनाए ! अम्बेडकर नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा बनाई गयी संविधान ही है की – कभी एक अर्थशास्त्री भी देश का मुखिया बन जाता तो कभी एक घोर दक्षिणपंथी ! आप पुरे देश को गौर से देखियेगा तो – यह देश इतना मजबूत ही की नेतृतव परिवर्तन से बहुत हद तक बहुत फर्क नहीं पड़ता ! अगर आस पास के दुसरे देशों को देखें तो वहां नेतृतव परिवर्तन के साथ एक भूचाल आ जाता है ! कारण यह है की – संस्था मजबूत है !
कई बार एक मजबूत नेतृतव संस्था को मजबूत बनाने के बदले उसे कमज़ोर भी करने लगता है – कई राज्य जहाँ ऐसे मुख्यमंत्री बने वह इसके गवाह है ! पर संस्था इतनी मजबूत होती है की – एक हद के बाद वह खुद नेतृतव को बदल देती है !
हम आज है – कल नहीं ! देश कल भी था , देश आज भी है और देश कल भी रहेगा ! सवाल यही है – हमारा योगदान कितना है – हम इसे कितना मजबूत बना पाते है ! वही इतिहास होगा – वही भविष्य होगा !

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं …!!!

जय हिन्द 🙏

छाता …

आइये मेरे पटना में – बारिशों का मौसम है ..:)) जबरदस्त बारिश हो रही है – मेरे पटना में …
छाता ….पहले लकड़ी वाला छाता होता था …जैसा छाता वैसा उस इंसान का हैसियत …कलकत्ता से छाता आता था …एक फेमस ब्रांड होता था …नाम भूल रहा हूँ …स्प्रिंग एकदम हार्ड …सब अजिन कजिन उस छाता को खोलने का प्रयास …किसी का उंगली ‘चिपा’ गया …बाकी सब फरार ..:)) फिर आया ..स्टील वाला छाता …नेपाल से …बटन वाला ….कोई गेस्ट अगर वैसा छाता के साथ आ गया …इतना न उसका बटन ‘पुट-पुटाते’ थे …जैसे ही बटन दबाते वो छाता खुलता …चेहरे पर एक विजयी मुस्कान …:)) फिर उसको बंद करो …फिर बटन दबाओ …फिर उस छाते को गीली जमीन में उल्टा कर के धंसा देना …लगता था ..जैसे वहां कोई किला फतह कर लिए ..:)) फिर आया ‘लेडिज छाता’ फोल्ड वाला …लाल – नीला – अलग अलग रंग वाला ….घर में छाता नहीं मिल रहा …कोई हाथ में ‘लेडिज छाता’ थमा दिया …बहुत बेइज्जती जैसा लगता था ….हूँ…रोड पर लेडिज छाता लेकर जायेंगे …हुंह …कोई देखेगा तो क्या बोलेगा …हा हा हा हा …अब वो फोल्ड हो जाने वाला छाता काला मिलने लगा …यूनिसेक्स हो गया …एक ही छाता सब लोग यूज करने लगे …
सीढीघर में …रेलिंग के सहारे खडा वो छाता …बूँद – बूँद टपक रहा ..वो छाता …कोई आया है …मेरे गाँव से … :))

14.08.14

सुना है ….

सुना है …वो मेरे दालान पर आती है …चुपके चुपके …देर चाँदनी रात …लम्बे घूँघट में झुकी नज़रों के साथ …सावन की बूँदों सी पायल की रुनझुन के साथ …दबे पाँव आधी रात …:))
कुछ पढ़ कर …कुछ सुन कर …खिड़कियों को खटखटा कर …वो वापस चली जाती है …चुपके चुपके…देर चाँदनी रात …लम्बे घूँघट में झुकी नज़रों के साथ…दबे पाँव आधी रात…:))
मैंने भी कहलवा दिया है …कभी यूँ ही आँगन में भी आया करो …:))
~ RR / 2016
पेंटिंग साभार : माधवी संदूर

कहानी साइकिल की …

कहानी साइकिल की : ब्रांड रेलेे 😊
कोई राजा हो या रंक – हमारे समाज में उसकी पहली सवारी साइकिल ही होती है और साइकिल के प्रति उसका प्रेम आजीवन रहता है – भले ही वो चढ़े या नहीं चढ़े ।
अगर आप अपने बचपन को याद करें तो बड़े बुजुर्ग ब्रांड रेलेे की बात करते थे । सन 1885 के आस पास इंग्लैंड कि यह ब्रांड भारत के इंग्लिश राज में मंझौले रईसों की पहचान हो गई थी ।
हमारे सम्मिलित परिवार में सन 1975 के आस पास तक मोटर नहीं था , आया भी तो सरकारी । हाथी घोड़ा पालकी और समपनी थी लेकिन मोटर नहीं । लेकिन बाबा के पास फिलिप्स कंपनी की हरे रंग की साइकिल होती थी । दोपहर के भोजन और विश्राम के बाद उनकी साइकिल साफ होती , बाबा बेहतरीन खादी कुर्ता और धोती में – अपने मित्रो के साथ आस पास के बड़े बाज़ार निकल जाते । गांव गांव उसी साइकिल से घूमते । आजीवन साइकिल चलाए तो उनके श्राद्ध में मैंने खुद से पड़ोस के गांव से नया साइकिल कसवा कर दान भी दिया । ऐसे जैसे टॉर्च , छाता और साइकिल – यही पहचान ।
खैर , साइकिल पर चलने के अपने एटिकेट्स होते थे । जैसे अगर आप साइकिल से हों और सामने से गांव घर का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति आ रहा हो तो आपको चंद मिनट के लिए साइकिल से उतर कर अभिवादन करना है । इस घटना को आपमें से कई नहीं देखे होंगे – लेकिन मैंने देखा और किया भी है । सब कुछ बदल गया तो ये भी संस्कार बदल गया ।
गांव में साइकिल मांगने की प्रथा होती थी । बाबा से कोई साइकिल मांगने आया तो महिन नेता आदमी – आंगन से पूछ लो कह के अपना इज्जत बचा लेते थे और जो साइकिल मांग दिया – मेरी दादी उसकी इज्जत उतार देती थी । हा हा हा । क्या मजाल की कोई दुबारा साइकिल मांगने आए 😉
परबाबा मुजफ्फरपुर ज़िला स्कूल पढ़ने गए तो उधर से रेलेे खरीदते आए – बाबा कहते थे – रेलेे साइकिल को देखने के दस कोस से लोग आया था । हा हा हा । शायद वह तब के सम्मिलित परिवार की पहली साइकिल रही होगी । सन 1920 के आस पास । तब से लेकर आज तक हर पीढ़ी के पास उसके हाईस्कूल के दौर से साइकिल खरीदना एक प्रथा है और शायद हर मिडिल क्लास में ।
मेरी पहली बाई साइकिल भी सातवीं कक्षा में खरीदी गई थी । शायद 18 इंच वाली । उसी नए साइकिल पर सीखे भी । गजब का थ्रील आता था – जैसे इस सड़क पर हम भी अब दू पैसा के आदमी हो गए हैं :)) शायद एवन थी । फिर हीरो और फिर ब्लू कलर की बीएसए एसएलआर । कॉलेज में फैशनेबल साइकिल रखे थे । कई स्कूटर और बाइक वाले मित्र मांग कर ले जाते थे – कैट टाइप 😎
अब फिर से साइकिल खरीदने का मन । बहुत हल्का नहीं लेकिन बेहतरीन ब्रांड । रेलेे । साइकिल खरीदने जाना और दुकान में उसको कासवाना फिर घर आना :)) साइकिल को सूती कपड़ा से हर रोज पोछना और कभी कभी कभार उसका ओवर हौलिंग करवाना । नारियल के तेल से उसका रिम साफ करना इत्यादि इत्यादि – सब याद है :))
टीन येज में साइकिल से पूरा पटना धांगे हुए हैं 😎 गॉगल्स पहन कर ।
बहुत कुछ छूट गया – बहुत कुछ लिख दिया – अब कुछ आप भी लिखें :)) अपनी साइकिल की यादें …!!!
~ रंजन / दालान / 29 मई 2020

प्रेम का आधार …

शायद मैंने पहले भी लिखा था और फिर से लिख रहा हूँ ! प्रेम का आधार क्या है ? मै ‘आकर्षण’ की बात नहीं कर रहा ! मै विशुद्ध प्रेम की बात कर रहा हूँ ! मेरी नज़र में प्रेम का दो आधार है – ‘खून और अपनापन’ ! बाकी सभी आधार पल भर के लिए हैं !
यहाँ थ्योरी ऑफ़ रिलेटीविटी भी काम करती है ! खून एक जबरदस्त आधार है ! कभी गौर फरमाईयेगा – फुआ , मौसी , चाचा , मामा से आप खुद को ज्यादा नजदीक पायेंगे ! वहीँ फूफा , मौसा , चाची , मामी इत्यादी से थोड़ी दूरी ! हो सकता है – मौसा या मौसी से परिचय आपका जन्म से ही है फिर भी मौसी आपसे ज्यादा नजदीक होंगी या आप खुद को पायेंगे ! इसी आधार पर मैंने एक बार लिखा था की आप यूरोप या अमरीका में किसी पाकिस्तानी को देखते है तो आप खुद को उसके ज्यादा नजदीक पाते हैं , उसी पाकिस्तानी को आप भारत में रहते हुए दिन भर गाली देते हैं ! ठीक उसी तरह जब आप मंगल गृह पर जायेंगे तो पृथ्वीवासी ही आपके सुख दुःख को समझ पायेंगे !
शायद यह खून ही है की आजीवन पति पत्नी आपस में लड़ते हैं लेकिन औलाद के लिए दोनों के अन्दर सामान प्रेम होता है ! कई बार पुरुष यहीं फंस जाते हैं – माँ या पत्नी ! महिलायें भी आजीवन अपने पति / प्रेमी में अपने पिता की छवी तलाशती रहती हैं !
दूसरा आधार है – अपनापन ! यह बहुत लम्बे समय साथ रहने से होता है ! जब आप सुबह से शाम तक किसी के संपर्क में रहेंगे – अपनापन हो ही जाएगा और वह भी एक जबरदस्त प्रेम का आधार बन जाता है पर शर्त रहती है की आप कितने करीब हो पाते हैं ! आप एक दुसरे के खूबी / कमी को कितना महसूस कर पाते हैं !
शायद खून ही एक आधार है जिसके कारण समाज में ‘जाति’ आज भी बरकरार है ! श्री लालू प्रसाद को देख कई लोगों में यह भाव आया – कोई मेरे जैसा , मेरा कोई अपना उस शिखर पर है ! सुन्दर पिचासी को गूगल के शिखर पर देख लोगों के अन्दर भाव आया – कोई मेरा भारतीय – हम जैसा – उस शिखर पर है वहीँ से एक प्रेम छलकता है !
मेरा तो यही दोनों आधार है ! बाकी ‘आकर्षण’ को बस स्टॉप पर भी हो जाता है – इस उम्र तक यह समझ तो ही गयी है – वह आकर्षण जितना आसानी से आता है उतनी ही तेज़ी से जाता भी है ! प्रेम का तो बस एक दो ही आधार है – खून और अपनापन ! तभी तो खून जब पुकारता है – लोग सात समुन्दर पार भी अपने माता पिता के लिए बेचैन हो जाते हैं ! खून आधार नहीं होता तो ‘सौतेली माँ’ शब्द ही नहीं बनता …और ना ही एकता ‘सास बहु ‘ का सीरियल बना करोडो कमाई होती :))
और जहाँ असल प्रेम है वहीँ वफादारी भी है :))

~13 अगस्त , 2015

कहानी साबुन की …

खस साबुन

इस छोटे से जीवन में तरह तरह का साबुन देखा और लगाया लेकिन आज भी गर्मी के दिनों में खस और जाड़ा में पियर्स का कोई जोड़ नहीं है ।
बाबा को लक्स लगाते देखते थे । दे लक्स …दे लक्स । ढेला जैसा लेकिन सुगंधित । किसी पर चला दीजिए तो कपार फुट जाए । बाबू जी का पसंदीदा होता था – मार्गो – नीम वाला । जब हम लोग टीन एजर हुए तो – जिसका टीवी प्रचार बढ़िया – उहे साबुन खरीदाएगा । लिरिल 😝 आज भी लिरिल के प्रचार का कोई बराबरी नहीं कर पाया । नींबू की खुशबू के साथ – लिरिल से नहा लीजिए तो तन से लेकर मन तक फ्रेश फ्रेश 😊 नहाते वक़्त उसका प्रचार भी याद कर लीजिए 😝 मन कुछ और भी फ्रेश । फिर सिंथॉल आया – घोड़ा लेकर विनोद खन्ना अंकल ऐसा दौड़े की सिंथॉल भी बाज़ार में दौड़ने लगा – लेकिन हम कभी नहीं लगाए 😐 पिता जी उम्र के विनोद खन्ना नहीं पसंद 😐 आज तक सिंथॉल नहीं लगाए 😝
एक आता था – मोती साबुन । वो और भी ढेला । तराजू के बटखरा जैसा । चंदन की खुशबू पहली बार मोती में ही सुंघे । फिर दक्षिण भारत गए तो मैसूर चंदन वाला – सरकारी साबुन । ऐसा लगता था कि नहाने के बाद अब सीधे पूजा ही करना है – चंदन का असर होता था । कभी कभार खरीद कर थोक में घर भी लाते । अलग अलग क्वालिटी । एक्सपोर्ट क्वालिटी खरीदते वक्त एनआरआई टाइप फिल होता था 😁
लाइफबॉय का नसीब देखिए । उसका जिंदगी टॉयलेट के पास ही कट गया । कटा हुआ लाइफबॉय । जब किसी के शरीर में चमड़े का कोई बीमारी होता था तो बाबू उसको सलाह देते थे कि लाइफबॉय लगाव । हम उनका मुंह देखते थे – कोई कैसे शरीर में लाइफबॉय लगा सकता है 😐 लेकिन बैक्टीरिया मारने का सबसे बेजोड़ साबुन लाइफबॉय ही होता था ।
उसी टीनएज डिंपल आंटी गोदरेज के किसी साबुन के प्रचार में आई । कुछ ग्लोरी टाइप । ऐसा ना जुल्फ झटकी की दो चार महीना वो भी खारीदाया । कोई दोस्त महिम बोल दिया – लेडिस साबुन है । डिंपल आंटी का प्रचार मन में रह गया और साबुन दूर हो गया ।
पार्क एवेन्यू भी दूध के स्मेल टाइप कुछ प्रोडक्ट लाया लेकिन हम नहीं लगाए । बेकार । पूरा शरीर दुधाईन महकता था । फिर कुछ ओव डोब आया – जनानी टाइप । लगा के नहाने के बाद , कितना भी तौलिया से देह पोंछिए – लगता था अभी भी साबुन देह में लगा ही हुआ है 😐
लेकिन 15 साल दिल्ली / एनसीआर रहा । नया नया में फैब इंडिया गया – जेएनयू टाइप फिल करवाने के लिए – वहां से भी खस खरीदा लेकिन अफ़ग़ान ऑटो खस जैसा कहीं नहीं मिला । उत्तर भारत में ही बनता है लेकिन बिहार में बिकता है । हर साल थोक में अफ़ग़ान ओट्टो खस साबुन पटना से खरीद कर नोएडा / इंदिरापुरम जाता था । अब इसका लिक्विड भी आया है । गर्मी के दिन में ठंडा पानी से नहाने के साथ खस लगा लीजिए – पूरा दिन मन ठंडा ठंडा रहेगा । अब ये भी पहले वाला जैसा नहीं रहा – अलोए वेरा और गिलिश्रिन मिला दिया है । अब एक साबुन केक का दाम – 40 है ।
नोएडा में मॉल संस्कृति आया तो ‘ द बॉडी शॉप ‘ खुला । 300 -400 वाला साबुन भी आया । स्ट्राबेरी और मालूम नहीं क्या क्या सुगंध । वह दुकान पटना के मौर्या होटल में भी है ।
फिर , भारत का सबसे महंगा साबुन – मिलेनियम । ₹ 850 प्रति केक । 12 % चंदन का तेल । लगा लीजिए तो ऐसे ही खुद को मैसूर महाराजा समझने लगिएगा । अखोर बखोर से बात करने का मन नहीं करेगा 😝 7-8 साल से यही साबुन । बाबू जी किसान के बेटा हैं – एक दिन धमका दिए – जमीन जायदाद बेच के साबुन लगाओ 😐
हद हाल है …अब जन्मकुंडली के केंद्र में शुक्र बहुत मजबूती से बैठे हैं तो मेरा क्या दोष 😐 अब यही सब पसंद आएगा – साबुन तेल पाउडर गीत ग़ज़ल इत्यादि इत्यादि 😝
खैर …इस गर्मी अफ़ग़ान ओट्टो खस का कोई जवाब नहीं :))
~ रंजन / दालान

कुछ यूं ही …

मेरे गाँव के पास से एक छोटी रेलवे लाईन गुजरती है – हर दो चार घंटे में एक गाड़ी इधर या उधर से – पहले भाप इंजन – छुक छुक …लेकिन अब डीजल इंजन है ..भोम्पू देता है ..बचपन में छुक छुक गाड़ी को देखने के बहाने रेलवे ट्रैक के पास जाते थे ..वहाँ ..पटरी के बगल में पत्थर होते थे …कोई बढ़िया ..सुन्दर थोडा बड़ा पत्थर उठा लाते थे …घर आकर सीधे ..पूजा पर ..कभी कोई टोका नहीं ..कभी कोई रोका नहीं …कुछ दिन बाद देखा …किसी ने उसको रोड़ी / चन्दन / सिन्दूर लगा दिया ….परदादी रोज सुबह हनुमान चालीसा पढ़ती थी …बगल में बैठ जाता …मै भी परदादी के साथ बुदबुदाता …फिर मै अपने उस पत्थर को देखता ….एक श्रद्धा के साथ ..एक विश्वास के साथ …समर्पण में ..पूजा में ..प्रार्थना में बड़ी ताकत है ….श्रद्धा / विस्वास / पूजा / समर्पण ..पत्थर को भी भगवान बना दे …वरना इंसान हीरे को भी …समुद्र में बहा दे …


~ 14 August 2012

प्रेम और प्रकृति …एक कहानी

मुहब्बत सुब(ह) का इक सितारा है ..’ – ये सीरियल देखना ! पाकिस्तानी है ! बहुत संजीदा है ! तुमको पसंद आएगी !क्यों ..मुझे ही क्यों पसंद आएगी ?अरे …तुम थोडा हट के हो ! तुम्हारी हर पसंद कुछ अलग है !पर ..मै टीवी नहीं देखता !मेरे लिए देख लेना ..मै युटिउब का लिंक भेज देती हूँ !क्या हम अपने अपने शहर से इतनी दूर – टीवी सीरियल डिस्कस करने आये हैं ?नहीं ..तो और क्या करने आये हैं ! लड़की की आँखों में चमक और शरारत थी !उस पुराने ‘बिस्टरो’ में बैठ दोनों कॉफ़ी ले रहे थे ! सड़क किनारे अपने अपने घर के आगे एक छोटा सा रेस्त्रां खोल लेना – फ्रांस के मिडिल क्लास की जरुरत थी ! वक़्त के साथ ऐसे रेस्त्रां पुरे विश्व में मशहूर होने लगे ! बेंत वाली कुर्सी के साथ – बाज़ार से सस्ते दर पर मिलने वाले चाय / कॉफ़ी और नास्ता ! कई बिस्टरो तो काफी मशहूर थे ! पर पुराने बिस्टरो की बात ही अलग है ! वो पेरिस के मुहल्लों की खुशबू के साथ होते हैं ! सुबह आठ से देर शाम तक !फ्रेंच कितने स्टाइलिश होते हैं ! लड़का सड़क की तरफ देखते हुए बोला !हाँ ! पेरिस अदभुत हैं ! मेरी तमन्ना थी – कभी तुम्हारे साथ यहाँ आऊंगी !हाँ  ! तुम्हारी एक तस्वीर एफिल टावर के  साथ देखी है ! किसने खिंची थी ?मालूम नहीं – याद नहीं ! शायद किसी ने खिंची होगी ! तब मै सिंगल थी !

पेरिस उसे भी पसंद ! उसे भी ! साल के अंत दोनों हर साल पेरिस पहुँच जाते थे ! इस बार भी पहुंचे हैं ! अपने – अपने शहर से दोनों एक ही समय में फ्लाईट पकड़ते पर लडके की फ्लाईट थोड़ी जल्दी पहुँचती ! और वो एअरपोर्ट पर एक गुलाब की कली के साथ उसका इंतज़ार कर रहा होता ! गुलाब उसे भी पसंद ! उसे भी ! वो दूर से नज़रें झुकाए नज़र आती ! उसका देखने का अंदाज़ ही अलग था ! थोड़ी गर्दन टेढ़ी और झुकी – फिर आहिस्ता आहिस्ता अपने सर को ऊपर करती और निगाहों में उसको भींच लेती ! उसी ख़ास पल में दोनों एक साथ एक दुसरे के लिए झुकते थे  ! उसकी आँखें उसके ऊपर से पल भर के लिए भी नहीं हट रने ही थीं ! और वो अब खुद को असहज महसूस करने लगी !लड़कियां अजीब होती है ! कोई ना देखे तो बेचैन और देखे तो और बेचैन ! एअरपोर्ट के बाहर ठण्ड होगी यह सोचते हुए दोनों ने अपने अपने फुल जैकेट निकाल लिए ! हेल्प डेस्क से पता किया तो टेम्प्रेचर करीब पांच डिग्री था !  लड़की ने एक लम्बा बूट पहन रखा था ! किसी हॉलीवुड स्टार से कम नहीं !दोनों अब एअरपोर्ट से बाहर निकलने लगे – अपने अपने ट्रॉली बैग के साथ ! लडके का बायाँ हाथ लड़की की दाहिने हाथ से मिला हुआ !होटल काफी दूर था ! करीब तीस मील ! टैक्सी वाला बंगलादेशी थे ! उसने बुदबुदाते हुए कहा – पेरिस के महंगे होटलों में से एक है – प्लाजा अथेनी ! एफिल टावर से महज एक मील दूर – सौ साल पुराना बेहतरीन होटल ! इसके खिड़की से एफिल टावर नज़र आता है  लड़की चौंक गयी – तब तो बहुत महंगा होगा ! उसने कुछ शिकायत भरे लहजे में लडके की तरफ देखा ! लडके ने नज़रें नीचे कर बोला – कंपनी से कूपन मिला था – यहाँ भंजा लिया – तुम्हारी कसम मेरे पॉकेट से कुछ भी नहीं लगा , सिवाय हवाई टिकट के ! लड़की ने थोड़े शिकायत वाले लहजे में बोला – पिछली बार जहाँ रुके थे वहीँ रुकना था ! फिर टैक्सी के पीछे दोनों हाथें पकड़ अपने अपने खिड़की से पेरिस की सडकों को देखने लगे !क्रिश्मस बीत चूका था लेकिन बाज़ारों और सडकों में वही रौनक थी ! शाम का समय और बाहों में बाहें डाल फ्रेंच ! लडके ने बोला – मुहब्बत का शहर है , उन्मुक्त शहर – प्रेम भय के साथ नहीं आता – उसे उन्मुक्ता चाहिए ! समाज पर काट देता है , मुहब्बत के पंख के बगैर इंसान किसी पिंजरे में बंद हो जाता है ! लड़की ने जोर से लडके की हाथों को पकड़ लिया ! लडके की नज़र लड़की की कलाई पर चला गया – वो हीरे के कंगन पहन रखी थी ! उसके कंगन में ढेर सारे हीरे जड़े हुए थे ! ये कंगन …? लड़का मुस्कुराता हुआ बोला ! लड़की बोली – माँ ने दिया है ! कुल चार है ! कैसी हैं ? बढ़िया हैं – कह कर वो लड़का चुप हो गया !वो पेरिस को महसूस करना चाहता था ! हर एक पल को जीना चाहता था ! उसे पता था – कल किसी ने नहीं देखा है ! जो है सो आज है ! वो आज के अभी में जीना चाह रहा था ! पेरिस की सडकों पर टैक्सी दौड़ रही थी ! सडकों पर फ्रेंच में लिखे शब्द पढने की कोशिश में लड़की खिलखिला कर हंस रही थी  ! वो बंगलादेशी ड्राईवर सब सुन रहा था ! लड़की ने बोला – हमारा इण्डिया ऐसा कब होगा ! खूबसूरती गजब का आकर्षण पैदा करती है ! वो शहर हो , इंसान हो या कोई वस्तु ! ताकतवर से भी ज्यादा आकर्षण खूबसूरती करती है ! लडके को कुछ भी विश्वास नहीं – एक बेहतरीन ख़ूबसूरत शहर में एक अत्यंत ख़ूबसूरत लड़की ! उसे हर पल एक सपना लग रहा था ! चुपके से वो अपने बाएं हाथ में दाहिने हाथ का नाख़ून गडाता – कहीं यह सपना तो नहीं !पर वो एक सच था ! जो सच उसकी कल्पना से निकली थी ! जिस कल्पना को वो वर्षों छुपा कर रखा था और  वो कल्पना आज हर पल घटित हो रही थी ! उसने अगले चौबीस घंटे की चित्रकारी कर रखी थी ! उसे पता था – उसके पास सबसे बड़ा धरोहर है – उस लड़की का विश्वास ! वो आज उस विश्वास में घुलने के लिए आया था ! उसके साथ घुलने के लिए !होटल आने में समय था ! लडके ने पूछा – प्रेम में सबसे बड़ी चीज़ क्या होती है ? लड़की समझ गयी ! पर वो चुप रही ! लडके ने बोला – विश्वास ! लड़की का विश्वास बाघिन के दूध की तरह होता है – जिसे रखने के लिए सोना का कटोरा होना चाहिए ! लड़की चुप रही ! लडके ने बोला – कुछ बोलो ! वो बोली – मै क्या बोलूं – मै बस महसूस करती हूँ ! आज तुम बोलो – मै सुनूंगी – अच्छा लगता है तुमसे सुनना !होटल आ गया था ! भव्य विशाल – प्लाजा अथेनी ! लड़की को मजाक सुझा – उसने बोला – टैक्सी से आराम से उतरना – किसी हॉलीवुड स्टार की तरह – मुझे अच्छा लगेगा ! लड़का मुस्कुरा दिया …:)………………………..टैक्सी ड्राईवर ने दोनों का ट्रॉली बैग निकाला ! लड़की ने अपने बैग से कुछ यूरो निकाले ! टैक्सी ड्राइवर को देने लगी ! लडके ने जोर से मना किया ! लड़की सहम गयी ! झट से उन यूरो को अपने बैग में रख ली ! सुन्दर टॉट बैग था ! लाल रंग का ! हर बार वो उसी बैग के साथ पेरिस आती थी !थोड़ी मायूस हो गयी ! लडके ने झिड़क कर कुछ बोला था ! पर होटल लॉबी की भव्यता देख वो अचानक से खुश हो गयी ! पुरे लॉबी से एक अलग खुशबू आ रही थी ! उसने पूरा विश्व घुमा था लेकिन ऐसी खुशबू के साथ किसी होटल को नहीं महसूस किया था ! अचानक से एक होटल स्टाफ आया और कमरे में चलने को बोला ! वो बस लॉबी की भव्यता से खुश थी ! लडके ने हिंदी में ही पूछा – इतनी खुश क्यूँ हो ? उसने जबाब दिया – ऐसा लग रहा जैसे ये होटल मेरा है !दोनों लिफ्ट में  प्रवेश कर चुके थे ! लड़का मुस्कुराने लगा ! उस लड़की की इसी ‘हक’ वाले अंदाज़ पर वो फ़िदा हुआ था ! बड़े हक से वो उससे कुछ पूछती या बोलती थी ! कुछ भी ! प्यार भी उसी हक से – गुस्सा भी उसी हक से ! एक दफा लड़की ने बड़े हक से फोन पर एक इत्र की फरमाइश की थी ! और जब इत्र पहुंचा तो डाकिया से छुडवाने तक नहीं गयी ! बाद में पोस्ट ओफ्फिस वालों ने जबरदस्ती उस इत्र को पहुंचा दिया – उसके घर के कई चक्कर लगाने के बाद !अथेनी प्लाजा बेहतरीन होटल था ! एफिल टावर के व्यू वाले कमरे बेमिशाल थे ! पेरिस के बेहतरीन होटलों में से एक ! कहते हैं प्रथम विश्व युद्ध में भी यह होटल खुला रहा ! विश्व के बेहतरीन शेफ इस होटल के लिए अपनी सेवा दे चुके थे !दोनों रूम में प्रवेश कर गए ! अभी सामान ठीक से रखा भी नहीं की लडके ने झट से बालकोनी की तरफ बढ़ा और  वहां से पर्दा हटा दिया !  वो पीछे मुड़ा ही लड़की उसके पीछे ! वह बुदबुदाने लगी – बेहतरीन एफिल टावर ! होटल के सातवें मंज़िल से शाम  के समय एफिल टावर ! लडके ने कहा – इस होटल में तुम्हारे फेवरिट टीवी सीरियल – सेक्स एंड सिटी की शूटिंग भी हो चुकी है ! लड़की पहले तो चौंक गयी फिर बोली – बनो मत ज्यादा , झूठ बोल कर मुझे इम्प्रेस कर रहे हो ! लड़का हंस दिया – क्या अब भी तुमको इम्प्रेस करने की जरुरत है – गूगल कर सकती हो ! लड़की बोली – चलो मान लिया !होटल में चार बेहतरीन रेस्त्रां और एक बार थे ! अलग अलग फ्रेंच नामों से ! अभी डिनर में समय था ! लडके ने सर्विस को इंटरकॉम कर अंग्रेजी अखबार माँगा ! तब तक लड़की इलेक्ट्रिक केटली में पानी गर्म करने लगी ! वो खुश थी – वहां दार्जिलिंग टी बैग भी रखा हुआ था ! उसने लडके से कहा – सुनो , यहाँ तुम्हारा पसंदीदा दार्जिलिंग टी भी है ! लडके ने अखबार पढ़ते हुए – हूँ कर के रह गया ! दोनों सोफ़ा पर बैठ बालकोनी से एफिल टावर को देखने लगे ! लडके ने बोला – पता है , पेरिस मुझे क्यों पसंद है ? लड़की ने अपना सर उसके कंधे पर रख दिया ! लड़का बोला – जब मै कॉलेज में पढता था , मेरे कमरे में सिर्फ फिमेल मोडल्स की तस्वीरें होती थी – ग्लैडरैग्स वाली ! तब मुझे पता चला – पेरिस फैशन का शहर है , दुनिया भर के ख़ूबसूरत लोग यहाँ आकर बसते हैं ! तब मै मोडल्स के बारे में खूब पढता था ! उनका जीवन , उनका काम ! मेरी पसंदीदा होती थी – नाओमी कैम्पबेल ! लड़की एक जलन भरी मुस्कान के साथ उसके कंधे से अपना सर हटा ली ! और पूछी – अब ? लड़का बोला – अब सिर्फ तूम ! लड़की ने फिर से अपना सर उसके कंधे पर रख दिया !दोनों चाय की चुस्कियां लेने लगे ! लड़की बोली – एक बात पूछूं ? लडके ने बोला – शौक से पूछो ! लड़की बोली – जब टैक्सी वाले को मै पैसा देने लगी , तुम अचानक से गुस्सा क्यों हो गए ? ! लड़का बोला – जैसे महिलाओं में सबसे सेंसीटीव उनका ‘सेल्फ स्टीम’ होता है ठीक वैसे पुरुषों में उनका ‘मेल इगो’ होता है – बहुत सेंसीटीव ! दोनों एक दुसरे के इस सेंसीटीवनेस से अनभिज्ञ होते हैं ! जान बुझकर तो नहीं लेकिन अनजाने में अक्सर यहीं चोट पहुँचती है ! लड़की बोली – अगर मै ही टैक्सी ड्राईवर को यूरो दे देती तो कौन सी बड़ी बात हो जाती ! लड़का बोला – तुम नहीं समझोगी – बेहतर है हम दोनों चाय ख़त्म करें !लड़की सोच में पड गयी ! सेल्फ स्टीम वाली बात तो उसे समझ में आ गयी लेकिन टैक्सी ड्राइवर को अगर वो ही पैसे दे देती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ! मन ही मन वो सोचने लगी – मर्द बेवकूफ होते हैं – हम महिलाओं से भी मीन माईडेड ! यहो सोच वो खुश हो गयी !लड़की ने जोर का किस किया ! फिर बोली – सुनो मर्द को इतने ख़ूबसूरत होठों के साथ जन्म नहीं लेना चाहिए – लड़की पीछे पीछे पेरिस तक आ जाती है ! लड़के ने बोला – लड़की को भी ‘मोनिका बलूची’ जैसा ख़ूबसूरत नहीं होना चाहिए – लड़का पीछे पीछे पेरिस आ जाता है ! लड़की बोली – ये हम दोनों के बीच मोनिका बलूची कहाँ से आ गयी ? लड़का बोला – वो भी यहीं रहती है – पेरिस में !दोनों जोर से हंसने लगे ! शाम पूरी तरह से ढल चुकी थी……………………..पेरिस में सूर्यास्त हो चूका था ! होटल के कमरे की बालकोनी से हल्का जगमगाता एफिल टावर और शहर की मशहूर बिल्डिंगों की रौशनी ! अचानक लडका सोफे से उठा और लड़की से पूछा – स्ट्रीट वाक् पर चलोगी ? लड़की बोली – क्यों नहीं , कुछ नया पहनना होगा , क्या ? लडके ने बोला – नहीं , यही ड्रेस काफी है ! लड़की ने बोला – रुको , बाल बाँध लेती हूँ ! लड़की बाल में कंघी लगाने लगी और लडके ने अपने जूते के फीते बांधने शुरू कर दिए ! लडके ने बोला – मुझे , स्ट्रीट वाक् और विंडो शौपिंग बहुत अच्छा लगता है , बड़े बड़े शो रूम के आगे से निकलना – जहाँ कहीं भी गया , वहां की सबसे मशहूर स्ट्रीट में जरुर घुमा – विंडो शौपिंग का फायदा होता है – दुनिया और फैशन का आइडिया लग जाता है और जब जेब में पैसे हों – खरीद लो ! लड़की बोली – अगर जेब में पैसे ना हों तो ? लड़का बोला – कल्पना में वो ड्रेस पहन लो ! लड़की तैयार हो गयी ! जींस , जैकेट , एक गुलाबी मफलर और बूट ! लडके ने नीचे से ऊपर उसे एक सांस में देख गया ! लड़की टैक्सी ड्राइवर वाली घटना से थोड़ी जली हुई थी – उसे मजाक सूझी और उसने लडके से पूछा – टॉट बैग लेना है ? लडके ने बोला – नहीं , हम बस स्ट्रीट वाक् करेंगे ! लड़की बोली – कुछ यूरो और क्रेडिट कार्ड रख लूँ ? लडके ने बोला – तुम्हारा जैसा मन , रख भी सकती हो नहीं भी – हम कुछ खरीदेंगे नहीं , बस आधा एक घंटा टहलेंगे ! लड़की बोली – हाँ या ना – खुल कर बोलो , कब तुम्हारा मेल इगो जाग जाएगा और कब सो जाएगा – कहना मुश्किल है ! लड़का जोर से हंस दिया ! लड़की थोड़े गुस्से में थी ! लड़की बोली – तुम हर बात पर हंस क्यों देते हो – ये कोई हंसाने की बात नहीं है – यूरो और क्रेडिट कार्ड तो मै रखूंगी ही – मेरा भी ‘सेल्फ स्टीम’ जाग गया है ! लड़का मुस्कुरा दिया !लड़की भी सोचने लगी – अजीब इंसान है , पल भर में सारा अहंकार और पल भर में सब गायब – थोडा गुस्सा तो था ही ! दोनों कमरे से निकलने लगे ! लड़की बोली – थोडा तन के चलो ! लडके को समझ में नहीं आया ! फिर लड़की बोली – मेरे साथ चलते वक़्त तुम ऐसे कैसे हो जाते हो – बिना कान्फिडेंस वाले ? लड़का अब तन गया और बोला – अब बोलो , और तन के चलूँ ? लड़की चुप हो गयी !लिफ्ट से होटल लॉबी और फिर होटल से बाहर ! संगमरमर से सजा – एवेन्यू मोनटेन स्ट्रीट ! होटल लॉबी की अरबियन इत्र खुशबू अभी भी दोनों महसूस कर रहे थे ! दोनों ने एक दुसरे का हाथ पकड़ लिया ! लडके ने किसी से पूछा – स्टोर्स ? उस इंसान ने दाहिने जाने को बोला ! लड़के के दिमाग में तन के चलने वाली बात घूम रही थी ! बहुत हलके स्पीड से दोनों टहलने के अंदाज़ में आगे बढ़ रहे थे ! लडके ने बोला – बाल को खोल लो , तुम्हारे बंधे बाल ‘पेरिस’ की तौहीनी कर रहे हैं ! लड़की मुस्कुरा कर अपने बालों के क्लिप को हटा लडके के हाथ में थमा दी !लड़का बोला – जानती , किसी भी स्त्री का सबसे बड़ा गहना क्या होता है – उससे प्रेम करने वाला ! बचपन में पिता , दादा , भाई और फिर जवानी में प्रेमी ! जब वो अपने गहने को पहन लेती है – फिर उसका कांफिडेंस खुद ब खुद बढ़ जाता है – नहीं भी इतराए तो थोडा इतराना उसके चेहरे पर आ जाता है – फिर वो सोचती है – ये मेरे साथ वाला पुरुष इसी मन की मुद्रा में क्यों नहीं है ! लड़की सब बात सुन ली ! फिर उसने जोर से लडके की हाथों को पकड़ लिया – फिर छोड़ दिया – फिर बोली – ‘तुम हर बात को इतना सीरियस क्यों लेते हो ? – ऐसा लग रहा है जैसे मै अपने किसी हमउम्र के साथ नहीं बल्कि एक बुढे बाबा के साथ टहल रही हूँ -मै तो कब का बोल कर भूल भी गयी …..वो देखो …लुइ वेटन का शो रूम ….दुनिया की मशहूर स्ट्रीट  में से एक पेरिस का एवेन्यू मोनटेन   ! मोनटेन  फ्रेंच के एक लेखक थे ! उन्ही के नाम से यह स्ट्रीट थी – तीन सौ साल पुरानी स्ट्रीट ! शायद ही कोई दुनिया का मशहूर फैशन ब्रांड न हो – जिसके शो रूम यहाँ न हो ! कहते हैं – यहाँ की शाम आपको हॉलीवुड के सितारे भी अपने पसंदीदा ब्रांड के शो रूम में कुछ खरीदते नज़र आ जाएँ ! लडके की आँखों में चमक थी ! लड़की भी खुश थी ! दोनों टहल रहे थे ! राफ लौरेन , डायर ,शिनेल सब के सब ब्रांड ! खरीदने को कुछ नहीं पर देखने को बहुत कुछ !लडके ने कहा – यूरोप का हर एक शहर घुमने वाला है – बस पॉकेट में पैसे होने चाहिए ! लड़की बोली – हाँ , सारी दुनिया लूट ये अपने घर को सजा लिए हैं ! लडके ने बोला – मिलान कितना ख़ूबसूरत है ! लड़की बोली – हाँ , हम वहां भी टहले थे ! लडके ने बोला – मिलान में तो मै काफी कॉंफिडेंट दिख रहा था ! लड़की रुक गयी – ओ माई गॉड , तुम अब तक वहीँ अटके हो ? लड़का बोला – नहीं , बस कह रहा हूँ – हमारे जीवन में जो सबसे नजदीक होता है – हम उसकी बातों पर गौर फरमाते हैं , बचपन के स्कूल शिक्षक , माता पिता से लेकर अब तुम ! लड़की मुस्कुरा दी – बाबा, तुम दुनिया के सबसे ज्यादा कॉंफिडेंट इंसान हो – अब आगे बढ़ो – भोंदू ! लड़का बोला – बढ़िया लगा तुमसे यह बात सुन , सचमुच मै एक कॉंफिडेंट इंसान हूँ तभी तो यहाँ तुम्हारे साथ हूँ ! लड़की मुस्कुरा दी ! दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे ! स्ट्रीट ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था …कई फैशन ब्रांड जो फ्रेंच नाम से थे – दोनों उनको पढने का कोशिश करते …कुछ पढ़ पाते तो कुछ में अटक जाते ………………..दोनों चुप से हो गए थे …अचानक से लड़का बोला – मुझे स्वेट शर्ट बेहद पसंद – प्री विंटर में पहनने वाले – जब पापा यंग थे वो ऐसे ही कपडे पहनते थे ! लड़की बोली – बहुत पसंद तो …ले लो ..मै खरीद दूँ ? लेकिन … ! लड़का बोला – खरीद दो …मेरा मेल इगो नहीं जागेगा ! दोनों हंस दिए !
राफ लौरेन के शो रूम में घुस गए ! लड़का बुदबुदाया – बहुत महंगा है ! लड़की बोली – अब घुस गए हो तो एक ले ही लो ..ये देखो …ये तुम पर बढ़िया लगेगा ! लड़का बोला – हाँ , मेंरी नज़र भी यहीं थी ! लड़की ने यूरो निकाले और पेमेंट किया ! लड़का खुश था और बोला – जब  जब मै इस स्वीट शर्ट को पहनूँगा – ऐसा लगेगा तुम मुझसे चिपकी हो ! लड़की शांत थी फिर बोली – तुम्हारे लिए ये स्वीट शर्ट खरीदते वक़्त मुझे ख़ुशी हो रही थी , कहीं मुझे सचमुच तो मुहब्बत नहीं हो गयी ,  ! लड़का शरारती अंदाज़ में बोला – ये तो बहुत गलत हो जाएगा ! और हंसने लगा !दोनों अब वापस होटल लौटने लगे ! लडके ने लड़की का हाथ जोर से पकड़ लिया ! लड़की बोली – तुमको देख ऐसा लगता है – जैसे कोई ख़ूबसूरत चीज़ कई बन्धनों में बंधी हो ! लड़का बोला – मै पुरुष हूँ , बाहरी दुनिया का बादशाह , जिस फ्रीडम की बात तुम करती हो – वह मेरे लिए आसान नहीं है ! लड़की बोली – मै जिस फ्रीडम की बात कर रही हूँ – वह जेंडरलेस है ! लड़का बोला – हम कितने भी ऊँचे हो जाए , प्रकृति से नहीं लड़ सकते ! लड़की बोली – बात प्रकृति से लड़ने की नहीं है – बात प्रकृति में समाने की है , अपनी प्रकृति समझो ! लड़का बोला – गंगा भी हर वक़्त गंगोत्री नहीं रहती है ! लड़की बोली – गंगोत्री से आगे जाने को कौन बोला , यहीं बैठे रहो ! लड़का बोला – इंसान हूँ ! लड़की बोली – भगवान् बनो ! लड़का बोला – आसान  नहीं ! लड़की बोली – फिर गंगोत्री की तेज़ धार से अलग हो जाओ ! लड़का बोला – जिद्दी हूँ ! लड़की बोली – फिर अपना जिद्द दिखाओ !फिर दोनों हंसने लगे ! होटल आ गया था ! दोनों ने फिर से होटल के अन्दर की अरबियन इतर की खुशबू महसूस करने लगे ! लड़की बोली – तुम ऐसा  ही कोई इत्र मुझे क्यों नहीं गिफ्ट क्यों नहीं करते ! लड़का बोला – गंगोत्री की खुशबू महसूस करो ! होटल की लिफ्ट में दोनों जोर से हंसने लगे !दोनों थोड़े थक गए थे ! लड़का सोफे पर लेट गया ! उसने लड़की को कमरे में रखी इलेक्ट्रिक केतली से चाय बनाने को कहा ! लड़की बोली – बहुत डिमांडिंग हो ! लड़का सोफे से उठ लड़की के समीप आ गया और बोला – बेहद खुबसूरत हो ! लड़की बोली – कितना ? लड़का बोला – उर्वशी ! लड़की ने मग में टी बैग रखते हुए बोला – बहुत जल्द पिघल जाते हो ! लड़का बोला – तुम्हारी तपिश ही ऐसी है ! लड़की ने  बेहद  ख़ूबसूरत अंदाज़ में अपने सर को झुका उसके तरफ देखते हुए बोली – अच्छा ….! लड़का मुस्कुराता हुआ सोफे पर लेट गया ! अखबार खोल लिया !डिनर में समय था ! लड़की अपने ट्रॉली बैग में कुछ खोजने लगी ! लडके ने टीवी ऑन कर दिया ! नेटफ्लिक्स का कनेक्शन था – पेरिस में बैठ – हिंदी सिनेमा के गीत सर्च करने लगा ! ताजमहल का गीत – जो बात तुझमें है …तेरी तस्वीर में नहीं….। लड़के ने टीवी का वोल्यूम बढ़ा दिया । लड़की सोफ़ा के पास आयी और बोली – सुनो …तुम सचमुच में मुझे प्यार करते हो ..न । लड़का ने एक लम्बी साँस ली बोला – शायद ..नहीं । लड़की बेड की तरफ़ मुड़ी और वहाँ से तकिया उठा लड़के के ऊपर चला दी । लड़का ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा । लड़की बाथरूम में …डिनर पर जाने का समय होने वाला था । शाम का साढ़े आठ बज रहा था ………….एलेन डिकासा , दुनिया के मशहूर फ्रेंच शेफ ! दुनिया भर में उनके रेस्त्रां हैं ! प्लाजा अथेनी में भी ! क्रिस्टल शेनडिलियर और बहुत कुछ ! लड़की ने अपने ट्रॉली बैग से एक पिज़ कलर की फ़्रेंच शिफॉन निकाली और लडके की तरफ उस साड़ी को दिखाते हुए पूछी – ये पहन लूँ ! लड़का एक नज़र देखते हुए बोला – कुछ भी पहन लो , सुन्दर ही लगोगी ! लड़की बोली – अब तारीफ़ बंद करो ! लड़का बोला – पेरिस में जब तक हैं – कर लेने दो ! लड़की ने बोला – सर उधर घुमाओगे , मुझे साड़ी पहननी है ! लड़का मुस्कुरा दिया और होटल के कमरे के बालकोनी की ओर मुड गया ! और उधर से बोलने लगा – जानती हो , हम हर वक़्त एक ब्राण्ड एम्बैसडर होते हैं – आज पेरिस में हम दोनों को कोई देखेगा तो हमें इंडियन जोड़ा कहेगा , हम यहाँ अपने देश को रिप्रेजेंट कर रहे हैं , हमारे हाव भाव सब कुछ लोग गौर करते हैं – हम कैसे चलते हैं से लेकर कैसे उनसे मिलते हैं – बहुत कुछ ! लड़की चुप थी ! साड़ी का प्लेट ठीक कर रही थी ! लड़की ने बोला – अब इधर मुड जाओ , थोडा ये प्लीट ठीक कर दो ! लड़का पास आया और लड़की के पैरों के पास झुक कर बैठ गया और साड़ी के प्लेट को ठीक करने लगा ! लडके की नज़र लड़की के पैर पर गए – तुम्हारे पाँव सचमुच हसीन है ! लड़की का सर झुका था – बाल उसके चेहरे को ढक लिए थे और उस वक़्त सचमुच गुलाबी लग रही थी ! लड़का उसे पिंक ब्यूटी कहता था और उसे उसका गुलाबी दिखना बेहद पसंद ! लडके ने बोला – कोई गुलाबी शिफॉन नहीं था ? लड़की बोली – है ..न ! लड़का बोला – फिर उसे ही पहनो ..न ! लड़की बोली – बहुत डिमांडिंग हो ! लड़का बोला – मालूम नहीं – फिर ऐसी रात कब आये , पहन लो ! लड़की और गुलाबी हो गयी ! पल भर में गुलाबी शिफॉन पास में थी ! इस बार लड़की ने प्लीट ठीक करने को लड़का को नहीं बोला ! लडके ने बेहतरीन सूट और नेक टाई पहन ली ! लड़की काजल लगाना शुरू कर दी ! लड़की बोली – अजीब इंसान हो , कितना धैर्य लेकर पैदा लिए हो ! लड़का बोला – ऐसा कुछ नहीं है , जहाँ प्रेम हैं वहीँ धैर्य अनंत है ! लड़की बोली – जहाँ विश्वास है , वहीँ धैर्य है ! लड़का मुस्कुरा दिया ! दोनों तैयार थे ! कमरे से निकल होटल के लिफ्ट में ! लिफ्ट के सीसे में दोनों गजब के दिख रहे थे ! लडके ने बहुत हौले से लड़की के कमर पर अपनी हाथ रख दी ! दोनों एक साथ बोल उठे – टच बाई लव ! लड़का आगे बोला – मालूम नहीं ऐसे पल फिर कब आयेंगे , दूर रहो तो भी कम आयेंगे , पास रहो तो बिलकुल नहीं आयेंगे ! यह कह वो जोर से हंसने लगा ! लड़की बोली – हर बात पर हंस देते हो , कभी तुम्हारे हंसने पर गुस्सा आता है तो कभी प्यार ! लड़का बोला – फिलहाल हमदोनो पेरिस में हैं और यह प्यार का मौसम है ! एलेन डिकासा रेस्त्रां में दोनों प्रवेश कर गए ! दस बारह जोड़े और बैठे थे ! लड़की बहुत खुश थी ! वो चुप थी ! इस पल को वो अपने आँखों से बोल रही थी ! लड़का सब कुछ उसके आँखों से सुन रहा था ! लड़की बोली – सुनो , तुम दुनिया के सबसे बेहतरीन इंसान हो ! लड़का मुस्कुरा दिया ! दोनों ने एलेन डिकासा का पेस्ट्रीज ऑर्डर किया ! लड़की बोली – वाईन लोगे ? लड़का बोला – शायद यह तुम्हारी तौहीनी होगी , पर कॉकटेल का मजा ही अलग है ! लड़की ने वाईन ऑर्डर किया – रेड वाईन ! लड़की ने फिश के भी कुछ आइटम ऑर्डर किये ! मै रोज फिश खाती हूँ – लड़की चहकते हुए बोली ! लड़का बोला – एलेन डिकासा में भी आकर फिश ही खाए – फिर क्यूँ एलेन डिकासा आये ! लड़की हंसने लगी ! अलग अलग टेबल पर कुछ और जोड़े बैठे हुए थे ! लड़की बोली – सब हमें ही क्यों देख रहे हैं ? लड़का बोला – शायद हम इन सबों में सबसे ज्यादा रोमांटिक हो , वैसे भी इस गुलाबी शिफॉन में तुम किसी अप्सरा से कम नहीं दिख रही ! लड़की ने कांटे से फिश का एक टुकड़ा पकड़ लडके के मुह में डाल दी और बोली – अब थोड़ी देर चुप भी रहो ! दोनों का डिनर समाप्त होने को था ! लडके में मन में कुछ चल रहा था …वो मुस्कुरा रहा था ! लड़की खुश थी ! उसकी मासूमियत उसके चेहरे पर छा गई थी ………………..दोनों डिनर के बाद होटल लॉबी में आ गए थे ! लड़की बोली – अब ? लड़का बोला – चलो पेरिस के सैर पर निकलते हैं ! लड़की बोली – क्लब ? लड़का बोला – नहीं , क्लब और डांस फ्लोर पर तुम्हारे साथ नहीं जा सकता ! लड़की बोली – मतलब ? लड़का बोला – मतलब मत ही समझो , होटल से बाहर निकलो ! दोनों बाहर निकल गए ! एक चमचमाती मर्सिडीज खड़ी थी ! लडके ने कार के गेट का दरवाजा खोला – और लड़की को पीछे वाले सीट पर बैठने को बोला ! लड़की हैरान थी ! लड़का मुस्कुरा रहा था ! दोनों पिछले सीट पर बैठ गए ! लडके ने ड्राइवर को इशारा किया ! लड़की बोली – आखिर हम जा कहाँ रहे है ? लड़का बोला – कहीं नहीं ! लड़की बोली – मतलब ? लड़का बोला – बस अगले डेढ़ घंटे पेरिस की सडकों पर एक सैर ! लड़का मुस्कुरा दिया ! लड़की उसके और करीब आ गयी ! कार पेरिस की सडकों में एक माध्यम स्पीड से चल रही थी ! सडकों पर रौनक थी ! लड़की बोली – क्या यही प्रेम है ? लड़का बोला – मालूम नहीं ! लड़की बोली – फिर प्रेम क्या है ? लड़का बोला – एक कंप्यूटर गेम ! लड़की बोली – मतलब ? लड़का बोला – कभी विडियो गेम खेली हो ? लड़की बोली – रोज सुबह शाम और दोपहर ! वो जोर से हंस दी और फिर बोली – तुम्हे याद नहीं , विडियो गेम के चक्कर में तुम्हारा फोन तक रिसीव नहीं करती हूँ ! लड़का थोडा झेंपा ! लड़की बोली – लेकिन विडियो गेम का लव से क्या चक्कर ? लड़का बोला – किसी भी विडियो गेम में कई लेवल होते हैं , हम हर बार हर लेवल को पार नहीं कर पाते , कभी कोई गलती तो कभी कोई और जरुरत आ पड़ती है तो कभी कंप्यूटर हैंग हो जाता है तो कभी कुछ , लेकिन एक बार ऐसा होता है – जब हम सही रास्ते पर होते हैं , हर एक लेवल को पार करते जाते हैं , कोई समय की ख़टपट नहीं , कोई तीसरा तंग करने को नहीं और हम उस विडियो गेम के आखिर लेवल तक पहुँच जाते हैं ! फिर उसके बाद – विडियो गेम खेलने का मन नहीं करता ,कभी किया भी तो यूँ ही पर इंसान खुद को विजेता मानता है ! ऐसे ही प्रेम का खेल है ! कहीं एक लेवल के बाद आउट तो कभी आखिरी लेवल तक ! लड़की चुप थी – आखिरी लेवल क्या है , शादी ? लड़का बोला – शायद नहीं , शादी साथ रहने की गारंटी देता है लेकिन प्रेम का गारंटी नहीं देता , प्रेम प्रकृति है और शादी समाज की उपज ! लड़की बोली – अगर यह एक विडियो गेम की तरह है तो आखिरी लेवल क्या है ? लड़का बोला – मैंने बस समझाने के लिए बोला – लेकिन प्रेम में कोई आखिरी लेवल नहीं होता – अनंत होता है , गैलेक्सी की तरह ! लड़की शांत हो गयी ! टैक्सी अपनी रफ़्तार में थी ! दोनों पिछली सीट पर चिपके हुए थे ! लड़की ने चुपके से अपनी उंगलिओं को लडके के चेहरे पर रखा ! लड़की बोली – तुमको महसूस करती हूँ , कभी कभी ऐसा लगता है – जैसे मेरी जिंदगी में तुम्हारा आना मेरे दादा – दादी का आशीर्वाद है ! अब लड़का खामोश हो गया ! उसके मन का टाइपराइटर चलने लगा – वो लड़की के हर एक बात को संजो कर रखना चाहता था – उसे पता था – ऐसे पल बड़ी मुश्किल से आते हैं और वो हर एक पल को जी रहा था ….बेहतरीन मर्सिडीज टैक्सी पेरिस की सडकों पर अपनी रफ़्तार में चल रही थी …पेरिस अपनी रंगीनी में डूबा हुआ था …बाहर शोर था …टैक्सी के अन्दर एक मधुर ख़ामोशी थी जिसके चादर के अन्दर दोनों लिपटे हुए थे ….अन्जान शहर के अनजान चेहरों के बीच …दो जाने पहचाने …अपनी अपनी  रूहों को निहारते ………………..
लडके ने मर्सिडीज टैक्सी ड्राईवर से एफिल टावर ले चलने को कहा ! रात के साढ़े दस होने को थे ! लड़की ने बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ से लडके को देखा ! दोनों खुद को रोक नहीं पाए ! लड़की बड़ी आहिस्ता ढंग से लडके के होठों को चूमा ! एफिल टावर आ चूका था ! यहाँ रात साढ़े ग्यारह बजे तक लिफ्ट चलती है ! लड़का तेज़ी से एफिल टावर की तरफ बढ़ा ! लड़की कुछ कदम पीछे थी ! एफिल टावर के टॉप फ्लोर तक जाने की टिकट थी ! सत्रह यूरो की ! दोनों एफिल टावर के लिफ्ट में थे ! दोनों रोमांचित थे ! कुछ और टूरिस्ट थे ! लगभग सभी के सभी जोड़े में ! टॉप फ्लोर आ चूका था ! कैमरा के फ्लैश चमकने लगे ! सामने सेन नदी बह रही थी ! रात के अंधियारे में चमकती सेन नदी ! लड़की खामोश थी ! लड़का मुस्कुरा रहा था ! मन में हलचल थी ! दोनों बस पेरिस की इस जगमगाती रात को निहार रहे थे ! लडके ने बोला – अगर बहुत अमीर होता तो अभी एक बेहतरीन नाव में इसी रात इस ख़ूबसूरत नदी में तुम्हारे संग घूम रहा होता – याच समझती हो ? लड़की मुस्कुरा दी और बोली – इतने लम्बे सेंटेंस मत बोला करो , तुमने कह दिया – यही बहुत है ! और यह कहते हुए वो धीरे से लडके के पास आ गयी ! फिर बोली – रोमांस एक कल्पना है तो ये क्या है ? लड़का बोला – पल भर का हकीकत , ओस की बूंदों सा , गुलाब के पंखुड़ी पर छलकता हुआ ! लड़की उससे लिपट गयी ! दोनों अब नीचे उतरने के मूड में थे ! नीचे आ गए ! दोनों टैक्सी स्टैंड के तरफ बढे ! फिर दोनों पलट कर एक साथ एफिल टावर को देखे ! लड़की ने पूछा – ये शहर इतना रोमांटिक क्यू है ? लड़का बोला – मिटटी का सौभाग्य ! लड़की बोली – यहीं बस जाएँ ? लड़का बोला – फ्रेंच सीखना होगा ! लड़की बोली – अब मुझे कुछ नहीं सीखना ! दोनों हंस दिए ! उनकी मर्सिडीज टैक्सी आ चुकी थी ! लडके ने फिर से बहुत प्यार से कार का गेट खोला – लड़की बड़े आराम से बैठ गयी , फिर लड़का भी बैठ गया ! लड़का बोला – बाहर बहुत ठण्ड थी ! लड़की बोली – हाँ ! लड़का बोला – थोडा  भी ठण्ड बढ़ता है और तुम और गुलाबी हो जाती हो – कहते हुए उसने अपनी उंगली लड़की के गाल पर चला दिया ! लड़की बोली – इस रात में भी तुमको मै पिंक दिख रही हूँ ! लड़का बोला – खूबसूरती देखने की चीज़ नहीं होती – महसूस करने की होती है – तुम्हारी तरह लम्बी सांस लेकर , आँखें बंद कर ! लड़की ने मुस्कुरा दिया ! लड़की बोली – क्या यही लव है ? लड़का बोला – शायद , पर प्रेम को समझना बहुत मुश्किल – लेकिन इस वक़्त यही प्रेम है ! मर्सिडीज तेज़ी से होटल के तरफ जा रही थी ! लौटते वक़्त महज दस मिनट में होटल के नजदीक आ चुकी थी ! लडके ने ड्राइवर को इशारा किया , कार होटल से कुछ दूर पहले रुक गयी ! दोनों कार से बाहर थे ! होटल आधा मील दूर था ! दोनों टहलते हुए होटल की तरफ चल पड़े ! लडकी बोली – लव का कोई सब्स्च्युट नहीं है ! लड़का बोला – हाँ , दुनिया का सबसे ताकतवर चीज है – प्रेम ! लड़की बोली – फिर दुनिया में इतनी दिक्कत क्यूँ ? लड़का बोला – प्रेम की चाहत तो सबको होती है पर प्रेम कैसे करें – यह किसी को नहीं पता ! दोनों खामोश हो गए ! होटल नजदीक था ! रात के सवा ग्यारह बजने को थे !कमरे में पहुँचते – पहुँचते दोनों बुरी तरह थक चुके थे ! लड़की ने बोला – सुबह का क्या प्रोग्राम है ? ! लड़का बोला – सुबह का सुबह देखेंगे ! लड़की बोली – मुझे जोरों की नींद आ रही है , मै चली सोने !लड़का कमरे की बालकोनी में था ! एक सिगरेट जला ली ! बालकोनी से नज़र आ रहे एफिल टावर को देखने लगा ! अब धीरे – धीरे एफिल टावर की बत्तियां बुझानी शुरू हो चुकी था ! लडके ने फिर से एक सिगरेट जला ली ! लड़की बेफिक्र होकर सफ़ेद तकीयों के बीच एक मासूम तबियत सो गयी ! लडके को उसका बेफिक्र होकर सोना बेहद पसंद आता था ।  वो उसको निहारने लगा ! आधी रात वो किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी ! लड़का सोफे पर बैठ गया ! टीवी ऑन कर हिंदी गाने सर्च करने लगा – उसका पसंदीदा गाना – ‘ख़ूबसूरत है वो इतना ..सहा नहीं जाता’ ! कभी टीवी को देखता तो कभी उसको ! जूते खोल दिए थे उसने ! मोजा भी ! टाई भी ! बस सूट पहन वो सोफे पर लेट गया !आधी रात बीत चुकी थी ! आधी रात बाकी थी !………………….सुबह के साढ़े चार बजने को थे ! लड़का गहरी नींद में था ! अचानक से लड़की ने उसको जगाया – सुनो …! लड़की बेड के सिराहने लेटी और चाय के मग को पकडे हुयी थी !  लड़के ने एक आँख खोलते हुए बोला – बोलो …! लड़की बोली – तुम सारी बातें करते हो लेकिन शादी की बात पर लम्बी – लम्बी फिलोसोफी झाड़ने लगते हो ! लड़का बोला – मै कुछ समझा नहीं ? लड़का लड़की के हाथ से चाय का मग लेकर उसकी जूठी चाय पिने लगा ! लड़का बोला – अब बोलो ! लड़की थोड़ी शांत हो गयी फिर बोली – मै कह रही थी ..हमदोनो शादी कब करेंगे ? लड़का बालकोनी की तरफ देखने लगा फिर बोला – मै कुछ भी नहीं कह सकता ! लड़की की भौं तन गयी ! लड़का बोला – क्या इतनी सुबह शादी की चर्चा होनी जरुरी है ? लड़की बोली – हाँ , मै दो घंटे से जाग रही हूँ – हर बार हम मिलते हैं फिर यूँ ही अगली मुलाकात के लिए – मुझे आज और अभी तुम्हारे मुह से शादी की हाँ सुननी है !लड़का बोला – आज तक मैंने तुमसे कभी झूठ नहीं बोला और जो कुछ वादा किया उसको निभाया – मेरे लिए बहुत मुश्किल है यूँ ही कुछ भी वादा कर के निकल जाना ! लड़की बोली – फिर हम चार साल से क्या कर रहे हैं ? लड़का मुस्कुरा दिया और बोला – प्रेम कर रहे हैं ! लड़की बोली – मेरे प्रेम को गारंटी चाहिए ! लड़का बोला – कैसा गारंटी ? लड़की बोली – तुम सिर्फ मेरे हो ! लड़का बोला – यह गारंटी कौन देगा ? लड़की बोली – शादी ! लड़का खीज गया ! लड़की भी थोड़े गुस्से में थी – वो चाय के इलेक्ट्रिक केटली के पास और चाय बनाने के लिए गयी ! लड़का बोला – मेरे लिए भी एक कप ! लड़का अपनी आँखें नचाने लगा ! लड़की केतली के पास खड़े होकर दुसरे तरफ देखने लगी !फिर वहीँ से बोली – तुम कायर हो , डरपोक ! लड़का बोला – शायद ! लड़की – नहीं …तुम सचमुच में डरपोक हो ! लड़का बोला – एक मंगलसूत्र पहना देने से मै साहसी हो जाऊंगा ? लड़की बोली – तुम नहीं समझोगे एक औरत का मन ! लड़का बोला – शादी समाज का नियम है ! लड़की बोली – समाज के नियम इंसान के स्वभाव को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं ! लड़का बोला – यह मेरा डायलोग है ! लड़की बोली – चार साल से तुम्हारे साथ हूँ तो फिर राजेश खन्ना का डायलोग कहाँ से बोलूं ! लड़का जोर से हंसाने लगा ! लड़की गुस्से में और खामोश हो गयी ! दोनों चुप थे ! थोड़ी देर बाद लड़का बोला – मेरे लिए जुबान बहुत बड़ी बात है , जीवन में कोई भी हो जुबान देने के पहले सौ बार सोचता हूँ – कुछ झूठे वायदे किये जा सकते हैं लेकिन मेरे लिए और शायद तुम्हारे साथ बहुत मुश्किल है ! लड़की बोली – फिर ऐसे कैसे चलेगा और कब तक ? लड़का बोला – मेरी नज़र से देखो तो शायद जीवन भर ! लड़की बोली – और मेरा जीवन ? लड़का बोला – अगर प्रेम नहीं बाँध सका तो ये मंगलसूत्र भी नहीं बाँध सकेगा ! लड़की बोली – मेरा घर , परिवार , हित कुटुंब , समाज भी कुछ सवाल लेकर बैठा है ! लड़का बोला – सब भूल जाओ ! लड़की को तेज़ गुस्सा आया – कायर ..डरपोक ..बोलते हुए बाथरूम में घुस गयी – उसकी आँखें भरी हुई थी ! लड़का बेड से कूदते हुए लड़की के पीछे – पीछे ! लड़की आईने के पास थी ! लड़के ने पीछे से जकड लिया और धीरे से उसकी कानों में फुसफुसाया – बेहद ख़ूबसूरत – तुमसे बेहतर कोई और खुशबू नहीं ! लकड़ी की आँखों से दो बूँद मोती टपक गए ! दोनों की आँखें बंद थी ! आईना दोनों के बेपनाह मुहब्बत का गवाह बन रहा था …आसमां नीला हो चूका था …चाँद डूबने को बेताब था और सूरज उगने को …उषा और प्रत्युषा का मिलन …चाँद को एक नज़र देखने को बेताब सूरज …जन्मो की प्यासी रूहों का मिलन …मन से देह के रास्ते पर था …बालकोनी से एफिल टावर भी झाँक रहा था ……………………..वो प्रेम था और वो प्रकृति थी ! दोनों एक दुसरे को इसी नाम से पुकारते थे ! प्रेम अथाह प्रेम लेकर आया था और प्रकृति तो शुद्ध प्रकृति ही थी ! बिलकुल उन्मुक्त थी प्रकृति – जिसपर ईश्वर का भी जोर न चले ! उसने प्रेम से एक बार पूछा था – तुम मुझे प्रकृति क्यों कहते हो ? प्रेम बोला था – जब पहली दफा तुम्हे देखा तो यही ख्याल आया जैसे मै प्रकृति से मिल रहा हूँ – कभी किसी नदी को देखी हो , कभी किसी पर्वत को देखी हो , कभी किसी झरने को देखी हो – कभी इनको गौर से देखना – खुद को पाओगी ! प्रकृति भी सोच में पड़ गयी – किसी ने कुछ कहा तो किसी ने कुछ कहा – कभी किसी ने प्रकृति से तुलना नहीं की ! प्रेम बोला – प्रकृति के साथ ज्यादा बंधन – प्रलय , प्रकृति के साथ उन्मुक्त – ईश्वरीय आनंद ! प्रकृति बोली थी – तुम इतना कैसे सोच लेते हो , दिखने में तो ऐसे नहीं दिखते ! प्रेम हंस दिया था ! प्रकृति बेहतरीन कथक नृत्यांगना है ! यूरोप के शहर शहर घूम अपने ट्रूप के साथ ! प्रेम आर्ट और कल्चर पर लिखने वाला ! एक बार बुडापेस्ट में उसे देखा था – प्रेम वहीँ फिसल गया था ! प्रकृति अक्सर पूछती – कैसे , एक बार में ही फिसल गए ! प्रेम हंस देता और कहता – दिल लगी तो एक बार और पहली नज़र में लगी वर्ना कभी नहीं लगी ! प्रकृति भी हंस देती और कहती – ऐसी दिललग्गी तो कई बार लगी , तुम्हारी गाडी यहीं क्यों अटकी ! फिर दोनों जोर से हंसते !प्रेम एक बार बोला था – शायद , मै तुम्हे वर्षों से जानता था ! प्रकृति बोली – कब से ? प्रेम बोला – नया नया यूरोप आया था , तुम्हारे शहर में ही एक प्रोग्राम का कवरेज करना था , पासपोर्ट में भी थोड़ी दिक्कत थी – एम्बेसी गया – काम हुआ , लौटते वक़्त तुम्हारी माँ ने अपने कार में मुझे लिफ्ट दिया था , उन्हें जब पता चला की मै आर्ट और कल्चर पर लिखता हूँ – उन्होंने तुम्हारे बारे में बताया की मेरी बेटी भी कथक डांस करती है और शायद उसी दिन तुम्हे कोई प्राइज़ मिला था ! प्रकृति बोली – उस दिन तुम्हारे मन में क्या आया ? प्रेम हंसते हुए बोला – मै इम्प्रेस हुआ पर तुम्हारी माँ से तुम्हारा उम्र पूछना भूल गया ! प्रकृति भी हंस दी और बोली – हद हो , ऐसे भी कोई इम्प्रेस होता है ! प्रेम आँख नचाने लगा ! प्रकृति बोली – फिर क्या हुआ ? प्रेम बोला – कुछ महीने गुजर गए ! प्रकृति बोली – और तुम मुझे भूल गए 😦 प्रेम हंसते हुए बोला – इसमे उदास होने की क्या बात है , यह तो तब की बात है जब मै सिर्फ तुम्हारे बारे में जाना , बिना नाम / लोकेशन के ! प्रकृति बोली – फिर क्या हुआ ? प्रेम बोला – एम्बेसी का कुछ और चक्कर लगाया , तुम नज़र नहीं आयी ! प्रकृति बोली – लो …मम्मी से मेरा नाम पूछ लेना था ! प्रेम बोला – ह्म्म्म …इतना साहसी मै नहीं था ! प्रकृति मुस्कुरा दी ! प्रेम थोडा गंभीर हो गया और बोला – पहली दफा तुम्हारा नृत्य देखा था – तुम्हारे स्टेप्स से ज्यादा चेहरे का भाव पसंद आया ! प्रकृति बोली – फिर ? प्रेम बोला – फिर क्या ? प्रेम मुस्कुरा दिया ! प्रकृति एक टीनएजर की तरह आगे क्या हुआ का जिद करने लगी ! वो इस पुरे किस्से को कई बार सुन चुकी थी – और हर बार सुनना चाहती थी 🙂 प्रेम बोला – मैने तुम्हारे कई शो देखे और हर बार सोचता – इसबार मुलाकात करूँगा और बिना मिले लौट आता ! प्रकृति बोली – डरपोक 🙂 प्रेम बोला – आज भी हूँ 🙂 प्रकृति बोली – तभी तो इतने प्यारे लगते हो ..:) फिर क्या हुआ ? प्रेम बोला – फिर कुछ महीने तुम्हारे शो नहीं हुए – तुमको खोजता तुम तक पहुँच गया 🙂 प्रकृति बोली – मेरा दरवाजा खटखटाते डर नहीं लगा ? प्रेम मुस्कुराते हुए बोला – नहीं :)दोनो जब भी मिलते – इस कहानी को जरुर दोहराते !पर इस वक़्त दोनों एकदूसरे की बाहों में क़ैद गहरी नींद में थे ! सुबह आठ की तेज़ धुप कमरे की बालकोनी से निकल बिस्तर तक पहुँच रही थी ! लौंड्री वाले ने कमरे का बेल बजाया – दोनों एक साथ जाग गए ! प्रेम ने उसको दरवाजे से ही जाने को कह दिया फिर बेड पर लेट गया और बोला – बेड टी मिलेगी ..क्या ? प्रकृति मुस्कुरा दी ! क्यों नहीं मिलेगी कह कर वो इलेक्ट्रिक केतली के तरफ चल दी !बड़े शहर सोते नहीं है ! सारी रात जागते हैं ! उन्हें थकान नहीं होती ! पेरिस भी सारी रात जाग अब अपना दिन शुरू कर चूका था ! बड़े शहर भी अजीब होते हैं – जो यहाँ रहता है वो भी खुद को मुसाफिर समझता है और जो यहाँ चंद घंटों के लिए आता है – वो तो मुसाफिर होता ही है !पेरिस उनदोनों के दिल में घुलने लगा था ! प्रकृति ने चाय के मग को प्रेम की तरफ बढाते हुए बोली – हम यहीं बस जाएँ ? प्रेम चुप रह गया – जैसे उसने प्रकृति की बात सुनी ही न हो ! …………..दोनों ने तय किया सुबह का नास्ता किसी बिस्टरो में जा कर करेंगे ! प्रेम झटपट जींस और एक इंग्लिश जैकेट डाल लिया ! प्रकृति का मूड जींस का नहीं था ! उसने प्रेम से पूछा – अभी इन्डियन सलवार सूट कैसा रहेगा ? प्रेम बोला – ठीक है लेकिन एक जैकेट डाल लो ! दोनों तैयार थे ! होटल से बाहर निकल टहलने लगे ! धुप ठीक थी ! साढ़े आठ बजने को थे ! दोनों ने गॉगल्स लगा लिया था !प्रकृति ने पूछा – एक बात पूछूं ? प्रेम बोला – एक नहीं सौ बात पूछो ! प्रकृति चुप हो गयी ! फिर बोली – ये रिश्ते टूटते क्यों हैं ? प्रेम मुस्कुरा दिया – इतनी सुबह इतनी सीरियस बात ? प्रकृति बोली – बस यूँ ही पूछ रही थी , तुम्हे कितनी समझ ? प्रेम बोला – रिश्ते बनते क्यों है के पहले ही रिश्ते टूटते क्यों है ? प्रकृति बोली – बताओ भी ! प्रेम बोला – रिश्ते बनते ही हैं टूटने के लिए ! प्रकृति बोली – ये कोई जबाब नहीं हुआ , वैसे भी तुम्हारे ऊपर का सवाल है ! प्रेम सीरियस हो गया और बोला – किसी भी रिश्ते का तीन ही आधार होता है – इमोशनल , फिजिकल और फाइनेंसियल , अगर तुम स्त्री पुरुष के संबंधो की बात कर रही हो तो ! प्रकृति बोली – हाँ ..हाँ ..मै वही बात कर रही हूँ ! दोनों होटल के पीछे वाली स्ट्रीट पर थोड़े तेज़ चलने लगे ! प्रेम बोला – बड़ी मुश्किल से किसी रिश्ते में ये तीनो आधार मौजूद होते हैं , कोई एक भी मौजूद रहा तो रिश्ता टूटता नहीं है ! प्रकृति बोली – फिर आजकल इतने रिश्ते क्यों टूट रहे हैं ? प्रेम बोला – बहुत आसान , तीनो आधार मिसिंग होते हैं ! प्रकृति बोली – ये तीनो कैसे एक एक कर के मिसिंग होते हैं ? प्रेम बोला – बहुत सारी वजहें होती हैं ! प्रकृति बोली – कौन सी वजहें ? प्रेम बोला – अब अचानक से मै नहीं बता सकता , थोडा सोचने दो ! दोनों एक बिस्टरो के पास आ चुके थे ! प्रकृति बोली – पिछली बार भी हम यहीं आये थे ! प्रेम बोला – मेमोरी ठीक है तुम्हारी ! प्रकृति बोली – हाँ , बहुत मजबूत ! प्रेम बोला – सिवाय मेरी बातों को याद रखने के तुमको दुनिया की सारी बातें याद रहती हैं ! प्रकृति बोली – अब तुम कौन से तोप हो जो तुम्हारी बातें याद रखूं ! प्रेम दूर देखने लगा !प्रकृति बोली – सो तुमने बताया नहीं , वो कौन सी वजहें हैं जो इन आधारों को कमज़ोर कर देती हैं ! प्रेम बोला – शायद कमिटमेंट पहली वजह है ! प्रकृति बोली – ये कमिटमेंट क्यों कमज़ोर हो जाता है ! प्रेम बोला – इसकी भी कई वजहें हो सकती हैं , समाज , लालन पालन , खुद का वैल्यू सिस्टम , परिवार और अहंकार …या कुछ और वजहें ! प्रकृति बोली – मतलब ?कॉफ़ी आ चूका था ! प्रेम पूछा – ब्रेकफास्ट में क्या लोगी ? प्रकृति बोली – कॉफ़ी ख़त्म हो जाने दो ! प्रेम बोला – मानव स्वभाव सबसे जटिल होता है – वो क्या देखता है , क्या रिएक्ट करेगा और क्या अपनाएगा – ये सब ईश्वरीय देन है , उसे क्या लुभाएगा – वो क्या ठुकराएगा – कहना मुश्किल है ! प्रकृति बोली – सब मुश्किल है , सब जटिल है फिर तुम बेकार हो , गुस्सा आएगा तो यहीं तुमको तोड़ मोड़ के सेन नदी में बहा दूंगी ! प्रेम बोला – कुछ ब्रेकफास्ट मंगा लो , गुस्से का प्रथम वजह – खाली पेट होना है , पिताशय कुछ तीखा तीखा मन को भेजता है ! यह कह वो हंस दिया !प्रकृति फिर पूछ बैठी – तुमने बताया नहीं की रिश्तों में दरार क्यों आता है …रिश्ते टूटते क्यों है ? प्रेम बोला – शायद …दो में से एक उस रिश्ते की आयु तय करता है ..जो उस रिश्ते को लीड कर रहा होता है ..! प्रकृति बोली – जब ये लीड और लैग ही है फिर प्रेम कैसा ? प्रेम बोला – हाँ , जब रिश्ते में लीड और लैग होने लगे तभी संभल जाना चाहिए – प्रेम एकदम बराबरी मांगता है और इंसान का अहंकार किसी भी रिश्ते में बराबरी को बर्दाश्त नहीं कर पाता , या तो वो झुक कर रहेगा या झुका पर रहेगा !प्रकृति चुप हो गयी ! कुछ सोचने लगी ! फिर बोली – कुछ कन्फ्यूजन है ,  प्रेम बराबरी मांगता है और रिश्ते बराबरी बर्दाश्त नहीं पाते ! प्रेम बोला – कल्पना करो तुम एक तेज़ कार चला रही हो …और अचानक से उस कार का पेट्रोल ख़त्म हो जाए …बगैर पेट्रोल भी वह कार अपनी रफ़्तार के चलते कुछ दूर चलेगी लेकिन पेट्रोल नहीं रहने के कारण वह बंद हो जायेगी , अगर उस कार में  गौज मीटर नहीं है फिर इंसान सीधे इंजन की तरफ भागेगा ! प्रकृति बोली – पर आजकल तो गौज मीटर  के साथ कार आती है ! प्रेम बोला – मान लो ! प्रकृति बोली – ऐसे कैसे मान ले …:) और वो मुस्कुरा दी ! प्रेम भी मुस्कुरा दिया !प्रकृति बोली – प्रेम में लोग एकदूसरे को हर्ट क्यों करते हैं – कहा जाता है – लव नेवर हर्ट्स ! प्रेम बोला – दो इंसान के बीच प्रेम एक कवच होता है – जैसे एक वस्त्र जिसमे हवा या पानी भरा हो ! प्रकृति बोली – फिर ? प्रेम बोला – फिर इंसान तो इंसान ही है , अपेक्षा में कुछ गड़बड़ी हुई , इंसान इंसान को हर्ट करना शुरू कर देता है , लेकिन वह वस्त्र उसे सचमुच में हर्ट होने से बचा लेता है , उसी वस्त्र के अन्दर प्रेम भरा हुआ है ! प्रकृति बोली – जब वस्त्र या प्रेम है फिर भी तो हर्ट महसूस होता है , रिश्ते टूट जाते हैं ! प्रेम बोला – अगर तुम लगातार एक ख़ास जगह हर्ट करोगी – वस्त्र में लीकेज आ जाएगा , वहीँ से प्रेम ब्लीड शुरू कर देता है और प्रेम धीरे धीरे ख़त्म हो जाता , फिर अगला कोई भी चोट इंसान बर्दास्त नहीं कर पाता है – चोट लगती है और इंसान रिश्ते से बाहर निकल जाता है – मुड कर बहुत दूर चला जाता है !प्रकृति बोली – कुछ समझ में नहीं आया , बहुत सारी बातें हो गयीं ! प्रेम बोला – बोला था न , मानव स्वभाव बहुत जटिल होता है , इसलिए मुझे जटिलता से बेहद घृणा है , भय लगता है ! प्रकृति बोली – हाँ , तू एक सरल इंसान है !प्रेम बोला – ये धुप जो तुम्हारे चेहरे पर छन छन के आ रही , तुम चमक रही हो ! प्रकृति बोली – तुम इतनी प्रसंशा करते हो , थकते नहीं ? प्रेम ने अपने इंग्लिश जैकेट का कालर छुते हुए बोला – जो थक गया , वो प्रेम का प्रेम नहीं …!! दोनों हंस दिए !दोनों हंसते बहुत थे ! दोनों लड़ते बहुत थे ! दोनों बेहद हसीन थे ! दोनों एक दुसरे से प्रेम करते थे ………………………………ब्रेकफास्ट टेबल पर आ गया था ! फ्रेंच टोस्ट और ऑमलेट ! प्रकृति बोली – कुछ फ्रेंच खाना था ..न ! प्रेम बोला – अब जो आ गया है ..वो खा लो ! प्रकृति बोली – जी ! प्रकृति जब थोडा सीरियस होती वो प्रेम की बातों को ‘जी’ कह कर रिप्लाई देती ! प्रेम चुप हो जाता ! इन चार सालों में दोनों एक दुसरे के हर पल के भाव को समझ गए थे ! दोनों अपने अपने जैकेट उतार बिस्टरो के कुर्सी के पीछे टांग दिये ! खिली धुप अच्छी लग रही थी ! प्रकृति बोली – प्रेम कैसे करते  हैं , कोई सिंपल फार्मूला बताओ ! प्रेम हंस दिया – प्रेम होगा तो फार्मूला खुद ब खुद बन जाएगा , निकल आएगा ! प्रकृति बोली – फिर भी ..ये बताओ ..तुम्हे सबसे अच्छा क्या लगता है ? प्रेम बोला – सबसे सुखद अनुभव होता है , जिस चीज़ की मै बहुत इज्ज़त देता हूँ , जब उसी चीज़ को तुम भी उसी नज़र से देखती हो , शायद तुम्हे भी मेरा ऐसा करना अच्छा लगता होगा ! प्रकृति ने उंगली से चिली सौस को चखते हुए सर हिला दिया ! प्रकृति बोली – सबसे महतवपूर्ण क्या है ? प्रेम बोला – सामने वाले की प्रकृति को समझना , कभी माँ और बच्चे के प्रेम को देखी हो ? प्रकृति मुस्कुरा दी ! प्रेम भी मुस्कुरा दिया फिर बोला – एक माँ अपने बच्चे की प्रकृति से बहुत परिचित होती है , तभी वो पूर्ण प्रेम कर पाती है ! प्रकृति बोली – उस सम्बन्ध के और भी कारण है , मै माँ और औलाद की बात नहीं कर रही ! प्रेम बोला – वही बात मै भी कह रहा , जब दो इंसान करीब आयेंगे , दोनों को एक दुसरे की प्रकृति को समझना होगा ! प्रकृति बोली – यह कैसे होगा ? प्रेम बोला – जब आपस में प्रेम होगा ! प्रकृति बोली – फिर तो सारी बात प्रेम पर ही आ गयी !दोनों अपने अपने नाश्ते में व्यस्त हो गए ! प्रेम की छुरी और काँटा दोनों प्लेट से लड़ आवाज़ पैदा कर रहे था ! प्रकृति ने उसे एक नज़र देखा और बोला – एकदम देहाती हो ! प्रेम हंस दिया ! प्रकृति बोली – अजीब इंसान हो , हर बात पर हंस देते हो ! प्रेम बोला – और कोई उपाय भी नहीं है ! प्रकृति बोली – इंसान को ऐसा भी नहीं होना चाहिए ! प्रेम पूछा – कैसा ? प्रकृति बोली – तुम्हारे जैसा , अहंकारविहीन , दुनिया तुमको खा जाएगी ! प्रेम बोला – तुमसे कुछ बचेगा तब तो दुनिया मुझे खाएगी ! दोनों हंसने लगे !प्रकृति बोली – तुम अक्सर प्रकृति की बात करते हो , किस प्रकृति की बात ? प्रेम बोला – जैसे हम इंसान भी जानवर हैं , अन्य जानवरों से अलग – जैसे बकरी , शेर , गाय , हाथी – सबकी प्रकृति अलग है , वैसे ही स्त्री और पुरुष की प्रकृति अलग है – ठीक वैसे ही हर इंसान की एक अलग प्रकृती होती है ! प्रकृति बोली – पर , सबका अआत्मा तो एक जैसा ही होता है ..न ! प्रेम बोला – मै तुम्हारे इस बात का हर बार खंडन करता हूँ , जैसे हर किसी के पास एक जैसा शरीर , ठीक वैसे ही हर किसी की आत्मा भी अलग अलग होती है , तभी शायद हम एक ही चीज़ को देखते हैं पर महसूस अलग अलग होता है ! प्रकृति अब अपने गालों पर हाथ रख चुप हो गयी !प्रकृति बोली – आत्मा की बात उतनी सरल नहीं है , जितनी सरलता से तुम बोल देते हैं ! प्रेम बोला – अगर आत्मा की बातें जटिल भी हों , क्या हर्ज़ उन्हें सरलता से देखने में , हर एक चीज़ में जटिलता क्यों खोजें ?प्रकृति बोली – खैर छोडो , ये बताओ आज शाम हम कहाँ जाएंगे ? प्रेम बोला – आज की शाम सेन नदी के नाम ! यह कह वो मुस्कुरा दिया ! प्रकृति बोली – गीत गाओगे ? प्रेम बोला – हाँ ! प्रकृति की आँखों में चमक थी – कौन सा ? प्रेम बोला – ‘चुरा के दिल मेरा …’ ! प्रकृति बोली – ओह ! प्रेम बोला – उस गीत के बोल मुझे बेहद पसंद हैं , लिरिक्स मन को छूता है और उस गीत में एक सीन है – जब देर शाम समुद्र किनारे ….कभी देखना उस गीत को गौर से और सुनना भी ! प्रकृति थोड़ी थक सी गयी थी , जम्हाई लेते हुए बोली – मालूम नहीं , क्या क्या देखना और सुनना होगा ! प्रेम बोला – बहुत कुछ …! उसने  प्रकृति के नाकों को उंगली से छूते हुए बोला – मुझे बूट वाली प्रकृति बेहद पसंद ..:)) प्रकृति हल्का इतराती हुई बोली – अच्छा ..:))प्रेम बोला – एक कप और बढ़िया चाय ..हो जाए ! प्रकृति बोली – बहुत चाय पीते हो ! प्रेम बोला – हाँ , बस चले तो हर घंटे ! प्रकृति मुस्कुरा दी ! प्रेम बोला – सुनो , जब तुम चाय के मग को अपने दोनों हाथों से पकड़ , चुस्किओं के बीच मुझे देखती हो …बहुत प्यारी लगती हो !प्रकृति ने टेबल पर ही प्रेम का हाथ पकड़ लिया और बोला – यहीं रह जाएं …पेरिस में …:)) प्रेम बोला – उसी होटल में ..हमेशा के लिए वो कमरा बुक …इतना भी बड़ा रईस मै नहीं …!प्रकृति बोली – फिर तूम बेकार हो ..:(दोनों हंस दिए ! दस बजने को बेताब था ! स्ट्रीट पर चहलकदमी बढ़ गयी थी ! लोग उस बिस्टरो में रुकते और चाय / कॉफ़ी पि कर निकल जा रहे थे ! पर ..प्रेम और प्रकृति वहीँ जमे हुए थे …पेरिस के उस बिस्टरो में …:)) ………………………चाय की चुस्किओं के बीच प्रकृति बोली – आकर्षण से ही प्रेम शुरू होता है ! प्रेम बोला – हाँ ! प्रकृति बोली – तुम पहली नज़र में ही जबरदस्त आकर्षण लेकर आये थे , खुद को रोकना मुश्किल था ! प्रेम बोला – शायद , इसलिए की वह आकर्षण दो तरफ़ा था , जितना तुम्हारे लिए मेरे अन्दर था उतना ही मेरे लिए तुम्हारे अन्दर था – मुचुअल ..शायद यहीं प्रेम पनपता है ! प्रकृति बोली – हाँ …फिर ? प्रेम बोला – सुबह से शाम तक हम कई चीज़ों और इंसान आकर्षण पैदा करते हैं – हर किसी के लिए तो प्रेम नहीं हो पाता ! प्रकृति बोली – ऐसा क्यों ? प्रेम बोला – बहुत सारी वजहें हैं ! प्रकृति बोली – कौन सी वजहें ? प्रेम बोला – समय , स्वभाव , बात , जरुरत , …शायद कई चीज़ें ! प्रकृति बोली – हाँ , कई बार लगता है तुम बिलकुल मेरे जैसे हो ..लेकिन अभी नहीं लग रहा ! प्रेम हंस दिया ! प्रकृति बोली – तुम इतनी सारी बातें कैसे सोच लेते हो ? प्रेम बोला – ये दुनिया तो पुरुषों के लिए बनी , लेकिन ईश्वर ने स्त्री बना पुरुषों की सारी शक्ति ले ली ! प्रकृति बोली – ऐसा कैसे ? प्रेम बोला – दुनिया की सबसे ताकतवर चीज़ औरत का प्रेम होता है – किसी भी रूप में , माँ , बहन , बेटी , प्रेमिका , पत्नी – उसके रूप और प्रेम में इतना ताकत होता है की वह पुरुष के बल और साहस को कई गुना कर सकता है – फिर पुरुष इस सृष्टि का भोग करता है ! प्रकृति बोली – शायद ये दोनों के लिए लागू होता है ! प्रेम बोला – हो सकता है ! प्रकृति बोली – तुम गजब का सुरक्षा लेकर आये थे – ये चीज़ तुम्हारी अनोखी है – एकदम से चौतरफा इमोशनल बाँध देते हो ! प्रेम बोला – शायद सभी पुरुष ऐसा करते होंगे ! प्रकृति बोली – नहीं , ऐसा नहीं है ..कई और कमज़ोर कर देते हैं ! प्रेम बोला – मुझे कभी भी इन्सिक्युरिटी नहीं हुई , लेकिन सामने वाले के मन की चंचलता से भय लगा क्योंकि खुद बहुत एकाग्र रहता हूँ ! प्रकृति बोली – शायद यही इन्सिक्युरिटी है ! प्रेम बोला – बाज़ार है , बेशकीमती इंसान साथ में हो तो भय लगेगा ही ! प्रकृति बोली – फिर , बचाओ , सभालो , मर्द बनो ! प्रेम बोला – पिछले चार साल से कर क्या रहा हूँ ? प्रकृति मुस्कुराते हुए बोली – प्रेम 🙂 प्रेम बोला – प्रेम करना आसान है क्या ? प्रकृति बोली – जितना ये शब्द दिखने में लगता है – उतना ही मुश्किल है – तुम्हे नहीं लगता जैसे तुमने पृथ्वी से भी भारी चीज़ उठा लिए हो ! प्रेम जोर जोर से हंसाने लगा और बोला – अब आदत हो गयी है और जब आदत हो गयी तुम पृथ्वी से भारी तो नहीं लेकिन गुलाब की पंखुड़ी से भी कोमल लगती हो ! प्रकृति खुश हो गयी और बोली – पास आओ , एक किस करूँ ! प्रेम बोला – इतने लोगों के बीच ? प्रकृति बोली – फिर पेरिस क्यों आये , रहना था वहीँ झुमरी तिलैया में ! प्रेम हंसने लगा और बोला – तुम्हारी कई चीज़ें बेहद पसंद ! प्रकृति बोली – मतलब , बाकी चीज़ें नहीं पसंद ? प्रेम बोला – नहीं नहीं ऐसा नहीं है …! प्रकृति बोली – खैर छोडो ..तुम्हे मुझमे क्या क्या पसंद ? प्रेम बोला – तुम बहुत साहसी हो , अन्दर की – तुम्हे पता है – जब मै तुमसे मिला – तुम्हारे बचपन से लेकर अब तक की सारी ज़िन्दगी खुद ट्रेवल कर के देखा – इससे दो फायदा हुआ , तुमको अन्दर से स्वीकार किया , प्रेम मजबूत हुआ और तुम्हारे गुणों को महसूस किया ! प्रकृति बोली – हुजुर ..आगे भी बोलिए ! प्रेम बोला – तुम्हारे ह्रदय और चेहरा का डाइरेक्ट कनेक्शन है , यह आसान नहीं है – ईश्वरीय देन है – इंसान कितना भी कुछ खुद से पा ले – असल आकर्षण तो ईश्वरीय देन ही पैदा करता है ! प्रकृति बोली – बोलते जाओ …मिस्टर आशिक ..रुको मत ! प्रेम बोला – पुरुष हूँ – आखों के माध्यम से आकर्षण और प्रेम आएगा ! प्रकृति बोली – मतलब ? प्रेम बोला -मोनिका बलूची से भी ज्यादा ख़ूबसूरत बनावट है ! प्रकृति बोली – आगे …? प्रेम बोला – एक कप और चाय के बाद – होटल लौटने का मूड बन रहा है ..:))प्रकृती बोली – ओह ….:)) …………..चाय ख़त्म होने के बाद प्रेम ने बिल पे किया ! प्रकृति भी उठ खड़ा हुई और बोली – सुबह से कितनी चाय हुई ! प्रेम बोला – तुमसे एक कप कम ! प्रकृति बोली – तुम सब चीज़ों में मुझसे क्यों कम्पेरिजन करते हो ? प्रेम बोला – अजीब हो , यार ये सब तुम नहीं समझोगी ! प्रकृति बोली – मै सब समझती हूँ , तुम प्रेम हो ..प्रेम ! प्रकृति उसके बेहद नजदीक आ गयी और बोली – सुबह फेस शेव क्यों नहीं किया …वैसे अच्छे दिख रहे हो !दोनों होटल की तरफ निकल पड़े ! प्रकृति बोली – सुनो , तुम कह रहे थे – पुरुष आँखों के द्वारा प्रेम करते हैं फिर अंधे कैसे प्रेम करते हैं ! प्रेम बोला – वो बोलने को बोल दिया – आँखों के द्वारा चाहत पैदा होती है , आकर्षण – प्रेम ह्रदय से किया जाता है ! प्रकृति बोली – वो सब को पता है , कोई नयी बात नहीं है ! प्रेम बोला – प्रेम में इंसान अपनी सभी इंद्रियों का सुख एक ही इंसान से पाना चाहता है । प्रकृति बोली – मतलब ? प्रेम बोला – मतलब यह कि – जब हम दोनो साथ हैं …:)) प्रकृति बोली – ओह …पर अंधे कैसे प्रेम करते होंगे । प्रेम बोला – शायद , उनकी कल्पना शक्ति आम इंसानो से ज़्यादा मजबूत होती होगी , अपनी कल्पना में वो एक तस्वीर बनाते होंगे और उस तस्वीर को अन्य इंद्रियों के साथ मिला कर अपने प्रेम को पूर्ण समझते होंगे । प्रकृति बड़ी मासूमियत से बोली – मालूम नहीं …पर महाभारत की गांधारी याद आ गयी , मालूम नहीं उनकी ज़िद थी या ख़ुद के नसीब से घृणा । प्रेम चुप रह गया । दोनो कमरे में प्रवेश कर गए । प्रकृति बोली – एकदम से थक गए । प्रेम बोला – ऐसा भी नहीं । प्रकृति बेड पर लेट गयी । प्रेम ने टीवी ऑन कर दिया और समाचार देखने लगा । प्रकृति बेड से उठ प्रेम के बग़ल सोफ़ा पर बैठ गयी और बोली – सुनो , सारी दुनिया से पोलिटिक्स और क्रिकेट के गप्प करते हो , मुझसे क्यों नहीं करते ? प्रेम ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा । प्रकृति बोली – यह हँसने की बात नहीं है । प्रेम ने प्रकृति को अपने बाहों में जकड़ लिया । प्रकृति ने फिर उसके होंठों पर अपनी ऊँगली रख दी । टीवी कुछ बोल रहा था । दोनो एक दूसरे से चिपके हुये थे । प्रेम बोला – सबकुछ भूल सकता हूँ पर तुम्हारी ख़ुशबू नहीं , आँखों पर पट्टी बाँध किसी कमरे में छोड़ दिया जाए और अगर तुम आस पास हो फिर ख़ुशबू के सहारे तुम तक पहुँच सकता हूँ । प्रकृति मुस्कुरा दी और बोली – कुत्तों वाली गंधशक्ति लेकर पैदा लिए हो । प्रेम बोला – शायद और भी बहुत कुछ । प्रकृति बोली – जैसे ? प्रेम बोला – कुत्तों वाली वफ़ादारी भी । प्रकृति और ज़ोर से चिपक गयी । …………..’ तुम कभी मुझे सिनेमा नहीं दिखाते 😦 ‘ प्रकृति थोड़ा शिकायत लहजे में बोली । प्रेम हाथ में टीवी का रिमोट नचाने लगा और बोला – मालूम नहीं , सिनेमा मुझे कभी आकर्षित नहीं किया – हमेशा यही लगा – ये सिनेमा के पर्दे पर दिख रहा रोमांस असल नहीं है ।  प्रकृति ने प्रेम के हाथों से रिमोट छीन ली और बोली – तुम एकदम बोर आदमी हो । प्रेम हँसने लगा । प्रकृति बोली – चलो , आज मैं तुम्हें सिनेमा दिखाती हूँ । प्रेम बोला – हमारी कहानी किसी सिनेमा से कम है …क्या ? प्रकृति बोली – एकदम बकवास । प्रेम फ़िर हँसने लगा । प्रकृति ने अपना सर प्रेम के ऊपर रख दिया । प्रेम उसकी ख़ुशबू महसूस करने लगा । प्रकृति अचानक से अपना सर प्रेम के ऊपर से हठा पूछी – तुम अब ग़ुस्सा नहीं होते हो , कहीं तुम्हारा प्रेम कम तो नहीं हुआ ? प्रेम चुप रह गया । प्रकृति थोड़ा बेचैन होकर फिर से पूछी – कुछ बोलो …न । प्रेम ने जवाब दिया – तुम मेरी सबसे बेशक़ीमती जान हो । प्रकृति बोली – जान तो एक ही होती है , ऐसे बोल रहे हो जैसे ढेर सारी जान हों और मैं उनमें से सबसे बेशक़ीमती हूँ । प्रेम बोला – वो बात नहीं , कहने का मतलब मैं तुमसे बेपनाह मुहब्बत करता हूँ । प्रकृति बोली – फिर ? प्रेम बोला – इंसान सहम जाता है । प्रकृति बोली – मतलब । प्रेम बोला – भय के साथ ठिठुरना । प्रकृति बोली – किस बात का भय ? प्रेम बोला – तुम्हें खोने का भय । प्रकृति बोली – क्या बकवास बात है । प्रेम कमरे के बालकोनी के तरफ़ चला गया – सिगरेट जलाते हुए बोला – तुम नहीं समझोगी । प्रकृति पास आ गयी , वो अचानक से मासूम होकर प्रेम को पीछे से पकड़ ली और बोली – क्यों करते हो मुझसे इतनी मुहब्बत , अब तुम्हारे मुहब्बत से मुझे डर लगता है । प्रेम बोला – शायद , कई बार भय ठीक होता है – इंसान एक दूसरे से चिपके तो होते हैं , वरना भयमुक्त इंसान क्या क्या तोड़ दे , उसे ख़ुद नहीं  पता । प्रकृति बग़ल में आ गयी – सिगरेट का एक कश मुझे भी लेना है । प्रेम हंस दिया । प्रकृति फिर से चिपक गयी । दोनो साथ साथ कमरे में टहलने लगे । प्रकृति ने बोला – सुनो , मुझमें तुमको सबसे अच्छा क्या लगता है ? प्रेम मुस्कुराने लगा – कान में बोलूँगा । प्रकृति भी मुस्कुराने लगी – फ़ालतू बात मत करो । प्रेम थोड़ा सिरीयस होकर बोला – तुम्हारे अंदर वो अहंकार नहीं है जो अन्य लड़कीयों को होता है , शायद इसी वजह अनजान बहुत जल्दी नज़दीक आ जाते होंगे , मुझे कभी यह एहसास ही नहीं हुआ की  मैं एक मशहूर नृत्यांगना से बातें कर रहा हूँ । प्रकृति बोली – सब ऐसे ही होते हैं । प्रेम थोड़ा ग़ुस्से में आ गया – कई बार बोल चुका हूँ , सब एक जैसे नहीं होते । प्रकृति बोली – ठीक है ..बाबा , सब एक जैसे नहीं होते – अब आगे बोलो । प्रेम बोला – मूड नहीं है । प्रकृति बोली – चाय पीयोगे ?, प्रेम मुस्कुरा दिया – हां , चीनी मत डालना , उसे थोड़ा जूठा कर देना …:))प्रकृति बोली – पागल हो …प्रेम बोला – प्रेमी हूँ …:)) ……………….दोनों बेड पर आ गए – अपने अपने चाय मग के साथ ! दोनों खूब चाय पीते थे – दोनों खूब गप्प करते थे – दुनिया जहान से लेकर , अपनी रोज मर्रा की ज़िन्दगी तक ! प्रेम ने टीवी का वोल्यूम कम कर दिया ! प्रकृती बोली – आज लंच का मूड नहीं है ! प्रेम बोला – हाँ , आज दोपहर यही रूम में बिताते हैं ! प्रकृती बोली – और पेरिस ? प्रेम हंस दिया और बोला – पेरिस घुमने कौन आया है , मुझे तो बस तुम्हारे साथ कुछ पल रहना था ! प्रकृती बोली – अजीब हो , तुम्हारा प्रेम कभी घटता नहीं ? प्रेम चुप रह गया ! प्रेम बोला – कभी कभी तुमसे बहुत सारी बातें करने का मन करता है ! प्रकृति बोली – जैसे ? प्रेम बोला – जैसे …बहुत कुछ ..सब कुछ ! प्रकृति बोली – रोका कौन  है ..करो न ! प्रेम बोला – शायद हम सभी के अन्दर एक और इंसान होता है , जिसे हम मन कहते हैं – वह मन किसी और इंसान के मन से मिलना चाहता है , उससे अपनी बात कहना चाहता है ! प्रकृती मुस्कुरा दी और बोली – हाय रे …मेरे मन के साथी 🙂 प्रेम को गुस्सा आया और बोला – इसलिए ही मै तुमसे कुछ नहीं कहता , मै आम के मोड़ में रहता हूँ , तुम्हे इमली पसंद ! प्रकृती भी गुस्सा गयी – तो खोज लो …कोई आम वाली ! प्रेम मुस्कुरा दिया – इसी धमकी पर हम फ़िदा हैं ! प्रकृती बोली – कब तक ? प्रेम बोला – जब तक है ..जान ! प्रकृती करीब आ गयी और बोली – सुनो , मुझे एक बढ़िया इंसान बनना है ! प्रेम बोला – मतलब ? प्रकृती बोली – मतलब की कोई गैर कोई खोट न निकाले ! प्रेम बोला – मुझे तो तुममे कोई खोट नज़र नहीं आता ! प्रकृती बोली – प्रेमी अँधा होता है पर सबसे ज्यादा खोट तुम ही निकालते हो :/ प्रेम बोला – ओह …! प्रकृती बोली – ओह ..क्या ? प्रेम बोला – कुछ भी नहीं !प्रकृती समझ गयी – प्रेम का मूड ऑफ हो गया है  ! वह उसके पास आ गयी और उसके बालों में अपनी उंगली फेरने लगी ! प्रेम मुस्कुरा दिया ! प्रकृती मुस्कुराते हुए बोली – तुम कुछ देर तक क्यों नहीं रूठते हो , तुरंत मान जाते हो ? प्रेम बोला – जब मान ही जाना है , फिर देर तक रूठने का फायदा ? दोनों हंस दिए !प्रकृति बोली – सुनो , कभी हम दोनों इण्डिया साथ चलेंगे, मुझे ताजमहल देखना है  ! प्रेम बोला – कब ? प्रकृति बोली – जब जोर की तमन्ना जागेगी ! प्रेम मुस्कुरा दिया – पता है तुम्हे …तुम अक्सर डिजायर की बातें करती हो और मै इस डिजायर वाली बातें महसूस करता हूँ ! प्रकृति बोली – मतलब ? प्रेम बोला – दो रूहों का खेल महसूस की हो ? प्रकृति अचानक से उठ कर बैठ गयी – कौन सा खेल ? प्रेम बोला – एक डिजायर / तमन्ना रूह से पैदा होती है और दुसरे रूह तक पहुंचती है – और दूसरा रूह उसे महसूस करता है फिर वो वैसा ही करता है जो पहले रूह की चाहत होती है !प्रकृति बोली – मालूम नहीं …तुम क्या क्या महसूस करते हो …! प्रेम बोला – महसूस तो तुम भी करती होगी ! प्रकृति बोली – मै नहीं महसूस करती और मुझे जोर की नींद आ रही है ! प्रेम हंस दिया – पास आओ …मेरे बिलकुल पास …बढ़िया नींद आएगी ! प्रकृति मुस्कुराते हुए प्रेम की बाहों में सिमट गयी ! और प्रेम की उँगलियाँ प्रकृति की बालों में थी – प्रेम ने धीरे से बोला – तुम भी ..न ..ज्यादा देर नहीं रुठती हो , तुरंत मान जाती हो ! प्रकृति से उसे तिरछे नज़र से देखा – किसने कहा ..मै मान गयी हूँ …!प्रेम ने बोला – तुम्हारी आँखें ..:))प्रकृति ने आँखों को मूँद – मुस्कुराने लगी ….अब बोलो !प्रेम ने कहा – ये तुम्हारे होठं …दोनों पेरिस में थे ! दोनों दोपहर में थे ! दोनों एक दुसरे की बाहों में थे ! रूहों का खेल शुरू हो चूका था – ना उसे पता था और ना उसे ! फिलहाल दोनों के जिस्म एक दुसरे की खुशबू से तरबतर थे ….दोपहर की नींद के आगोश में …:)) …………दोनों गहरी नींद में थे और करीब दो बजे प्रकृति की नींद खुली – उसे जोर की भूख लगी – उसने प्रेम को जगाया ! प्रेम थोड़ी देर और सोने के मूड में थे ! उठ उस बीएड पर बैठ गया और बोला – खुद ही कुछ खाने का ऑर्डर कर दो ! प्रकृति ने कहा – नहीं , तुम ऑर्डर करो ! प्रेम ने इंटरकॉम लगाया और ‘चिकेन फ्राईड राईस’ बोला ! प्रकृति बोली – यहाँ पेरिस में भी चाईनीज खाओगे ? प्रेम मुस्कुरा दिया ! चिकेन फ़्राइड राईस आ चूका था ! प्रकृति को जोरो की भूख – उसने चम्मच को प्लेट की तरफ बढ़ाया ! प्रेम ने रोक दिया ! प्रेम खुद से चम्मच में चिकेन राईस डाला और प्रकृति के मुह में डालने लगा ! प्रकृति ने आँखें बंद कर मुह खोल ली ! प्रेम उसको निहारने लगा ! प्रकृति का पहला कौर ख़त्म हुआ और बोली – कब तक यूँ ही प्रेम करोगे ? प्रेम मुस्कुरा दिया और बोला – सातों जनम ! प्रकृति हंस दी और बोली – और ..कल ही लड़ने लगोगे ! प्रेम बोला – वो लड़ने का हक भी तुम्ही ने दिया है ! प्रकृति मुस्कुरा दी और बोली – कोई हक वक मैंने नहीं दिया है , अपनी सीमा में रहो और फिलहाल मुझे अपने चम्मच से खिलाओ – बहुत बढ़िया लग रहा है …बहुत ही बढ़िया 🙂 प्रेम पूछा – चिकेन फ्राइड राईस बढ़िया लग रहा है या मेरे खिलाने का अंदाज़ ? प्रकृति ने अपना हाथ अपने सर में रखते हुए बोला – हे भगवान् , तुम तो बिलकुल डम्ब हो ..! प्रेम बोला – यह बात तुम्हे पहले दिन ही समझ लेनी थी की मै कितना डम्ब हूँ ! प्रकृति बोली – तब मै भी डम्ब थी ! दोनों जोर से हंसने लगे ! प्रेम ने पानी का ग्लास प्रकृति की ओर बढ़ा दिया !
प्रेम बोला – जानती हो ? प्रकृति बोली – क्या ? प्रेम बोला – लडके बिना प्यार के भी यह जता देते हैं की वो प्यार कर रहे हैं और लड़कियाँ प्यार कर के भी ऐसे बोलेंगी जैसे वो प्यार नहीं कर रही ! प्रकृति बोली – यह किस बात पर ऐसा बोले ? प्रेम बोला – बिलकुल डम्ब हो ! फिर दोनों जोर से हंसने लगे !
प्रेम बोला – एक सिगरेट जला लूँ ? प्रकृति बोली – कब छोड़ेगे , सिगरेट ? प्रेम बोला – पता नहीं ! प्रेम सिगरेट के साथ कमरे के बालकोनी में चला गया ! प्रकृति भी पीछे – उसने प्रेम को पीछे से जोर से पकड़ लिया ! प्रकृति ने पूछा – तुम मुझे कब कब मिस करते हो ? प्रेम बोला – हर वक़्त , जब पास नहीं होती ! प्रकृति बोली – सच बोलो ..न ! प्रेम बोला – सच ही बोल रहा हूँ ! प्रकृति बोली – जोर से कब कब मिस करते हो ? प्रेम बोला – चार बार , सुबह जागने के समय – , तुम्हारे नाश्ते के समय , तुम्हारा लंच टाईम और रात सोने के समय ! प्रकृति बोली – बस ..चार बार ? प्रेम बोला – अभी बोला ..हर वक़्त मिस करता हूँ तो तुमको विश्वास नहीं हुआ , फिर जोर से चार बार की बात की तो ..अब शिकायत …तुम भी ..न …गजब हो 🙂 प्रेम ने प्रकृति को जोर से पकड़ किस किया ! प्रकृति ने बोला – आज शाम हम कहाँ चलेंगे ? प्रेम बोला – सेन नदी के किनारे एक नौका है  उसपर एक रेस्त्रां है – वहीँ डिनर करेंगे ! प्रकृति बोली – सच ? प्रेम मुस्कुराते हुए बोला – हाँ ..बिलकुल सच …तुम्हारी तरह सच 🙂 प्रकृति ने प्रेम को जोर से पकड़ लिया और पूछा – कब चलेंगे ? प्रेम बोला – शाम सात बजे और मैंने टेबल रिजर्व कर रखा है ! प्रकृति बोली – तब तक हम क्या करेंगे , अभी बहुत समय है ! प्रेम बोला – एक नींद और मारेंगे 🙂 प्रकृति बोली – अब और नहीं सोना .:)
दोनों एक दूसरे की आँखों में हैं  ! दोनों बिलकुल खोये हुए  ! दोनों वर्तमान में हैं  ! दोनों एक ही पल में हैं  ! प्रेम और प्रकृति थे – प्रकृति से उपजा प्रेम …..

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तुम्हें मुझमें क्या अच्छा लगता है – प्रकृति बिछावन पर लेटे हुए पूछी । बग़ल में ही प्रेम भी था – दोनो एक ही तकिया पर सर रखे छत को देख रहे थे । प्रेम बोला – तुम गुलाबी हो । प्रकृति बोली – और ? प्रेम बोला – बहुत कुछ । प्रकृति बोली – जैसे ? प्रेम बोला – ज्ञान , शायद ही कोई ऐसा विषय हो जिसपर मैंने तुमसे चर्चा की हो और तुम्हें उसका ज्ञान न हो , ये बात बहुत अच्छी लगती है । प्रकृति बोली – और ? प्रेम बोला – तुम्हारे चेहरे की चमक , क़ुदरती है , भव्यता है , दुर्गापूजा  के अष्टमी के दिन वाले मूर्ति की भव्यता , भव्यता मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है । प्रकृति बोली – और ? प्रेम बोला – मासूम हो । प्रकृति बोली – रुको मत , बोलते जाओ । प्रेम बोला – बेहद ख़ूबसूरत हो , मैंने कभी गुलाबी रंग वाली इंडियन नहीं देखी , कोई भी पुरुष तुम्हारे साथ ख़ुद के ग़ुरूर को नहीं रोक नहीं पाएगा । प्रेम चुप हो गया । प्रकृति भी थोड़ी देर चुप हो गयी फिर बोली – रुको मत …बोलते जाओ । प्रेम बोला – तुम्हारी ख़ूबसूरती में अबोधता है – एक चुटकी नटखट अन्दाज़ के साथ 🙂 कभी कभी सोचता हूँ – ईश्वर ने किसी चीज़ की कमी नहीं की है – दिमाग़ भी बेहतरीन है । सबसे अच्छी बात तुम एक सच हो :)) प्रकृति बोली – मतलब ? प्रेम बोला – मालूम नहीं , कई बातें महसूस की जाती है लेकिन बोली नहीं जाती लेकिन एक बात आज तक समझ में नहीं आयी । प्रकृति बोली – क्या ? प्रेम बोला – तुमसे ज़्यादा नेचुरल इंसान नहीं देखा , पर तुम्हें फ़ेक चीज़ें कैसे आकर्षित करती हैं ? प्रकृति बोली – जैसी मैं हूँ वैसा ही किसी ग़ैर को समझती हूँ – शायद वही धोखा है । प्रेम बोला – हां , हो सकता है । प्रेम ने प्रकृति को एक चुम्बन किया और बोला – आज मैं तुम्हारे लिए चाय बनाता हूँ 🙂 प्रकृति बोली – परम आनंद …:)) प्रेम बोला – तुम्हारी ख़ूबसूरती के कई रूप हैं , मुझे एक रूप बेहद पसंद – जब तुम चाय के मग को दोनो हाथों से पकड़ मुझे देखती हो – बेहद लुभाती हो । प्रकृति हंस दी और बोली – तुम भी न जाने क्या क्या ग़ौर करते हो और क्या क्या बोलते हो 🙂 प्रेम बोला – ठीक है …अब नहीं बोलूँगा । प्रकृति ने अपनी भौं तानी और बोली – अरे …मैंने कब ऐसा कहा । प्रेम हंस दिया । प्रकृति बाथरूम के तरफ़ निकल पड़ी । प्रेम चिल्लाया – कौन सी चाय लोगी , दार्जिलिंग या आसाम ? प्रकृति बाथरूम से ही ज़ोर से बोली – मुझे चाय नहीं पीना है । फिर बुदबुदाने लगी – जब देखो …चाय …एकदम देहाती । प्रेम सुन लिया और ज़ोर से हँसने लगा और बोला – तुम्हारे मुँह से देहाती सुनना बढ़िया लगता है – एक ऐसे इंसान को देहाती बोलती हो जो दुनिया का सारा कोना छान रखा  हो । प्रकृति बोली – चाँद पर भी चले जाओगे , रहोगे देहाती । प्रेम और ज़ोर से हँसने लगा । चाय की इलेक्ट्रिक केटली ऑन थी । पानी और  प्रकृति दोनो उबल रहे थे – प्रेम ने दोनो मग में चाय रख दी – टीवी ऑन कर दिया । प्रकृति स्नान कर के बाहर निकली …प्रेम हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ – गुलाबी रंग के बाथरॉब में गुलाबी गुलाब की सुगंध और ख़ूबसूरती के साथ भिंगे बाल ….प्रेम बोला – अद्भुत …प्रेम बोला – तुम्हे पता है …दुनिया की सबसे शक्तिशाली चीज़ ? प्रकृति बोली – शायद एक पुरुष का दिमाग ! प्रेम बोला – नहीं , एक अत्यंत खुबसूरत स्त्री ! प्रकृति बोली – कैसे ? प्रेम बोला – एक बेहद शक्तिशाली दिमाग भी एक बेहद खुबसूरत स्त्री के सामने काम करना बंद कर देता है ..:)) दोनों जोर से हंसने लगे !
प्रकृति सचमुच बेहद खुबसूरत दिख रही थी – नहाने के बाद उसकी खूबसूरती और निखर से सुगन्धित हो रही थी ! प्रेम बस निहार रहा था – चुप था …बस देखे ही जा रहा था ! मन ही मन सोच रहा था – खूबसूरती तो बस महसूस करने की चीज़ है …शब्दों में बयाँ बेईमानी है …पर अगर बयां नहीं हो फिर भी दिक्कत है …वो मेरी आँखों में ही खुद क्यों नहीं अपने पसंद के शब्द चुन लेती है …मेरे शब्द पुष्प बन चुके हैं …कौन सा पुष्प उसे अर्पित करूँ …मेरे वश का नहीं …यही कुछ सोचते सोचते उसने चाय के मग को …प्रकृति की तरफ बढ़ा दिया …इस आशा के साथ की …प्रकृति अपनी खूबसूरती प्रेम की आँखों में देख सके …
प्रकृति ने अपने अंदाज़ में …चाय के मग को दोनों हाथों से पकड़ बोला – सच्चे आशिक हो ..मेरी पसंद की चाय तक बनाना सिख लिए …
प्रेम मुस्कुरा दिया …प्रकृति हंस दी …फिर बड़े आराम से प्रकृति ने पूछा – तुमने चिकेन फ़्राईड राईस ही क्यों मंगवाया ? प्रेम बेहद सहज अंदाज में बोल गया – मेनू में सबसे सस्ता वही था …और हंस दिया ! दोनों फिर हंस दिए ! दोनों हंसते बहुत है  …शायद यही है  उनका प्यार ….:))

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प्रेम ने प्रकृति को उस कमरे में रखे ख़ुद के सामने के सोफे पर बैठने को कहा ! प्रकृति बोली – अरे , बालों को तो सुलझा लेने दो ! प्रेम बोला – रहने दो , ऐसी ही बेहद खुबसूरत दिख रही हो ! प्रकृति मुस्कुरा दी ! प्रेम बोला – मुझे बहुत कहना है ! प्रकृति बोली – इतनी तो बातें करते हैं , फिर भी क्या बाकी रहता है , कहने को ? प्रेम बोला – बहुत कुछ 🙂 प्रेम बोला – मुझे भी दर्द होता है , तुम्हारी बातों ! प्रकृति बोली – मैंने ऐसा क्या कहा जिससे तुम्हे दर्द होता है ! प्रकृति हलके मजाक अंदाज़ में थी ! प्रेम बोला – मजाक मत करो , मुझे जो कुछ कहना हो , कह लो , जितना गाली देना है , दे लो लेकिन मेरे अन्दर तुम्हारे लिए जो भावना है , उसपर कभी सवाल मत उठाना ! प्रकृति बोली – सच बोलूं ? प्रेमा बोला – बोलो ! प्रकृति बोली – अगर सवाल ही होता तो शायद मै इस जगह इस वक़्त तुम्हारे साथ नहीं होती !
प्रेम बोला – तुम मुझसे बहुत ज्यादा प्योर हो , कहो तो मै सामने के एफिल टावर से ऊँची आवाज़ से कह दूँ , लेकिन हमेशा याद रखना की मै एक पुरुष हूँ , तुम्हारी तरह प्योर बना तो ख़त्म हो जाऊंगा ! प्रकृति मुस्कुरा दी और बोली – लेकिन तुमने खुद में जान लगा दी , मेरे ह्रदय को पता है , मेरी जुबान पर मत जाओ ! प्रेम बोला – तुम भी मेरी जुबान पर मत जाओ ! प्रकृति बोली – पास आओ , किस करना है 🙂 प्रेम बोला – तुम पास आओ ! प्रकृति बोली – फिर रहने दो , वहीँ सामने बैठे रहो ! प्रेम हंस दिया – ओखल में जैसे अदरक को कुंचते हैं , ठीक वैसे ही तुम मेरे अहंकार को कुंच देती हो ! प्रकृति जोर जोर से हंसने लगी ! प्रेम सामने था – प्रकृति ने उसे बेहतरीन किस किया ! प्रेम बोला – तुम्हे किस करने में हिचकिचाहट नहीं होती ? प्रकृति बोली – तुम्हारे होठ इतने खुबसूरत है , खुद को रोक पाना मुश्किल है ! प्रेम को मजाक सुझा और बोला – क्या मेरे होठों को देख अन्य महिलाओं को भी ऐसा ही लगता होगा ? प्रकृति बोली – जाओ , सड़क पर खड़ा होकर पूछ लो !
प्रेम बोला – तुम्हे हमारी पहली मुलाकात याद है ? प्रकृति बोली – नहीं 🙂 पर ये बताओ तुम्हे कभी मुझसे उब नहीं हुई ? प्रेम बोला – प्रेम समर्पण खोजता है – आत्मा और शरीर का , वह समर्पण मैंने देखा था उस मुलाकात में – अन्दर से बाहर तक का समर्पण ! प्रकृति बोली – शायद , तुम उस मुलाकात में तुम चारों तरफ से मुझे परास्त कर दिए थे , उस कॉफ़ी शॉप पर , तुम्हारे हाथ में सिगरेट और होठों पर कॉफ़ी – मै एकटक तुमको निहार रही थी ! प्रेम बोला – और तुम्हारा वह समर्पण मुझे हमेशा के लिए परास्त कर दिया :))प्रेम बोला – सबसे मुश्किल है समर्पित अहंकार को फिर से जगाना । प्रकृति बोली – इसकी क्या ज़रूरत है , चुपचाप यहीं रहो – समर्पित :)) प्रेम बोला – पुरुष  अहंकार जिसे तुम महिलाएँ मेल ईगो कहती हो , अजीब होता है , शायद तीन जगह ही झुकता है । प्रकृति बोली – कहाँ – कहाँ ? प्रेम बोला – माँ के सामने , बेटी के सामने और तीसरी महिला जिससे वो बेपनाह मुहब्बत करता है , पर तीसरी जगह सबसे ज़्यादा ख़तरा रहता है । प्रकृति बोली – तुम ठीक हो ..न । प्रेम बोला – हां , मैं बिलकुल ठीक हूँ पर यह सवाल क्यों ? प्रकृति बोली – अजीब अजीब सी बातें कर रहे हो । प्रेम बोला – मन में यही सब चलता रहता है , कभी किसी स्त्री से इतना नज़दीक नहीं हुआ । प्रकृति बोली – मुझे भी देखना था , एक पुरुष कैसे डूब कर प्रेम करता है । प्रेम बोला – ओह , तुम बस देखने के लिए ही मुझे इतना डूबा दी । प्रकृति बोली – ओह माई गॉड , तुम हर बात पकड़ते हो , बहुत निगेटिव इंसान हो । प्रेम बोला – मेरे बारे में चार साल बाद पता चला ? प्रकृति – ओह नो , फिर तुम बात पकड़ लिए । प्रेम बोला – चलो कोई बात नहीं , हम एक दूसरे की बात नहीं पकड़ेंगे । प्रकृति बोली – नहीं नहीं , तुम मेरी बात को माईँड नहीं करोगे लेकिन तुमको कोई भी इजाज़त नहीं । प्रेम हंस दिया – जो हुक्म मेरे आका , बेवफ़ाई करो तो रो रो के जान दे देते हैं , वफ़ा करो तो रुला रुला कर जान ले लेते हैं – शायद इसी को मुहब्बत कहते हैं …:)) प्रकृति मुस्कुरा दी । प्रेम सिगरेट और लाइटर के साथ बाल्कोनी में था – एफ़िल टावर को नीचे से ऊपर और ऊपर देखने लगा । शांत था । प्रकृति बेचैन हो गयी – वो प्रेम को देखने लगी ।
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प्रेम बालकोनी में खड़ा सिगरेट के धुएं के छल्ले बना रहा था ! प्रकृति वहीँ पास थी – शांत थी ! प्रकृति ने पूछा – तुम्हे मुझसे क्या मिला ? प्रेम थोडा हैरान हुआ फिर बोला – धैर्य , मैंने धैर्य रखना सिखा ! प्रकृति बोली – और ? प्रेम बोला – प्रेम एक कल्पना होती है , उसे हकीकत में जिया ! प्रकृति बोली – और ? प्रेम बोला – सबसे बड़ी बात , एक औरत का मन देखा ! प्रकृति बोली – उस मन में क्या देखा ? प्रेम बोला – सच बोलूं ? प्रकृति बोली – ओफ़्कौर्से ! प्रेम मुस्कुरा दिया और बोला – उस मन में एक संदूक देखा ! प्रकृति बोली – फिर ? प्रेम बोला – उस संदूक में एक ताला था ! प्रकृति बोली – बोलते जाओ ! प्रेम बोला – उस ताले को पल भर में खोल दिया , लेकिन उस संदूक में सबकुछ था ! प्रकृति बोली – सबकुछ मतलब ? प्रेम जोर से हंसने लगा ! प्रकृति बोली – हंसो मत , मै अभी सीरियस हूँ ! प्रेम बोला – उस संदूक में ढेर सारे सांप बिच्छू थे – और उनके बीच एक मोती था ! प्रकृति बोली – तुम्हे सांप बिच्छू ने काटा नहीं ? प्रेम बोला – बहुत काटा ..बहुत ..कभी मेरे संदूक को खोलोगी तब पता चलेगा ! प्रकृति बोली – मुझे तुम्हारा संदूक नहीं खोलना , फिलहाल तुम मेरे संदूक के बारे में बोलो ! प्रेम बोला – जिद थी , इस बार किसी सांप बिच्छु से नहीं डरना है ! प्रकृति बोली – फिर ? प्रेम बोला – क्या फिर ? अब तुम सामने हो 🙂
प्रकृति बोली – हिम्मत वाले हो ! प्रेम बोला – प्रेम ने हिम्मत दे दिया !
प्रेम बोला – प्रेम की कल्पना कितनी आसान होती है और प्रेम करना कितना मुश्किल होता है ! प्रकृति मुस्कुरा दी ! प्रेम बोला – तुम्हे मुझसे क्या मिला ? प्रकृति हंस दी ! प्रेम बोला – जो भी है सच बोलो ! प्रकृति हंस दी और बालकोनी से कमरे की तरफ मुड़ते हुए बोली – मुझे कुछ नहीं मिला 🙂 प्रेम बोला – यह जबाब मेरी आशा के अनुरूप था ! प्रकृति कमरे के सोफे पर बैठ जोर जोर से हंसने लगी ! प्रेम चुप था ! प्रकृति बोली – बाबु के मेल इगो को ठेस पहुंची क्या ? प्रेम बोली – अब इगो बचा ही कहाँ है जो ठेस पहुंचेगी ! प्रकृति और जोर से हंसने लगी – पास आओ तुम्हारा इगो जिन्दा कर देती हूँ ! प्रेम बोला – कैसे ? प्रकृति बोली – पहले पास तो आओ ! प्रेम प्रकृति के पास चला गया ! प्रकृति बोली – तुमने सब कुछ पवित्र दिया , सकरात्मक या नकरात्मक ! प्रेम बोला – मतलब ! प्रकृति बोली – तुम्हारे प्रेम ने ताकत दी है , मेरा ये हँसता हुआ चेहरा दिया है , मुझे चहकने को खुला आसमां दिया है ! प्रेम बोला – तो क्या इस बात को लॉक कर दिया जाए ? प्रकृति – हाँ बाबु …लॉक कर दो और अपने मन के समुन्दर में फेंक दो ! प्रेम बोला – मन का समुन्दर तो स्त्री के पास होता है , हम पुरुष तो सूखे तालाब की तरह होते हैं , जिसमे तुम जैसी रूपवती स्त्री अपने बारिश से उसको लबालब भर देती हो ! प्रकृति बोली – समुन्दर में मिल जाओ ! प्रेम बोला – दुबारा ? फिर दोनों जोर से हंसने लगे !
प्रेम बोला – तुम बेहद खुबसूरत हो ! प्रकृति बोली – तुम्हारे आँखों में मुहब्बत का चश्मा लगा है इसलिए मेरी खूबसूरती दिख रही है , जिस दिन यह चश्मा उतर जाएगा , तुम्हारे शब्द गायब हो जायेंगे ! प्रेम थोडा उदास हो गया और बोला – प्लीज़ , ऐसा मत बोलो , क्या मेरे लिए जब तुम्हारा आकर्षण ख़त्म हो जाएगा – क्या उस दिन मै गलत इंसान हो जाऊंगा ! प्रकृति बोली – शायद कभी नहीं , तुम मेरी जिंदगी में रहो या नहीं रहो लेकिन तुम मेरे लिए हमेशा एक बेहद खुबसूरत दिल के राजकुमार ही रहोगे – जो मुझसे खूब डरता है और जिससे मै बिलकुल नहीं डरती ! प्रकृति फिर जोर से हंसने लगी ! प्रेम बोला – डरना गुनाह है , क्या ? प्रकृति बोली – यह एक प्रेमिका के सर पर प्रेमी द्वारा पहनाया हुआ ताज है ! प्रेम बोला – डर वो भी ताज के रूप में – वाह रे फिलोसोफी , तुम इतनी बड़ी कब हो गयी ? प्रकृति बोली – मतलब ? प्रेम बोला – कुछ नहीं !
घडी में पांच बजने वाले थे ! प्रकृति अपने मेकअप के सामान के साथ और बोली – कल रात फिर तुमने मेरी बैग में कुछ खोजा है – सारा सामान अस्त व्यस्त है – तुम्हारी जासूसी की आदत गयी नहीं ! प्रेम बोला – अजीब इंसान हो , जिसके शरीर में कितने तिल हैं वो बता सकता हूँ लेकिन उसका बैग नहीं टटोल सकता ! प्रकृति बोली – गलत आदत ! प्रेम बोला – हद हाल है , बाई द वे – बैग में मुझे मिलेगा क्या ? प्रकृति बोली – जैसे चुपके से मेरे मन को टटोलते हो वैसे सब कुछ देखने की आदत है ! प्रेम बोला – हाँ , वही सांप बिच्छु वाला मन पर मोती मेरे पास है ! प्रकृति ने बिछावन पर पड़े तकिये को उठा प्रेम पर चला दिया ! प्रेम जोर जोर से हंसने लगा फिर बोला – कल रात जब मै सो गया गया था तो मेरे मोबाईल में क्या खोज रही थी ? प्रकृति बोली – मैंने तुम्हारा मोबाइल टच भी नहीं किया – वो बस फ़ालतू का अलार्म बजने लगा तो मैंने अलार्म बंद कर दिया – मै तुम्हारी तरह घटिया , चिप और देहाती नहीं हूँ , दूसरों का बैग टटोलने वाला ! प्रेम हंसने लगा – घटिया , चिप और देहाती …कुछ नए एडजेक्टीव जुड़ने चाहिए , वैसे अंग्रेजी भी चलेगा , वैसे मुझे गाली बढ़िया लगती है ! प्रकृति बोली – तुम्हे क्या नहीं पसंद ? प्रेम सीरियस हो गया ! प्रकृति अपने आँखों में आईलाइनर लगाने लगी ! प्रेम उसके पीछे खड़ा हो गया – जोर से पकड़ लिया और धीरे से बोला – मुझे इग्नोर होना नहीं पसंद !
प्रकृति की आँखें भर गयी …आईलाइनर के संग भरी आँखें …धीरे से बोली …तुमने मुझे कभी इग्नोर नहीं किया है …हमेशा स्पेशल बना के रखे …सारी ताकत वहीँ से मिली …यही सुनना चाहते थे ..न ! दोनों बिल्कुल एक दुसरे से चिपके हुए थे …इस बार जिस्म के बगैर …दोनों की रूहें चहचहा रही थी …बालकोनी से एफिल टावर कमरे के अन्दर तक झाँक रहा था …

……………………

सुनो …मुझके झुमके बेहद पसंद है – प्रेम थोडा जोर से बोला – मैंने तुम्हारे बैग में देखा है ! प्रकृति बोली – तो ..? ‘आज शाम तुम फिरोजी रंग वाली साड़ी और झुमके में डिनर के लिए चलोगी’ – प्रेम अपने बैग से सूट को निकालते हुए बोला ! ‘बहुत डिमांडिंग हो…तुम्हारा वश चले तो ….’ – प्रकृति बोली !
प्रेम बोला – हाँ ..मेरा वश चले तो ..तुम्हे एक बेहतरीन महल में क़ैद कर के रखूं …जहाँ एक परिंदा भी नहीं पहुंचे …और तुम्हारा वश चले तो ? ‘ प्रकृति बोली – प्रेम , खूबसूरती , नजाकत , निगाहें , अपनी अदा ..सबसे बाँध और ढेर सारी बंदिशों में रख …खुद आज़ाद हो जाऊं ! प्रेम बोला – बेहद ज़ालिम हो ! प्रकृति बोली – ऐसी ही हूँ , अब क्या करोगे ? कोई उपाय नहीं है तुम्हारे पास ! प्रेम बोला – मेरे अहंकार को चुनौती मत दो ! प्रकृति बोली – ओह …वही अहंकार जो मेरे मेरे इशारे पर नाचता है ? प्रेम बोला – वो मेरा इश्क तेरे इशारे पर नाचता है …मेरा अहंकार तो तुम्हारे कदमों में हमेशा के लिए समर्पित है 🙂 प्रकृति बोली – प्रकृति खुश हुई …वत्स ..बोलो ..क्या मांगते हो ? प्रेम बोला – “तुम” ! प्रकृति बोली – अजीब मर्द हो ..अब भी विश्वास नहीं की मै तुम्हारी हूँ ? प्रेम बोला – वो मर्द ही क्या जो औरत की जुबान पर भरोसा करे ! प्रकृति बोली – पास आओ …तुम्हारे विशाल मस्तक को चूम लूँ ! प्रेम बोला – प्रेम में डूबा पुरुष एक ही स्त्री से प्रेम के सारे रस पाना चाहता है …जब तुम मेरे फोरहेड को चूमती हो ..ऐसा लगता है जैसे तुम पूरी दुनिया की बुरी नज़र से बचा रही हो ! प्रकृति बोली – हाँ , जब तुम पास होते हो …गजब की सुरक्षा लेकर आते हो …बेफिक्र वाली …ऐसी चीज़ें बहुत कम पुरुष कर पाते हैं …!
प्रेम बोला – ठीक है , हर पुरुष से एक सी अपेक्षा रखना …महिलाओं की मुर्खता है …और यही ट्रैप है ! प्रकृति बोली – वार्डरोब से मेरा सैंडिल निकाल कर लाओ ! प्रेम हंसने लगा और बोला – एक पल में सारा घमंड और फिलोसोफी ख़त्म हो जाता है , जब तुम कुछ ऑर्डर के लहजे में बोलती हो ! दोनों जोर से हंसने लगे ! प्रेम बोला – पता है …सबसे अच्छा क्या लगता है ? प्रकृति बोली – क्या ? प्रेम बोला – जब तुम मुझे बिलकुल ही भाव नहीं देती हो , अपनापन लगता है लेकिन कभी कभी अचानक से तुम्हारे सारे भाव खुद के लिए चाहने लगता हूँ ! प्रकृति बोली – ह्म्म्म….इश्क का बुखार ज्यादा चढ़ गया है …इलाज़ करवाओ ! प्रेम बोला – कहाँ ? फिर दोनों हंसने लगे !

प्रेम ने पूछा – होटल लौट कर एअरपोर्ट जायेंगे या वहीँ डिनर से सीधे निकल जायेंगे ? प्रकृति बोली – वहीँ से सीधे निकल जायेंगे ! थोडा मूड भी ठीक रहेगा और शहर में टैक्सी से घुमने में मजा भी आएगा ! प्रेम बोला – ठीक है , मै होटल से चेकआउट कर लेता हूँ !

दोनों शाम की डिनर के लिए सजने लगे ! फिरोजी रंग की साड़ी में प्रकृति बेहद खुबसूरत दिख रही थी ! प्रेम ने भी ग्रे कलर का सूट पहन रखा था ! टैक्सी होटल के बाहर इंतज़ार कर रही थी ! दोनों कमरे से बाहर निकल लिफ्ट में आ चुके थे – लिफ्ट में लगे आईने में एक दूसरे को देख रहे थे ! प्रकृति बोली – तुम्हे दुनिया के किसी भी कोने में ले जाया जाए – वहीँ फिट बैठेगो ! प्रेम बोला – मतलब ? प्रकृति बोली – कुछ नहीं ! प्रेम बोला – अब मै भी तुम्हारी बातों को समझने का प्रयास नहीं करता ! प्रकृति बोली – वो तो मै तुम्हारे साथ पहले दिन से ही कर रही हूँ ! फिर दोनों हंसने लगे !

टैक्सी में थे ! दोनों के हाथ और उँगलियाँ एक दुसरे से उलझी और जकड़ी हुई थी ! प्रेम बोला – पेरिस से मन भर गया ! प्रकृति बोली – इतनी जल्दी ? प्रेम बोला – लेकिन तुम्हारे साथ से आज तक मन नहीं भरा …तुम्हे मुझसे मिल / बात कर पहला एहसास क्या हुआ था ? प्रकृति बोली – जैसे कोई बचपन का दोस्त …एक ही थाली में खाने वाला …एक सुबह से शाम पल पल साथ रहने वाला …शायद वहीँ इस मुहब्बत की जड़ें मजबूत हुई होंगी ! प्रेम बोला – वो देखो …एक बाईक पर खुबसूरत जोड़ा ! प्रकृति बोली – जोड़े बहुत देखते हो …! प्रेम बोला …हाँ …इंसान जिस भाव में होता है …उन्ही चीज़ों पर ज्यादा गौर फरमाता है …वैसे तुम्हारा कत्थक का नया शो कब होने वाला है ? प्रकृति बोली – तुम्हे याद नहीं ..कई बार तो बताया ! प्रेम बोला – सच में भूल गया ..एक बार और बता दो ! प्रकृति बोली – तुम आओगे ..न ! प्रेम बोला – हर बार आता हूँ …बिलकुल पीछे वाले सीट पर बैठ …तुमको मंत्रमुग्ध होकर नृत्य करते देखता हूँ …खो जाता हूँ …मै भी ज्वाइन कर लूँ …तुम्हारे गुरु जी का क्लास ? प्रकृति बोली – रहने दो …कथक कम सीखोगे …मुझे डिस्टर्ब ज्यादा करोगे …जितनी दूर हो …उतना ही बढ़िया !

पेरिस की खुबसूरत नदी …सेन का किनारा ! टैक्सी वाले ने गेट खोला …दोनों किस भारतीय राजपरिवार के युवा दम्पति की मुद्रा में उतरे ! प्रेम ने पचास यूरो टिप्स में टैक्सी वाले को दिया और प्रकृति को एक किस किया ! प्रकृति बोली – तुमने उसे पचास यूरो दे डाला ? प्रेम बोला – हाँ , उसने जितनी बढ़िया ढंग से टैक्सी चलाई और जिस अंदाज़ से गेट खोल हमें उतरने को बोला …उस एहसास की एक कीमत होती है …!
प्रकृति बड़े गर्व भरे अंदाज़ से प्रेम को निहारने लगी और बोली – तुम सचमुच में प्रिंस हो …ईश्वर से कामना करुँगी की तुम्हे ढेर सारे पैसों हों ! प्रेम मुस्कुरा दिया और बोला – आगे की ओर बढ़ें …
इस बार किस की बारी …प्रकृति की थी …दोनों उन्मुक्त थे ….पेरिस की गगन में …हंसो का जोड़ा …!
…………..
दोनों क्रूज़ पर आ गए थे ! डेक पर एक टेबल और दो चेयर उनके लिए रिजर्व था ! दो घंटों का सफ़र और डिनर ! सांझ ढलने को बेताब थी – पानी को छूती ठंडी हवा दोनों को छू रही थी ! प्रेम बोला – ये शाल बेहद खुबसूरत है ! प्रकृति बोली – ये मेरी नानी की है , तुम्हे पता है – वो अत्यंत खुबसूरत थीं ! प्रेम बोला – तुमसे भी ज्यादा ? प्रकृति बोली – हाँ , कभी उनकी तस्वीर दिखाउंगी ! प्रेम बोला – और ये नाक पर हर वक़्त तैनात गुस्सा ? प्रकृति मुस्कुराते हुए बोली – मेरी दादी का वरदान ! प्रेम बोला – तब तो मै तुम्हारी दादी की तस्वीर देखना ज्यादा पसंद करूँगा ! प्रकृति हंसाने लगी और बोली – मै इन्डियन खाऊँगी ! प्रेम बोला – यहाँ कढी चावल नहीं मिलता है ! दोनों हंसने लगे !
प्रेम बोला – यहाँ आने के पहले बहुत सारी बातें सोच रखा था , ये बोलूँगा , वो बोलूँगा , सब भूल गया ! प्रकृति बोली – इतना सब कुछ तो सुना दिए , अब क्या रह गया था बोलने को ! प्रेम बोला – बहुत कुछ ! प्रकृति बोली – अब इस क्रूज़ का मजा लेने दो !
वाईन आ चूका था ! दोनों ने टोस्ट किया ! क्रूज़ पर बेहतरीन धुन बज रहा था – कोई फ़्रांसिसी ! डेक से दूर एक डांस फ्लोर था ! प्रकृति की नज़र उसी डांस फ्लोर पर थी ! प्रेम समझ गया – चले , क्या ? प्रकृति बोली – चलो ..न ! दोनों उठ खड़ा हुए ! क्रूज़ पर बैठे – अन्य लोग ताली बजाने लगे ! प्रेम ने एक बटलर को इशारा किया – अब डांस फ्लोर में म्यूजिक सिस्टम से हिंदी सिनेमा वक्त के गीत का धुन – आगे भी जाने न ..तू – बजने लगा ! प्रेम ने अपने हाथों में प्रकृति का हाथ ले कर बेहद हल्का वेस्टर्न डांस शुरू किया ! प्रकृति ने प्रेम के कानो में कहा – तुम्हे इतना बढ़िया डांस भी आता है , कभी बताया भी नहीं ! प्रेम बोला – सब कुछ बोला और बताया भी नहीं जाता – वक़्त मिले तो कर के दिखाया भी जाता है ! प्रकृति मुस्कुरा दी ! बैरे को इशारा की – बैरे ने उसक वाइन ग्लास उसके हाथ में बढ़ा दिया – एक घूँट में वो सारा वाईन ख़त्म कर दी !
दोनों उस गीत के धुन पर थिरकने लगे ! प्रकृति का पाँव लडखडाता तो वो प्रेम की बाहों में झूल जाती ! अब कुछ और भी जोड़े आ चुके थे ! अब दूसरे गीत हम्मा… बजने लगा ! कुछ और जोड़े उस डांस फ्लोर पर आ चुके थे ! प्रकृति अब थोडा थकने लगी थी – वो टेबल की ओर निकल पड़ी और बैठ गयी ! एक इटालियन लड़की आई और प्रेम के संग डांस करने लगी – प्रेम प्रकृति की तरफ देखने लगा – प्रकृति नदी की तरफ – क्रूज़ की रफ़्तार तेज़ हो गयी – प्रकृति को यह संगीत शोर सा लगने लगा !
प्रेम समझ गया – वापस टेबल पर आ गया ! प्रकृति अभी भी सेन नदी को देख रही थी ! प्रेम ने बोला – हेलो ! प्रकृति ने बोला – देखो …यहाँ से पेरिस कितना खुबसूरत दिख रहा है ! प्रेम बोला – तुमसे कम ! प्रकृति चुप रही – वह लगातार नदी की तरफ मुह कर के देख रही थी ! प्रेम ने उसका हाथ माँगा ! प्रकृति ने कुछ जबाब नहीं दिया ! प्रेम बोला – बुरा लगा ? प्रकृति बोली – नहीं , कुछ बुरा नहीं लगा ! प्रेम बोला – झूठ मत बोलो ! प्रकृति चुप रही ! प्रेम बोला – बस ..इतना में इतना गुस्सा , तुमने कभी सोचा है …मै कितना बर्दाश्त करता हूँ ! 
प्रकृति ने अपना हाथ बढ़ा दिया – प्रेम ने उसकी उनग्लिओं को जोर से पकड़ लिया ! डिनर आ चूका था ! दोनों को पता नहीं था – ये क्या डिनर है ? कुछ है – कह कर दोनों खाना शुरू कर दिए ! क्रूज़ अब तेज हो चूका था !

दो घंटे का सफ़र ख़त्म हो चूका था ! दोनों क्रूज़ से बाहर आ चुके थे – टैक्सीवाला ने उनको अभिवादन किया ! प्रेम मुस्कुराया ! अब दोनों टैक्सी पर सवार एअरपोर्ट की तरफ निकल चले थे ! प्रेम ने प्रकृति का हाथ पकड़ा ! उसे उसका हाथ पकड़ना बहुत अच्छा लगता था ! सड़क पर बेहतरीन गाडीयां ! सन्डे की रात ! प्रकृति ने पूछा – हर बार तुम्हारा फ्लाइट मेरे  बाद ही क्यों होता है ? प्रेम बोला – मै ऐसे ही टिकट कटाता हूँ ! प्रेम ने प्रकृति की हाथों को जोर से पकड़ लिया ! फिर दुसरे हाथ से एक अपने कोट के पौकेट से एक अंगूठी निकाला और चुपके से प्रकृति की उंगली में पहना दिया ! प्रकृति अवाक रह गयी ! प्रेम दूसरी तरफ देखने लगा और बोला – किसी भी प्रेम का सिर्फ और सिर्फ एक ही गवाह होना चाहिए – ईश्वर और मै उसी ईश्वर को गवाह मान तुमको हमेशा के लिए अपनाता हूँ ! प्रकृति चुप रह गयी ! बिलकुल चुप थी ! 
एअरपोर्ट आ चूका था ! टैक्सी का बिल और टैक्सीवाले को टिप्स देकर प्रेम आगे बढ़ा ! उसने प्रकृति को जोर से अपने बाहों में जकड़ा और बोला – जाओ …! प्रकृति अन्दर की तरफ निकल पड़ी ! कुछ दूर चल फिर लौटी ! प्रेम को पकड़ कर एक किस की और बोली – मै तुम्हे बहुत तंग करती हूँ …न …मेरी किसी बात का बुरा मत मानना और  मुझे कभी छोड़ना मत …वादा करो ! प्रेम चुप रहा ! प्रकृति उससे लिपटी रही ! प्रेम बोला – बगैर वादा कोई इतना लम्बा सफ़र नहीं तय करता है और मुझे तुमसे क्या वादा करना – वादा तो खुद से किया हूँ ….लेकिन अगर तुमने साथ छोड़ दिया तो ….
प्रकृति मुड गयी …धीरे धीरे एक रानी की चाल में ….प्रेम उसे देख रहा था …उसके पास उसका दिया कुछ नहीं था …सिवाय प्रकृति की खुशबू के ….प्रकृति ने दूर से अपना हाथ हिलाया ….अंगूठी चमक रही थी ….प्रकृति प्रेम की नज़रों से ओझल हो रही थी ….
“हर मुलाक़ात का अंजाम जुदाई क्यों है …
अब तो हर वक़्त यही बात सताती है ..हमें ” ………

~ प्रेम और प्रकृति , 15 जनवरी 2016

कुछ यूं ही … कोरोना के बहाने

एक अच्छे कॉलेज में पढ़ाने का फल यह हुआ कि में बहुत ही कम उम्र में अपने विषय का हेड एग्जामिनर बन गया । पूरे यूपी के सभी इंजीनियरिंग कॉलेज के उक्त विषय कि कॉपियां मुझे मिली और कई साल यह काम करने का मौका मिला । जहां कहीं भी सेंटर होता था – वहां का एक बड़ा कमरा और उस कमरे में करीब 40-50 परीक्षक । सामने एक ऊंचे डायस पर मै बैठा । युनिवर्सिटी नियमो के अनुसार मुझे बतौर हेड एग्जामिनर करीब 10 % कॉपियां फिर से जांचनी होती थी । हरे रंग की स्याही वाली कलम मिलती थी :))
बाकी के मेरे कलीग परीक्षकों को मेरा स्पष्ट निर्देश होता था – कोई भी फेल नहीं करेगा – किसी भी सूरत में । बाकी का मै संभाल लूंगा । चौहान साहब वाइस चांसलर होते थे और उन्हें यह लगता था कि हमारे कॉलेज जैसा कोई नहीं और यहां के शिक्षक जैसा कोई नहीं । वो इतने सख्त इंसान थे कि एक बार हमारे कलीग अमित तिवारी ने उनकी बेटी को ही आंतरिक परीक्षा में सबसे कम नम्बर दिया और बतौर वाइस चांसलर चौहान साहब कुछ नहीं बोले । कुछ नहीं ।
खैर , मेरे रहते कोई विद्यार्थी फेल कर जाए – यह असम्भव था । कारण खुद की साइकोलॉजी थी – जब मै पढ़ता था तो मेरे शिक्षकों का पहला उद्देश्य मुझे ही फेल करना होता था , यह पीड़ा मेरे मन में थी । पोस्ट ग्रेजुएशन में संभवतः मेरे अन्य सेमेस्टर में सबसे बढ़िया नम्बर थे तो थीसिस में सबसे कम नम्बर देकर , मेरे पूरे सीजीपीए को कम किया गया । मै इस घाव में था सो मैंने अपने जीवन में निर्णय लिया की कोई नहीं फेल होगा ।
कारण एक और है – आपके लिए 40,000 विद्यार्थी के कॉपी है । 2 या 4 प्रतिशत को फेल कर देना आपके लिए एक आंकड़ा है लेकिन उस विद्यार्थी के लिए वह विषय सिर्फ और सिर्फ एक ही बार आएगा । कम नम्बर देना उसके लिए आजीवन एक घाव बन सकता है – कारण और भी थे , तब जब इंडस्ट्री मान कर चलती है कि इंजीनियरिंग कॉलेज की पढ़ाई बकवास है और वो विद्यार्थियों के आइक्यू के आधार पर भरती करती है और ना की विषय की जानकारी पर ।
काफी शुरुआत में ही , एक और घटना घटी । तब हम नए नए थे और सामान्य परीक्षक थे । वर्तमान एसएसपी फ़िरोज़ाबाद सचिंद्र के बैच के एक विषय को मेरे कलीग कॉपी जांच रहे थे और कॉपियां कोडिंग की थी , वो मेरे सामने बैठे थे और मूड कर उन्होंने कहा – रंजन सर , लगता है यह अपने विद्यार्थियों की कॉपी है और यह कॉपी उस क्लास के टॉपर की प्रतीत हो रही । हम खुश हो गए और अपने कलीग को बोले – हुमच के पूरे बंडल में नंबर झाड़ दो और टॉपर को 98 दे दो । ऐसा कह कर मै अपने बंडल में लग गया । उन्होंने उस टॉपर को मात्र 72 नम्बर दिए । विद्यार्थी डिग्री लिए और अपनी अपनी नौकरी में चले गए ।
वो टॉपर लड़की अपनी पहले ही प्रोजेक्ट में लंदन गई । मै उसके ग्रुप का गाइड भी था सो एक स्नेह था , नौकरी और लंदन से उसने एक ईमेल भेजा – सर , सिर्फ दो नंबर से मेरा युनिवर्सिटी रैंक छूट गया , अगर दो नंबर ज्यादा होते तो मै अपने ब्रांच में युनिवर्सिटी टॉप 10 होती और बीस तीस नम्बर ज्यादा होते तो शायद पूरे युनिवर्सिटी में प्रथम । उस ईमेल को पढ़ , मै एक गहरे अवसाद में था । काश , मै अपने कलीग के माथा पर सवार हो कर , उस पूरे बंडल में नम्बर की झड़ी लगवा देता । उसने अपने ईमेल में एक और बात लिखी थी – नौकरी और लंदन तो आते जाते रहेगा लेकिन युनिवर्सिटी रैंक होल्डर तो आजीवन साथ रहता । उसे आज तक नहीं पता की उसके पूरे क्लास की कॉपी हम सभी के आंखों से गुजरी थी । काश ….। शायद इस घटना ने मुझे एक बेहतरीन हेड एग्जामिनर बनाया । मानवता के साथ ।
एक विद्यार्थी सिविल सर्वेंट है । अपनी गाथा कहने लगे – यूपीएससी में दो बार असफल इंटरव्यू के बाद , तीसरे प्रयास में उनके बोर्ड में एक यूपी वाले मिल गए और वो इनके पक्ष में , पूरे बोर्ड को हाईजैक कर लिए और मेरा एक विद्यार्थी आज सीनियर प्रशासक है ।
कहने का मतलब – 130 करोड़ की जनता में 2 या 4 हज़ार मौत किसी प्रमुख के लिए आंकड़ा हो सकता है लेकिन उसके परिवार के लिए और उसके लिए सिर्फ और सिर्फ एक मौत जो फिर कभी जीवन बन के वापस नहीं लौटेगा ।
बचा लीजिए ….जीवन को । भगा दीजिए ….मौत को – जो दरवाजे खड़ी है , खटखटा रही है ।
~ रंजन / दालान / 28 मार्च , 2020

यादें – 07

Yadein ~ 07

बात 14 अगस्त 2006 की है । 2005 में डबल प्रोमोशन के साथ सहायक प्राध्यापक बन चुके थे , घर बुक हो गया था और चमचमाती नई कार दरवाजे खड़ी थी । पैसों को लेकर थोड़ी तंगी थी । सो छुट्टियों के दिन किसी अन्य विश्वविद्यालय में एक्स्ट्रा क्लास लेने लगा था । इसी वक्त मित्र डॉ आर एस राय जो उस वक़्त एमिटी जयपुर के कर्ता धर्ता थे , ने मुझे गेस्ट लेक्चर के बुलाया । आने जाने ठहरने के अलावा 5 – 10 हज़ार की कमाई को सोच मैं एक दिन के लिए जयपुर निकल गया ।
14 अगस्त 2006 को संध्या पंडारा रोड़ , नई दिल्ली से वॉल्वो बस । मैं समय के साथ वहां मौजूद था । दोपहर का बढ़िया भोजन कर्नाटक भवन में अतुल सर करवा दिए – तब वो इंग्लैंड से लौट रेजिडेंट कमिश्नर बने थे । शायद अपनी गाड़ी से वो पंडारा रोड़ भी पंहुचवा दिए थे ।
वॉल्वो बस के आगे सवारी जुट गए । मरद जात – कुकुर । नज़र पड़ गयी – एक अत्यंत तीखी नैन नक्श वाले , ग्रीन कलर के कैपरी में , सांवले रंग की , उम्र में 5-6 साल छोटी दिखने वाली हसीना पर । मैंने आंखें बंद की और ईश्वर को पुकारा – हे ईश्वर , अगर तुम सचमुच में हो तो इन मोहतरमा का सीट मेरे बगल में हो । उस वक़्त मैंने ईश्वर को जोर से पुकारा – एक ऐसी पुकार जो मैंने कभी किसी परीक्षा में भी नही की थी । बस में घुसा । तब और गोरा चिट्टा , गंभीर और बेहतरीन गोल्डन रंग के चश्मे के साथ । खिड़की वाली सीट पर बैठा ही कि – वो आ गयी – क्या आप अपनी खिड़की सीट मुझे दे सकते है ? मैं एकदम से भक्क़ । मैं उनके चेहरे को देख रहा था लेकिन मन मे उन सारों नास्तिकों के लिए गाली निकल रहा था जो ईश्वर की मौजूदगी पर सवाल उठाते आये हैं । चंद सेकेंड में सीट की अदला बदली हो गयी । सीट के अदला बदली के बीच मैंने करीब 1008 बार ईश्वर को थैंक्स कहा ।
वॉल्वो स्टार्ट हुई । मैं ऐसे सफर में रीडर्स डाइजेस्ट रखता हूँ – भले ही उसकी अंग्रेज़ी टो टा के पढ़नी पड़े 😐 मैडम सोडूकु के एक इलेक्ट्रॉनिक गेम पैड पर व्यस्त । कुछ दूर के बाद वो बेवजह ही एक स्माईल । फिर सफर शांत । वॉल्वो जब गुड़गांव से गुजरने लगी तो – उन्होंने पूछा – आप क्या करते है ? मैंने जमाने की मासूमियत ओढ़ – बोला – शिक्षक हूँ । उन्होंने पूछा – कहाँ ? तो मैंने अपने कॉलेज का नाम बताया । उन्हें उस कॉलेज का नाम पता था तो उन्होंने पद पूछा तो मैं भी ‘सहायक प्राध्यापक’ बोला । अब बातों में वो खुल गईं – कहा – बहुत कम उम्र में । मैंने कहा – प्रतिभावान हूँ । वो जोर से हंसने लगी । मैं भी मुस्कुरा दिया । मैं तब तक अपने तरफ से कोई भी सवाल नही । फिर वो मेरे जयपुर जाने पर सवाल – मैंने जबाब दे दिया । फिर वो खिड़की की तरफ मुड़ गयी और मैं भी रीडर्स डाइजेस्ट को टो टा के पढ़ने लगा । थैंक्स गॉड – अभी तक वार्तालाप अंग्रेज़ी में नही हुई थी और मनीषा सिंह भी अभी तक मोबाईल पर टन टन नही की थी – कहाँ तक पहुंचे ।
इसी बीच उन्होंने चिप्स का पैकेट खोला और मेरे तरफ बढ़ा दिया । चिप्स के पैकेट से चिप्स निकालने और खाने के दौरान उंगलियां भी स्पर्श की । करेंट मुझे लगा – उनका मुझे नही पता । लेकिन मैं भद्रता और कुलीनता की खाल ओढ़ एक गंभीर मुद्रा में चुप ही रहा । बातों बातों में पता चला कि वो देश के नामी गिरामी स्कूल कॉलेज से पढ़ -वर्तमान में भारत सरकार में उच्च पद पर नई दिल्ली में आसीन हैं । मेरे ऊपर कोई फर्क नही पड़ा जो उनके चेहरे पर कौतूहल बन के उभरा । बातें होने लगी । बैच और कैडर भी बताया । मैंने भी अपनी पढ़ाई लिखाई और वर्तमान पेशा की दिक्कत इत्यादि का बयान किया । तब दालान शुरू नही हुआ था । सो मेरे पास बताने को कुछ ज्यादा नही था । लेकिन वो मेरे आव भाव से इम्प्रेस हो चुकी थी । यह मुझे उस वक़्त प्रतीत हुआ । उन्होंने ही कहा – फलाने जगह रास्ते मे गाड़ी रुकेगी वहां साथ मे चाय कॉफ़ी पियेंगे । मैंने भी कंधा उचका दिया- जैसी आपकी मर्जी ।
वॉल्वो रास्ते मे एक बहुत बड़े ढाबे पर रुकी । मैंने भी मालबोरो सिगरेट निकाला और वर्तमान के फवाद खान की तरह उसे जलाया । वो बड़ी गौर से देखने लगीं । फिर वो अपने टोट बैग से अपना विजिटिंग कार्ड निकालीं और बोली – कभी दिल्ली आना हुआ तो मिलिएगा । मैंने कार्ड पर एक सरसरी निगाह डाली और कार्ड को अपने वैलेट में रख दिया – आज भी वो सुरक्षित है 😐
फिर मैं उनके यूपीएससी के विषय इत्यादि पर सवाल किया । हम वापस बस में आ गए थे । अब संकोच एक परत निचे आ गयी थी – फिर से उन्होंने चिप्स का पैकेट खोला – इस बार उंगलियां बड़े निर्भीक होकर आपस मे मिल रही थी । उन्होंने कल के मेरे गेस्ट लेक्चर के बाद – जयपुर आने का न्योता भी दी । जिसे मैंने बड़े ही सज्जनता से मना भी किया । बातों से यही लगा कि वो जयपुर से ही है ।
मालूम नही क्या हुआ – बात राजनीति पर आ गयी । बिहार और उसकी राजनीति । यूपी की राजनीति और राजस्थान । मैंने बातों बातों बहुत कुछ बोल दिया । थोड़ा विकास और सामंतवाद की वकालत कर दी । वो अचानक से मेरी तरफ मुड़ी और बोली – ‘कहीं आप भुमिहार तो नही ?’ । मैंने कहा – जी हां , मैं एक भुमिहार हूँ ।
वो पल भर में खिड़की की तरफ मुड़ी और मैं अवाक । तब से बीच रास्ते एमिटी प्रांगण के सामने वॉल्वो रुकने और मेरे उतरने तक वो खिड़की की तरफ से एक झलक मेरी तरफ मुड़ के देखी भी नही 😐
हा हा हा …चुनावी माहौल है । तो यह कहानी याद आयी । सच्ची है ।
तब मैंने कसम खाया – किसी भी महिला से राजनीति की बात नही करूंगा ।
ज्ञान प्राप्त हुआ – किसी भुमिहार को सिर्फ और सिर्फ एक भूमिहारीन ही समझ सकती है ।
हा हा हा …

~ रंजन ऋतुराज / 24 मार्च , 2019

प्रोजेक्ट मैनेजमेंट – पार्ट 2

बात पंद्रह साल पुरानी है ! मै नॉएडा आ चूका था ! शिक्षक बन चूका था ! तब हमारे हेड होते थे – कर्नल गुरुराज ! देश के सबसे बेहतरीन रीजनल कॉलेज ‘त्रिची’ से पास ! छोटा कद और बेहद कड़क ! तब वो कॉलेज के वाईस प्रिंसिपल भी थे ! जिस दिन ज्वाइन करना था – उस पुरे दिन मै उनके कमरे के बाहर खड़ा रहा ! वो काफी व्यस्त थे ! तब हम सभी महज एक लेक्चरर थे और डिपार्टमेंट में एक ही असिस्टेंट प्रोफ़ेसर थीं – श्रीमती कृष्णा अस्वा ! कृष्णा मुझसे उम्र में छोटी रही होंगी लेकिन पद में ऊपर थी ! सांवला रंग और खादी की साड़ी ! और मुझसे बेहद अदब से पेश आती थी !
अगले सेमेस्टर विषय निर्धारण का वक़्त आया ! प्रोजेक्ट मैनेजमेंट दो जगह पढ़ाने को था ! आंबेडकर यूनिवर्सिटी आगरा का फाइनल ईयर बैच निकलने को था और यूपी टेक्नीकल यूनिवर्सिटी का प्रथम बैच थर्ड ईयर में था ! दोनों जगह प्रोजेक्ट मैनेजमेंट था ! इस विषय को कोई भी शिक्षक छूने को तैयार नहीं था ! विष का प्याला -रंजन ऋतुराज आगे बढ़ गए ! श्रीमती कृष्णा अस्वा ने खखर कर पूछा भी – ‘ रंजन सर , आप इस विषय को पढ़ा लेंगे ..न ‘ ! हमने भी खखर कर जबाब दे दिया ! फाइनल ईयर और थर्ड ईयर को पढ़ाना था ! लाइब्रेरी चला गया ! तब लाइब्रेरी की आदत थी ! कुछ एक मोटी मोटी किताब लेकर आ गया ! विषय से परिचित था लेकिन पढ़ाने लायक कांफिडेंस नहीं था ! खैर ….एक दिन सुबह फाइनल ईयर के क्लास में घुस गया ! किताब लेकर क्लास लेने की आदत थी ! दो तीन मोटी मोटी विदेशी किताबें लेकर लेक्चर थियेटर में घुसा तो थोडा नर्वस था ! किताबों को पोडियम पर रख – खुद का परिचय दिया – मै फलना धिकना इत्यादि इत्यादि ! समय काटना था – फिर विद्यार्थी सब से उनका परिचय पूछा ! नए शिक्षक और फाइनल इयर के विद्यार्थी के बीच उम्र का फासला कम होता है ! 
कुछ एक बड़ी बड़ी कजरारी आँखें बड़े ही गौर से देखने लगी की यह नमूना कौन है ! तब कोई भी एक शिक्षक झुंझला जाता है ! अचानक से मैंने पूछा – ” क्या आप सभी कभी जीवन में कोई प्रोजेक्ट देखे हैं या किसी प्रोजेक्ट के पार्ट रहे हैं ? ” ! किसी ने कुछ जबाब नहीं दिया ! मैंने पूछा – क्या आपने कभी कोई शादी / विवाह देखी है ? सभी ने जबाब दिया – हाँ ! मै मुस्कुरा दिया ! बोला – घर परिवार में होने वाली शादी विवाह किसी भी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट का बेहतरीन उदहारण होता है ! अगर आप इस उदहारण को समझ गए फिर आप कोई भी प्रोजेक्ट संभाल लेंगे ! छात्र थोड़े मुस्कुराए फिर मैंने इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट मैनेजमेंट को विवाह की तैयारी से जोड़ कर समझाया ! उसी सेमेस्टर यूनिवर्सिटी एक्सपर्ट मीटिंग में हमारी असिस्टेंट प्रोफ़ेसर श्रीमती कृष्णा अस्वा लखनऊ गयीं ! वहां उन्होंने मेरे बारे में क्या कहा , मुझे नहीं पता लेकिन पहली ही दफा में मुझे यूनिवर्सिटी का क्योश्चन पेपर सेट करने को मिला ! मै बहुत खुश था ! 
मैंने तीन सेट तैयार किये और अपनी पूरी आत्मा उन तीनो सेट में रख दिया ! पूरी क्रियेटिविटी रख दिया ! लेकिन मुझे नहीं पता था की वही पेपर परीक्षा में आयेंगे ! तब फाइनल यूनिवर्सिटी परीक्षा का होम सेंटर होता था ! जिस दिन परीक्षा था – बेचैने थी – पत्र बंटने के बाद – मुझे पता चला की मेरा ही सेट आया है ! परीक्षा ख़त्म होने के बाद हाथ फोल्ड कर एक खम्भे से टीक गया और परीक्षा कक्ष से बाहर निकल रहे विद्यार्थिओं के चेहरे की मुस्कान मेरे घमंड को और ऊँचा कर रही थी ! क्योस्चन पेपर में एक सवाल मेरे अंदाज़ को व्यक्त कर रहा था , जिससे मेरे छात्र को पकड़ लिए की यह रंजन सर का ही पेपर है ! अगले दो साल और यूनिवर्सिटी ने मेरा ही पेपर परीक्षा में दिया ! किसी भी शिक्षक के लिए यह बहुत गौरव की बात है और ऐसे अवसर शिक्षक के व्यक्तित्व में गंभीरता लाते हैं ! फिर अगले दो तीन साल बाद – यूनिवर्सिटी ने मुझे इसी विषय का डीपटी और फिर हेड येग्जाम्नर भी बनाया ! 
यहाँ मेरा कोई भी व्यक्तिगत योगदान कुछ नहीं था लेकिन एक बढ़िया संस्थान में काम करने के कारण मुझे ये अवसर मिले ! इसी विषय में मै आगे रिसर्च करना चाहता था ! मरद जात कुकुर – शायद तब के सबसे सुन्दर शिक्षिका जो आईआईटी – दिल्ली में थी – उनके पास रिसर्च करने पहुँच गया ! उनके पास इस विषय के सभी डिग्री मौजूद थी ! हमउम्र भी थी सो रिसर्च की गुंजाईश कम ही थी ! एक दो मुलाक़ात में ही बात समझ में आ गयी की ना तो वो मेरी गुरु बन सकती हैं और ना ही मै उनका चेला ! वो अमेरिका चली गयीं – रिसर्च एक ख्वाब बन के रह गया ! हा महा हा…… खैर , आज फिर से उसी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में वापस हूँ ! खुश हूँ ! देश के सबसे बेहतरीन ब्रांड “टाटा” के साथ दो साल के अनुबंध पर ! खूब पढता हूँ ! समझ रहा हूँ ! लेकिन अन्दर का एक शिक्षक वर्तमान है जो वक्त के साथ खुलेगा – और ज्ञान की कैसी सीमा ….:)) 

~ रंजन ऋतुराज / दालान / पटना

9 जुलाई , 2017

प्रोजेक्ट मैनेजमेंट – पार्ट 1

ठीक पंद्रह साल पहले की बात है ! इसी जून के महीने एक शाम प्रमोद महाजन दिल्ली एअरपोर्ट पर ए पी जे अब्दुल कलाम का हाथ पकडे बाहर की तरफ निकल रहे थे ! भावी राष्ट्रपति की घोषणा होने वाली थी ! मुर्ख मिडिया ने अब्दुल कलाम साहब पर सवालों के गोले दागने शुरू कर दिए – ” आप तो गैर राजनीति और प्रायोगिक विज्ञानं से हैं …कैसे देश को संभालेंगे इत्यादि इत्यादि ” ! इंसान कोई भी हो – एक उम्र बाद जब उसके काबलियत पर कोई शक करे , इंसान का तिलमिलाना स्वाभाविक है ! अब्दुल कलाम साहब ने जबाब दिया था – ‘ आजीवन मै प्रोजेक्ट मैनेजर रहा हूँ और एक प्रोजेक्ट मैनेजर से बढ़िया नेतृत्व की क्षमता किसी के पास नहीं होती है , बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर मुझे न जाने कितने रिसोर्स को मैनेज करना पड़ता है  ” ! मालूम नहीं मुर्ख मिडिया को उनकी बात कितनी समझ में आई लेकिन मै मुस्कुरा रहा था :))
खैर …..
बात वर्षों पुरानी है  ! मैंने पीजी में एडमिशन ले लिया था ! अभी तक तो कभी पढ़ाई लिखाई किया नहीं था ! सो सोचा  कुछ पढ लिया जाए – अनपढ़ का बोझ कब तक लिए फिरें 🙂  ! लाइब्रेरी जाने की आदत पड़ गयी ! मेरे साथ वाले भी लाइब्रेरी जाते थे लेकिन वो सिलेबस तक ही पढ़ते थे ! मै अपने स्वभाव से पीड़ित था ! सिलेबस छोड़ सब कुछ पढने की बिमारी बचपन से थी ! पढ़ गया – इंजीनियरिंग मैनेजमेंट , प्रोजेक्ट मैनेजमेंट इत्यादि इत्यादि ! खैर …एक किताब हाथ लगी जिसमे बताया गया की कैसे बड़े बड़े प्रोजेक्ट फेल हो जाते हैं ! प्रोजेक्ट की कई कहानी पढने के बाद – निष्कर्ष यही निकला की ‘Requirement Analysis’ को तवज्जो दिया ही नहीं गया ! अरबों खरबों के प्रोजेक्ट बंद हो गए ! हालांकि प्रोजेक्ट फेल होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन ‘Requirement Analysis’ उनमे से एक प्रमुख होता है !
एक उदाहरण देता हूँ – नॉएडा आया तो मुझे किराया का मकान लेना था ! वहां के सेक्टर 62 के एक पीएसयु कम्पनी PDIL की नयी बनी सोसाइटी में दो कमरों का फ़्लैट लिया ! इस कंपनी के बारे में बताता चलूँ – यह रांची के इंजीनियरिंग डिजाईन कंपनी मेकॉन की तरह भारत सरकार की कंपनी है – जो बड़े बड़े प्रोजेक्ट की डिजाईन करती है – ख़ासकर रिफाईन और खाद कारखानों की ! मेरे साथ पढ़े कॉलेज के कुछ एक मित्र भी यहाँ काम कर रहे थे ! शत प्रतिशत इंजिनियर की कंपनी !चपरासी भी शायद इंजिनियर ही होगा ! लेकिन इसी कंपनी के इंजिनियर जब खुद के सोसाइटी डिजाईन किये तो वहां ‘ कार पार्किंग’ की जगह ही नहीं दिए ! डिजाईन करते वक़्त फ़्लैट तो बेहतरीन बनाए लेकिन कुछ एक एकड़ में बसे इस सोसाइटी में उन्होंने कार पार्किंग की जगह नहीं बनायी ! जब नॉएडा से जमीन मिला तब भारत सरकार के इस कंपनी में तनखाह कम थी ! अधिकतर इंजिनियर स्कूटर झुका के स्टार्ट करने वाले मुद्रा में थे ! किसी ने कभी यह नहीं सोचा की कल को कार भी चढ़ सकते है ! बना दिया एक सोसाइटी – बिना कार पार्किंग की ! पांचवां / छठा वेतनमान आया, हज़ार कमाने वाले लाख में तनखाह उठाने लगे ! बाल बच्चे बड़े हुए ! कार खरीदी गयी और अब रोज कार पार्किंग को लेकर ‘माई – बहिन’ ! मेरी जगह पर उसने कार लगा दी तो उसकी जगह पर किसी और ने कार पार्क कर दी ! सारा शहर कार पर घूम रहा है और इंजिनियर की बस्ती में कार पार्किंग की कोई जगह ही नहीं ! क्योंकि आपने सोचा – अभी मेरी तनखाह कम है और कार बड़े लोगों की सवारी है ! पलक झपकते हर घर तीन कार हो गयी ! अब आप अपना पूरा स्ट्रक्चर तोड़ भी नहीं सकते ! अजीब है ..न ! पूर्ण रूपेण इंजिनियर की कंपनी , मकान  आयु सौ साल और कार पार्किंग की जगह नहीं ! और शहर देश का बेहतरीन – नॉएडा !
यहं पुर्णतः Requirement Engineering की फेल्युअर है !
जब खुद का फ़्लैट इंदिरापुरम में खरीदना था – करीब छः महीने 28 बिल्डर के यहाँ घुमा ! मुझे अपनी जरूरतें पता थी ! मै बजट का इंतज़ार किया लेकिन अपनी जरूरतों से कोई समझौता नहीं ! सिविल इंजीनियरिंग / इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट हर दो साल पर सॉफ्टवेयर की तरह बदलने की चीज नहीं है ! एक मकान की आयु सौ साल और एक सड़क पांच सौ – हज़ार साल जिंदा रहती है !
कई दफा खुद क्लाइंट को अपनी जरूरतें समझ में नहीं आती है ! उस वक़्त कंसल्टेंट / एजेंसी को आगे बढ़ कर क्लाइंट को पढ़ाना / बताना पड़ता है ! कई दफा जरूरतें पैदा भी करनी पड़ती है ! इसी वर्ष ११ जून को बिहार सरकार पटना – सोनपुर एक ब्रिज देश को समर्पित करेगा ! इस ब्रिज में मोकामा – बेगुसराय ‘राजेंद्र ब्रिज’ की तरह रेल और सड़क यातायात दोनों है ! वर्तमान गंगा सेतु टूटने के कगार पर है या वहां चार पांच घंटे जाम लगा रहता है ! लेकिन इस नए ब्रिज की चौड़ाई महज 18 मीटर है ! मतलब आज के जमाने में भी सिर्फ दो लेन ही हैं ! एक उधर से आने को और एक इधर से जाने को ! और तब जब बिहार से बने दो रेल मंत्री का यह ख़ास प्रोजेक्ट था ! इतने संकरे ब्रिज को बनाने का जड़ मै नहीं लिख सकता – मुझे सामंतवाद ठहरा सोशल मिडिया पर गाली मिलेगी ! लेकिन यही स्थिति है “प्रोजेक्ट मैनेजमेंट” की  ! मालूम नहीं – सरकार में बहाल बड़े बड़े अधिकारी और इंजिनियर – Requirement Ananlysis को लेकर इतने ढीले क्यों है ? सन 2002 में शिलन्यास हुए इस पूल को बन कर तैयार होने में 15 साल लग गए ! 1976  में नॉएडा का जन्म हुआ ! इस विशाल शहर में सेक्टर 11 के बगल में सेक्टर 22  है ! कोई बिहार से आया  तो अपने सम्बन्धी का पता खोजने के चक्कर में भूखा मर जाएगा ! क्योंकि ब्लाक B के बगल में ब्लाक J है ! खोजते रहिये – रंजन ऋतुराज का पता ! ऑटो वाला बीच रास्ता सामान उतार वापस दिल्ली स्टेशन चल देगा !
संभवतः ओल्ड बंगलौर विश्वसरैया जी का डिजाईन किया हुआ है ! मै मल्लेश्वरम मोहल्ले में रहा हूँ ! सड़क और मोहल्ला “क्रॉस और मेन” सड़क में बंटा हुआ है ! आपको कोई भी घर खोजने में भी दिक्कत नहीं होगी ! यह सिविल इंजीयरिंग की उदहारण मैंने दी है ! दिक्कतें बाकी की सभी इंजीनियरिंग विभाग में है ! कोई भी इंजिनियर टीम – Requirement Analysis को लेकर सीरियस नहीं है ! फेसबुक इसी लिए सफल रहा की वो मानव स्वभाव के Requirement को समझा !
अमरीका की पूरी सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री वहां की मिलिट्री की देन है ! मिलिट्री के पास बजट की कमी नहीं होती थी और वो नए प्रयोग करते थे ! सत्तर और अस्सी के दसक में कई ख़रब डॉलर के प्रोजेक्ट कमज़ोर Requirement Engineering की वजह से या तो बीच में लटक गए या फिर किसी काम के नहीं रहे ! अमरीका मिलिट्री के साथ  वहां की सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का पेट – जेनेरल इलेक्ट्रिक भरता था / है ! एक ही प्रोजेक्ट वो तीन अलग अलग कंपनी से करवाता था / है !
इंजीनियरिंग के छोटे से छोटे प्रोजेक्ट की भी आयु तीन साल होती है और तीन साल में जरूरतें बदल जाती है ! तकनीक / रहन सहन में बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है ! लोगों की मूल जरूरतों और बदलाव को समझिये ! अंत में एक उदाहरण देता हूँ – नॉएडा और इंदिरापुरम जैसे बड़े शहर में सरकार की तरफ से एक भी लाइब्रेरी की व्यस्था नहीं है ! हजारों फ्लैट के बीच कर चार कदम पर एक शौपिंग मॉल है लेकिन एक भी लाइब्रेरी नहीं है !
हम कैसा शहर / समाज बना रहे हैं , जहाँ सिर्फ और सिर्फ पढ़े लिखे लोग ही बस रहे हैं और एक लाइब्रेरी तक नहीं ! इससे शर्मनाक और क्या बात हो सकती है ! करीब दस साल पहले भारत सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने कहा था – कई छोटी मोटी शुरूआती  गलतिओं की वजह से भारत जैसे देश में लग भाग दो लाख करोड़ के प्रोजेक्ट दिशाहीन हो जाते हैं !
शुरूआती दौर की एक गलती अपने अंतिम फेज़ में पहुँचते वक़्त – कई गुना बढ़ चुकी होती है !
हालांकि पिछले पंद्रह साल में भारत में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट को लेकर सजगता बढ़ी है लेकिन वह सजगता प्रोजेक्ट कंट्रोल पर ज्यादा है ! अभी भी Requirement Analysis / Engineering ठन्डे बसते में ही है ! जिस रफ़्तार से टैक्स में बढ़ोतरी और कलेक्शन बढ़ रहा है , सेना के बाद सरकार के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा विभिन्न परियोजनायों / प्रोजेक्ट की तरफ ही जाएगा ! और जनता की गाढ़ी कमाई का यह पैसा भविष्य में जनता के हित को साधे , उसके लिए सरकार को अपने विभागों के इंजीनियरों के हाथ और कलेजा दोनों मजबूत करने होंगे !
मुझे कोई संकोच नहीं हैं की – भारत में नए युग का प्रवेश द्वार ‘वाजपेयी सरकार’ रही – जहाँ उन्होंने भारत सरकार के दो प्रमुख विभागों का सचिव ‘टेक्नीकल लोगों’ को बनाया ! श्री मंगला राय , वैज्ञानिक को कृषि शिक्षा और अनुसंधान का सचिव बनाया एवं श्री आर भी शाही को उर्जा सचिव बनाया ! यह कदम बहुत साहसी था ! सीतामढ़ी बिहार के रहने वाले श्री आर भी शाही को आज भी भारत के नए युग में उर्जा विस्तार को उन्हें सूत्रधार कहा जाता है !
आज ऑटोमोबाइल और आईटी क्षेत्र में सबसे ज्यादा Requirement Engineering पर बहस हो रही है , उनका स्वरुप भी ऐसा है की उन्हें दो तीन साल में बदल रही जरूरतों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तो बीस / पचास / सौ साल के लिए होता है – वहां तो भविष्य की जरूरतों को ध्यान देना ही होगा !
कल्पना कीजिए – सम्राट अशोक के बाद शेरशाह सूरी के जमाने का ग्रैंड ट्रंक रोड …क्या जबरदस्त Requirement Engineering / Analysis रही होगी की आज भी यह सड़क हमारी जरूरतों को मुखातिब है !

हावड़ा का ब्रिज देखा है , क्या ? 1943 में बन कर तैयार यह ब्रिज , हाल फिलहाल तक बगैर किसी सड़क जाम के कलकत्ता को हावड़ा से कनेक्ट किये हुए था ! मेरे पटना का गंगा सेतु तो बस बीस साल में ही दम तोड़ दिया !

कहाँ दिक्कत है ?

~ रंजन / पटना / 10 June , 2017

मेरा गांव – मेरा देस – मेरा मैट्रिक परीक्षा

मार्च के महिना में ‘मैट्रीक’ का परीक्षा होता है – शायद इस पोस्ट को आपमे से बहुत सारे पढ़े होंगे – फिर से पढ़ लीजिये – जो नहीं पढ़ें हैं – आराम से पढ़िए – खालिस बिहारी है …. :))


बिहार में छठ पूजा के बाद – सबसे महत्वपूर्ण पर्व त्यौहार होता है – घर के लडके – लडकी का मैट्रीक परीक्षा ! मत पूछिए ! मैट्रीक परीक्षार्थी को किसी ‘देवी – देवता’ से कम नहीं वैल्यू नहीं होता है :))

दसवां में था तब – राजेंद्र नगर स्टेडियम में क्रिकेट मैच हुआ था – मार्च के महीना में – सब यार दोस्त लोग तीन चार दिन देखे थे ! उस वक्त हमसे ठीक सीनियर बैच का परीक्षा चल रहा था ! स्टेडियम से लौटते वक्त पुर रास्ता जाम रहता था ! सीनियर बैच का उतरा हुआ चेहरा देख दिल “ढक ढक” करे लगता

दसवां के पहले मेरे यहाँ एक नियम था – छमाही – नौमही – वार्षिक परीक्षा के ठीक तीन दिन पहले – बाबु जी मेरा “रीन्युअल” करते – बहुत ही हल्का ‘नेपाली’ चप्पल होता था – बहुत एक्टिंग करना पड़ता – इस चप्पल से बिलकुल ही चोट नहीं लगता था – पर् एक्टिग ऐसा की जैसे की बहुत मार पड़ रहा हो फिर हम कुल तीन दिन पढते और आराम से परीक्षा पास

अब मैट्रीक का परीक्षा आ गया था – सितम्बर -ओक्टुबर में “सेंटअप” का परीक्षा हो गया ! हम लोग का स्कूल जाना बंद ! “भारती भवन ” का गोल्डन गाईड खरीदा गया ! गोविन्द मित्र रोड से खरीद – साईकील के पीछे ‘चांप’ के – ऐसा लगता जैसे आधा परीक्षा पास कर गए “गोल्डन गाईड” को अगरबत्ती दिखाया गया ! कभी वो टेबल पर् तो कभी वो बेड में तकिया के बगल में ! दोस्त यार के यहाँ गया तो देखा की उसको पन्द्रह भाग में विभाजीत कर दिया है – हम भी कर दिए ! अब इस गोल्डन गाईड का पन्द्रह टुकड़े हो गए – रोज एक “भुला” जाता – सारा गुस्सा माँ पर् निकलता

हमको भूगोल / इतिहास / अर्थशास्त्र / नागरीक शास्त्र एकदम से मुह जबानी याद हो गया था ! शाम को बाबु जी आते तो बोलते की – हिसाब बनाये हो ? सब लोग कहने लगा की – सबसे ज्यादा “नंबर” गणित में उठता है – अलजेब्रा छोड़ सब ठीक था – थोडा मेहनत किया तो वो भी ठीक हो गया ! दिक्कत होती थी – केमिस्ट्री और बायलोजी में बकवास था ये सब ! डा ० वचन देव कुमार का “वृहत निबंध भाष्कर’ तो खैर जुबान पर् ही था ! अंग्रेज़ी जन्मजात ही कमज़ोर था – इसलिए वहाँ तो बस “पास” ही करने का ओबजेकटीव था ! नौवां से ही – स्कूल के एक दो शिक्षक के यहाँ टीउशन का असफल प्रयोग कर चूका था – सो अब किसी के यहाँ जाने का सवाल ही पैदा नहीं था !

खैर …एक दो और गाईड ख़रीदा गया ! सभी विषय का अलग से “भारती भवन” का किताब ! अर्थशास्त्र में “मांग की लोच ” इत्यादी चैप्टर तो आज तक याद है :))

खैर …धीरे धीरे ..प्रेशर बढ़ने लगा …आज भी याद है ..गाँव से बाबा किसी मुंशी मैनेजर के हाथ कुछ चावल – गेहूं भेजे थे – और वो पटना डेरा पहुँच चाय की चुस्की के बीच – मेरी तरफ देखते हुए – बोला – “बउआ ..के अमकी “मैट्रीक” बा ..नु ” ! मन तो किया की ..दे दू हाथ ! फूफा – मामा – मामी – चाची – चाचा – कोई भी आता तो “उदहारण” देता – फलाना बाबु के बेटा / बेटी को पिछला साल ‘इतना’ नंबर आया था – ऐसी बातें सुन – हार्टबीट बढ़ जाता ! फिर सब लोग गिनाने लगते – “इस बार कौन कौन मैट्रीक परीक्षा दे रहा है ” जिससे मै आज तक नहीं मिला – वो भी मुझे दुश्मन लगता ! कोई चचेरा भाई – मोतिहारी में दे रहा है तो कोई फुफेरी बहन – सिवान में ! उफ्फ्फ्फ़ ….इतना प्रेशर !

रोज टाईम टेबल बनने लगा ! क्या टाईम टेबल होता था बिहार सरकार की तरह – सब काम कागज़ में ही धीरे धीरे ठंडा का मौसम आने लगा ! कहीं भी आना जाना बंद हो गया ! बाबु जी को सब लोग कहता – “आपके बेटा – का दीमाग तेज है – बढ़िया से पास कर जायेगा” ! अच्छा लगता था ! पर् …और बहुत सारी दिक्कतें थी …

सुबह उठ के नहा धो के – छत पर् किताब कॉपी – गाईड लेकर निकल जाता ! साथ में ‘एक मनोहर कहानियां या कोई हिन्दी उपन्यास ‘ ! गाईड के बीच उपन्यास को रख कर – पढ़ने में जो थ्रील आता ..वो गजब का था :)) फिर ‘जाड़ा के दिन’ में छत का और भी मजा था ! :)) कहीं से उपन्यास वाली बात ‘माता श्री’ तक पहुँच गयी ! ‘माता श्री ‘ से ‘पिता जी’ तक तय हुआ – एक मास्टर रखा जायेगा – जो मुझे पढ़ाएगा नहीं – बल्की सिर्फ मेरे साथ दो तीन घंटा बैठेगा ! मास्टर साहब आये – एक दो महीना बैठे – फिर मुझ द्वारा भगा दिए गए लेकिन एक फायदा हुआ – गणित के सवाल रोज बनाने से गणित बहुत मजबूत हो गया ! अलजेब्रा भी मजबूत हो गया – !

अब हम लोग दूसरी जगह ‘सरकारी आवास’ में आ गए – यहाँ भी सभी लोग बाबु जी के नौकरी – पेशा वाले ही लोग थे – माहौल अजीब था – किसी का पुत्र दून में तो किसी का वेलहम में – कोई डीपीएस आर के पुरम में – भारी फेरा .. ! खैर …

यहाँ के लिये मै अन्जान था – बस बालकोनी से मुस्कुराहटों को देख मूड फ्रेश कर वापस किताबों में घुस जाना ! तैयारी ठीक थी – मै संतुष्ट था ! अंग्रेज़ी – बायलोजी – केमिस्ट्री छोड़ सभी विषय बहुत परफेक्ट थे – मैंने किसी विषय को रटा नहीं था – आज भी ‘रटने’ से नफरत है ! खैर …बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती – ऐडमीट कार्ड मिलने का दिन आ गया – स्कूल गया – कई महीनो बाद दोस्तों से मुलाकात हुई –

स्कुल में पता चला की – सेंटर दो जगहों पर् पड़ा है पहले दो सेक्शन “जालान” और हम दो सेक्शन “एफ एन एस अकेडमी ” ! मन दुखी हो गया – बहुत दुखी ! “जालान” में सुना था – उसका बड़ा गेट बंद कर के – अनदर …सब कुछ का छूट था बहुत करीबी दोस्त था – दीपक अगरवाल – बात तय हुआ – परीक्षा के दिन – साईकल से मै उसके घर जाऊंगा – फिर वहाँ से हम दोनों साथ में !

परीक्षा के दिन ‘जियोमेट्री बॉक्स’ लेकर ..एक हैट पहन कर ..साईकील से दीपक अगरवाल के यहाँ निकल पड़ा ..वहाँ पहुंचा तो पता चला की ..दीपक अपने मामा – मामी – फुआ – बाबु जी – माँ – बड़ा भाई इत्यादे के साथ निकल चूका है अजीब लगा ..इतने लोग ..क्या करेंगे ?? रास्ते में साईकील के कैरियर से ‘जियोमेट्री बॉक्स ‘ गिर गया ..देखा तो ‘एडमीट कार्ड’ गायब ….हाँफते – हुन्फाते ..साईकील को सौ पर् चलाते ..घर पहुंचा तो देखा की ..बाबु जी बालकोनी में मेरा एडमीट कार्ड हाथ में लिये खडा है …जबरदस्त ढंग से दांत पीस रहे थे … मुझे नीचे रुकने को बोले और खुद नीचे आये …लगा की ..आज “जतरा” बाबु जी के हाथ से ही बनेगा ….फिर पूछे ..सेंटर कहाँ पड़ा है – हम बोले …गुलजारबाग …! हम अपना “हैट” अडजस्ट किये ..साईकील का मुह वापस किये ..पैडल पर् एक पाँव मारे ..और चल दिए …!

अजीब जतरा था …रास्ता भर साईंकील का “चेन” उतर जा रहा था किसी तरह पहुंचे …मेरे मुह से निकला …”लह” ….यहाँ तो “मेला लगा हुआ है ” ! हा हा हा ….सेंटर पर् सिर्फ मै ही “अकेला” था ..वरना बाकी कैंडीडेट ..पुरा बारात ! अपने परीक्षा कक्ष में गया ….सबसे आगे सीट ! पीछे “राजेशवा” था ! फिएट से उसका पुरा खानदान लदा के आया था ! अब देखिये …वो हमसे पूछता है ….”पुरा पढ़ के आये हो ना ..” हा हा हा हा हा ….प्रश्नपत्र मिला और मै सर झुका के लिखने लगा ….एक घंटा ..शांती पूर्वक …फिर पीछे के जंगला से एक आवाज़ आई – राजेश का बड़ा भाई था – “ई ..चौथा का आन्सर है” – ढेला में एक कागज़ लपेटा हुआ – राजेश के पास आया …धब्ब…! राजेशवा जो अब तक मेरा देख लिख रहा था ….अब वो परजीवी नहीं रहा …वादा किया ..”लिख कर ..मुझे भी देगा ” ….पहला सिटिंग खत्म हुआ ! टिफिन के लिये मै अपने साथ “शिवानी” के उपन्यास लाया था ..ख़ाक पढता था हल्ला हुआ – सब क्योश्चन ..”एटम बम्ब” से लड़ गया …अब सेंटर के ठीक सामने “एटम बम्ब” बिक रहा था …मै भी एक खरीद लिया ..बिलकुल सील किया हुआ खोला और एक नज़र पढ़ा ..बकवास !

हम हर रोज उदास हो जाता था …सभी दोस्त के साथ पुरे खानदान की फ़ौज होती थी ! टिफिन में हम अकेले किसी कोना में बैठे होते थे …इसी टेंशन में …दीपक अगरवाल’ को बीच चलते हुए परीक्षा में “धो” दिए ….उसको भी कुछ समझ में नहीं आया ..वो मुझसे क्यों धुलाया …हा हा हा !

इसी तरह एक एक दिन बितता गया ….अंग्रेज़ी भी पास होने लायक लिख दिया ..गणित- अर्थशास्त्र – भूगोल – इतिहास – और संस्कृत सबसे बढ़िया …बहुत ही नकरात्मक हूँ ..फिर भी खुद के लिये बहुत अच्छे नंबर सोच रखे थे ….अंतिम दिन ..चपरासी को दस रुपैया देकर ..कॉपी कहाँ गया है ..पता करवा लिया …पर् जहाँ कोई मेरे साथ “सेंटर” पर् जाने को नहीं था …कोई “कॉपी” के पीछे क्यों भागता ..हा हा हा …..

अंतिम दिन परीक्षा देकर ..कहीं नहीं गया …चुप चाप चादर तान सो गया …कितने घंटे सोया ..खुद नहीं पता …ऐसा लग् रहा था ..वर्षों से नहीं सोया हूँ …..

आज पटना वाले अखबार में पढ़ा की – कल से “बिहार मैट्रीक परीक्षा ” शुरू हो रहा है ..सभी विद्यार्थीओं को शुभकामनाएं ….. ज्यादा क्या कहूँ ..मेहनत कीजिए :))
~ दालान
२३ फरवरी , २०११

मेरा देस – मेरा गांव – होली पार्ट २

सुबह सुबह किसी ने पूछ दिया – इंदिरापुरम में आप लोग होली कैसे मनाते हैं ? अब हम क्या बोलें – कुछ नहीं – सुबह से पत्नी – दही बड़ा , मलपुआ , मीट और पुलाव बनाती हैं ! दिन भर खाते हैं – ग्यारह बजे अपने फ़्लैट से नीचे उतर कुछ लोगों को रंग / अबीर लगाया – फोन पर् टून् – टून् फोन किया – एसएमएस किया और एसएमएस रिसीव किया – दोपहर में स्कूल – कॉलेज के बचपन / जवानी वाले दोस्तों की टीम आएगी – सभी के सभी बेहतरीन व्हिस्की की बोतल हाथ में लिये – घिघिआते हुए पत्नी की तरफ देखूंगा – वो आँख दिखायेगी – हम् निरीह प्राणी की तरह उससे परमिशन लेकर – दो घूँट पियेंगे – गला में तरावट के लिये – तब तक दोस्त महिम लोग ‘मीट और पुआ’ खायेगा – फिर लौटते वक्त – थोडा बहुत अबीर ! हो गया होली – बीन बैग पर् पसर के टीवी देखते रहिए ! 
मुह मारी अइसन होली के 😦 
क्या सभ्यता है 🙂 मदमस्त ऋतुराज वसंत में होली – बुढ्ढा भी जवाँ हो जाए – एकदम प्रकृति के हिसाब से पर्व – त्यौहार !  
होली बोले तो – ससुराल में ! जब तक भर दम ‘सरहज – साली – जेठसर ‘ से होली नहीं खेला ..क्या खेला ? और तो और पहली होली तो ससुराल में ही मनानी चाहिए ! ‘देवर – नंदोशी’ से अपने गालों में रंग नहीं लगवाया – फिर तो जवानी छूछा ही बीत गया ! समाज के नियम को सलाम ! मौके के हिसाब से स्वतंत्रा मिली हुई है – मानव जाति एक ही बंधन में बंध के ऊब जाता है – शायद – तभी तो ऐसे रिश्ते बनाए गए ! एक से एक बुढ्ढा ‘ससुराल’ पहुंचाते ही रंगीन हो जाता है 😉 
दामाद जी अटैची लेकर ससुराल पहुँच गए – पत्नी पहले से ही वहाँ हैं – कनखिया के एक नज़र पत्नी को देखा – भरपूर देखा – सरहज साली मिठाई लेकर पहुँच गयी ! पत्नी बड़े हक से ‘अटैची’ को लेकर कमरे में रख दी !   तब तक टेढा बोलने वाला – हम उम्र ‘साला’ पहुँच गया – पूछ बैठेगा – का मेहमान ..बस से आयें हैं  की कार से  ..ससुर सामने बैठे हैं ..आपको उनका लिहाज भी करना है ..लिहाज करते हुए जबाब देना है …दामाद बाबु कुछ जबाब देंगे ..जोर का ठहाका लगेगा …तब तक रूह आफजा वाला शरबत लेकर ‘सास’ पहुँच जायेंगी – बड़ी ममता से आपको देखेंगी …’सास – दामाद’ का रिश्ता भी अजीब है ..”घर और वर्” कभी मनलायक नहीं होता ..कैसा भी घर बनवा दीजिए ..कुछ कमी जरुर नज़र आयेगी ..बेटी के लिये कैसा भी वर् खोज लाईये ..कुछ कमी जरुर नज़र आयेगी ! 
होली कल है ! अब आप नहा धो कर ‘झक – झक उज्जर गंजी और उज्जर लूंगी’ में हैं – दक्षिण भारतीय सिनेमा के नायक की तरह ! छोटकी साली को बदमाशी सूझेगी – आपके सफ़ेद वस्त्रों को कैसे रंगीन किया जाए ..वो प्लान बना रही होगी …बहन का प्यार देखिये ..वो अपना सारा प्लान अपनी बड़ी बहन यानी आपकी  पत्नी को बता देगी ..और आपकी पत्नी इशारों में ही आपको आगे का प्लान बता देगी …बेतिया वाली नयकी सरहज भी उसके प्लान में शामिल हो जायेगी …[ आगे का कहानी सेंसर है ] 
आज होली है …बड़ी मुद्दत बाद आप देर रात सोये थे 😉 …सुबह देर से नींद खुली नहीं की ..सामने स्टील के प्लेट में पुआ – पकौड़ी तैयार है …जितना महीन ससुराल ..उतने तरह के व्यंजन …तिरहुत / मिथिला में तो पुरेगाओं से व्यंजन आता है ..’मेहमान’ आयें हैं ..साड़ी के अंचरा में छुपा के ..व्यंजन आते हैं ..अदभुत है ये सभ्यता ! 
अभी आप व्यंजन के स्वाद ले ही रहे हैं …तब तक आपका टीनएज साला …स्टील वाला जग से एक जग रंग  फेंकेगा …आप बस मुस्कुराइए ..उसको ससुर जी के तरफ से एक झिडक मिलेगी ..वो भाग जायेगा ..अब आप होली के मूड में हैं…तब तक आपका हमउम्र साला आपसे कारोबार का सवाल पूछने लगेगा …आप अंदर अंदर उसको मंद बुध्धी बोलेंगे – साले को यही मौक़ा मिला था ..ऐसा सवाल पूछने का ..बियाह के पहले काहे नहीं पता किया था ..! हंसी मजाक का दौर …खाते – पीते समय गुजरने लगेगा …तब तक ..सुबह से गायब एक और साला जो थोड़ा ढीठ और मुहफट है …आपको इशारा से एक कोना में बुलाएगा ..आप सफ़ेद लूंगी संभालते हुए उसके पास पहुंचेंगे …वो धीरे से पूछेगा …’मेहमान ..आपको ‘चलता’ है ? न् “…अब आपको यहाँ एकदम शरीफ जैसा व्यव्हार करना है …पत्नी ने जैसा कल रात समझाया था ..वैसा ही …आप उसको बोलेंगे …’क्या “चलता” है ? ‘ वो गुस्सा के बोलेगा – अरे मेरे गाँव के राम टहल बाबु का बेटा आर्मी में है …सबसे बढ़िया वाला लाया है ..कहियेगा तो इंतजाम हो जायेगा …आप चुप चाप उसको एक शब्द में कुछ ऐसा जबाब दीजिए जिससे वो समझ जाए ..आप आज नहीं ‘लेंगे’ !

अचनाक से आपको युद्ध वाला माहौल नज़र आएगा – चारों तरफ से – छोटका साला , साली , सरहज आप पर् रंगों का बौछार करेंगे ..यहाँ तक की घर में काम करने वाली ‘मेड’ भी ! आप अपने स्वभानुसार प्रतिक्रिया देंगे …अब देखिये ..अभी तक आपके ससुर जी जो आपके बगल में बैठे थे …वो धीरे से उठ कर अपने कमरे में चले गए ….आपने पत्नी की तरफ एक शरारत भरी नज़र से देखा और …..होली शुरू :)))

[ यह पोस्ट एक कल्पना है … पसंद आया हो तो एक लाईक / कमेन्ट ]

रंजन ऋतुराज – इंदिरापुरम !

05.03.12

मेरा गांव – मेरा देस – मेरा होली

छठ / होली में जो अपने गाँव – घर नहीं गया – वो अब ‘पूर्वी / बिहारी’ नहीं रहा ! मुजफ्फरपुर / पटना में रहते थे तो हम लोग भी अपने गाँव जाते थे – बस से , फिर जीप से , फिर कार से ! जैसे जैसे सुख सुविधा बढ़ने लगा – गाँव जाना बंद हो गया ! अब पटना / नॉएडा / इंदिरापुरम में ही ‘होली’ मन जाता है ! चलिए ..होली की कुछ यादें ताजा करते है ! 
चलिए आज पटना की होली याद करते हैं ! होली के दस दिन पहले से माँ को मेरे कुर्ता – पायजामा का टेंशन हो जाता था क्योंकी पिछला साल वाला कुर्ता पायजामा छोटा हो चुका होता ! मेरा अलग जिद – कुछ भी जाए – ‘सब्जीबाग’ वाला पैंतीस रुपैया वाला कुर्ता तो हम किसी भी हाल में नहीं पहनेंगे ! बाबु जी का अलग थेओरी – साल में एक ही दिन पहनना है ! बाबु जी उधर अपने काम धाम पर् निकले – हम लोग रिक्शा से सवार – हथुआ मार्केट – पटना मार्केट  ! घूम घाम के कुछ खरीदा गया …सब बाज़ार में ‘हैंगर में लटका के कुर्ता रखता था ..झक झक उजला कुर्ता ! पटना मार्केट के शुरुआत में ही एक दो छोकरा लोग खडा रहता – हाथ में पायजामा का डोरी लेकर 😉 आठ आना में एक 😉

अब कुर्ता – पायजामा के बाद – मेरा टारगेट ‘पिचकारी’ पर् होता – गाँव में पीतल का बड़ा पिचकारी और शहर में प्लास्टिक 😦 ‘सस्तऊआ प्लास्टिक का कुछ खरीदा गया – रंग के साथ – हम हरा रंग के लिये जिद करते – माँ कोई हल्का रंग – किसी तरह एक दो डिब्बा हरा रंग खरीद ही लेता था !

धीरे धीरे बड़ा होते गया …पिता जी के सभी स्टाफ होली में अपने गाँव चले जाते सो होली के दिन ‘मीट खरीदने’ का जिम्मा मेरे माथे होता था ! एक दिन पहले जल्द सो जाना होता था ! भोरे भोरे मीट खरीदने ‘बहादुरपुर गुमटी’ ! जतरा भी अजीब ..स्कूटर स्टार्ट नहीं हो रहा …टेंशन में साइकिल ही दौड़ा दिया ..हाँफते हुन्फाते हुए ‘चिक’ के पास पहुंचे तो देखे तो सौ लोग उसको घेरे हुए है ..देह में देह सटा के ..मेरा हार्ट बीट बढ़ गया …होली के दिन ‘खन्सी का मीट’ नहीं खरीद पायेंगे …जीना बेकार है वाला सेंटीमेंट हमको और घबरा देता था …इधर उधर नज़र दौडाया …डब्बू भईया नज़र आ गए …एक कोना में सिगरेट धूकते हुए …सुने थे ..डब्बू भईया का मीट वाला से बढ़िया जान पहचान है …अब उनके पास हम सरक गए …लाइए भईया ..एक कश हमको भी ..भारी हेडक है ..ई भीड़ देखिये ..लगता है हमको आज मीट नहीं मिलेगा …डब्बू भईया टाईप आईटम बिहार के हर गली मोहल्ला में होता है ..हाफ पैंट पहने ..एक पोलो टी शर्ट ..आधा बाल गायब …गला में ढेर सारा बध्धी ..हाथ में एक कड़ा …स्कूटर पर् एक पैर रख के ..बड़े निश्चिन्त से बोले …जब तक हम ज़िंदा है ..तुमको मीट का दिक्कत नहीं होगा ..उनका ई भारी डायलोग सुन ..दिल गदगद हो गया …तब उधर से वो तेज आवाज़ दिए ….’सलीम भाई’ …डेढ़ किलो अलग से ..गर्दन / सीना और कलेजी ! तब तक डब्बू भईया दूसरा विल्स जला लिये ..अब वो फिलोसफर के मूड में आने लगे ..थैंक्स गोड..सलीम भाई उधर से चिल्लाया …मीट तौला गया ! जितना डब्बू भईया बोले …उतना पैसा हम दे दिए …फिर वो बोले ..शाम को आना …मोकामा वाली तुम्हारी भौजी बुलाई है ! डब्बू भईया उधर ‘सचिवालय कॉलोनी’ निकले …हम इधर साइकिल पर् पेडल मारे …अपने घर !
मोहल्ला में घुसे नहीं की ….देखे मेरे उमर से पांच साल बड़ा से लेकर पांच साल छोटा तक …सब होली के मूड में है ! सबका मुह हरा रंग से पोताया हुआ ! साइकिल को सीढ़ी घर में लगाते लगाते ..सब यार दोस्त लोग मुह में हरा रंग पोत दिया ! घर पहुंचे तो पता चला – प्याज नहीं है …अब आज होली के दिन कौन दूकान खुला होगा …पड़ोस के साव जी का दूकान ..का किवाड आधा खुला नज़र आया …एक सांस में बोले …प्याज – लहसुन , गरम मसाला ..सब दे दीजिए …! सब लेकर आये तो देखा ..मा ‘पुआ’ बना दी हैं …प्याज खरीदने वक्त एक दो दोस्त को ले लिया था …वो सब भी घर में घुस गए …मस्त पुआ हम लोग चांपे ..फिर रंगों से खेले ! 
कंकरबाग रोड पर् एक प्रोफेशनल कॉलेज होता है – यह कहानी वहीँ के टीचर्स क्वाटर की है – हमलोग के क्वाटर के ठीक पीछे करीब दो बीघे के एक प्लाट में एक रिटायर इंजिनियर साहब का बंगलानुमा घर होता था ! हमारी टोली उनके घर पहुँची ! बिहार सरकार के इंजिनियर इन चीफ से रिटायर थे – क्या नहीं था – उनके घर ! जीवन में पहली दफा 36 कुर्सी वाला डाइनिंग टेबुल उनके घर ही देखा था ! एकदम साठ और सत्तर के दसक के हिन्दी सिनेमा में  दिखने वाला ‘रईस’ का घर ! पिता जी के प्रोफेशन से सम्बंधित कई बड़े लोगों के घर को देखा था – पर् वैसा कहीं नहीं देखा ! हर होली में मुझे वो घर और वो रईस अंदाज़ याद आता है ! 
देखते देखते दोपहर हो गया – मीट बन् के तैयार ! अब नहाना है ! रंग छूटे भी तो कैसे छूटे …जो जिस बाथरूम में घुसा ..घुसा ही हुआ है 🙂

~ रंजन / 04.03.12

प्रेम और विशालता

प्रेम और विशालता :
दिनकर लिखते हैं – “नर के भीतर एक और नर है जिससे मिलने को एक नारी आतुर रहती है – नारी के भीतर एक और नारी है – जिससे मिलने को एक नर बेचैन रहता है ” ..:))
और यहीं से शुरू होती है …प्रेम और विशालता की कहानी ! ना तो आकर्षण प्रेम है और ना ही रोमांस प्रेम है ! प्रेम एक विशाल क्षितिज है !
कोई भी नर किसी नारी के प्रेम से उब नहीं सकता – उसके अन्दर प्रेम की कमी होती है – वो कठोर होता है – उसे खुद को मृदुल बनाना होता है – वह डूबता चला जाता है – वह डूबता चला जाता है ! नारी हैरान रहती है – आखिर क्या है इस प्रेम में – वो समझा नहीं पाता है – उसे वो प्रेम का सागर भी कम लगता है !
अब सवाल यह उठता है – प्रेम में डूबने के बाद भी – वह प्रेम उसे कम क्यों लगता है ? नारी अपने प्रेम के बदले नर की विशालता देखना चाहती है – क्योंकी प्रकृती ने उसे प्रेम तो दिया पर उस प्रेम को रखने के लिए एक विशालता नहीं दी ! नारी अपने प्रेम को उस विशाल नर को सौंपना चाहती है जो उसके प्रेम को अपने विशालता के अन्दर सुरक्षित रख सके ! और यहीं से शुरू होता है – द्वंद्ध !
तुम मुझे थोड़ा और प्रेम दो – तुम थोड़े और विशाल बनो ! अभी मै भींगा नहीं – अभी मै तुम्हारे विशालता में खोयी नहीं – वो अपना प्रेम देने लगती है और नर अपनी विशालता फैलाने लगता है – हाँ …प्रेमकुंड और विशालता ..दोनों एक ही अनुपात में बढ़ते रहने चाहिए ! एक सूखे कुंड में एक विशाल खडा नर – अजीब लगेगा और एक लबालब भरे कुंड में – एक छोटा व्यक्तित्व भी अजीब लगेगा !
नारी उस हद तक विशालता खोजती है जहाँ वो हमेशा के लिए खो जाए – नर उस हद प्रेमकुंड की तलाश करता है – जहाँ एक बार डूबने के बाद – फिर से वापस धरातल पर लौटने की कोई गुंजाईश न हो !
इन सब के जड़ में है – माता पिता द्वारा दिया गया प्रेम – पिता के बाद कोई दूसरा पुरुष उस विशालता को लेकर आया नहीं और माँ के बराबर किसी अन्य नारी का प्रेम उतना गहरा दिखा नहीं – फिर भी तलाश जारी है – डूबने की …फैलने की …प्रेमकुंड की …विशालता की !
अपने प्रेमकुंड को और गहरा करते करते नारी थक जाती है – अपनी विशालता को और फैलाते फैलाते नर टूट जाता है …शायद इसीलिये दोनों अतृप्त रह जाते है …अपनी गाथा …अगले जन्म में निभाने को …
ना तो आकर्षण प्रेम है और ना ही रोमांस प्रेम है ! प्रेम एक विशाल क्षितिज है – जहाँ उन्मुक्ता बगैर किसी भय के हो ….
~ कुछ यूँ ही …:))

28 Feb 2015 .

स्त्री – पुरुष / अर्धनारीश्वर

स्त्री – पुरुष / अर्धनारीश्वर

आज महाशिवरात्रि है ! स्त्री पुरुष के बीच के संबंधों को समझने का एक अध्यात्मिक कोण ! किसी भी चीज को समझने का अलग अलग कोण है ! अब आप अपने सुविधानुसार या किसी कारणवश किसी भी चीज को अपने कोण से देखते हैं और आपको प्रकृति भी आपको अपने कोण से देखने की छुट भी देती है ! सर्वप्रथम  यह मान के चलना चाहिए की यह ‘महाशिवरात्रि’ नहीं बल्कि ‘महाशिवशक्ति रात्री’ है ! शिव और शक्ति दोनों के मिलन की रात्री है ! अर्धनारीश्वर का कांसेप्ट ! एक ऐसी संरचना या  अनुभूति जहाँ शिव और शक्ति दोनों की बराबर उपस्थिति है ! जैसे ‘शिव लिंग की पूजा’ – वो शिव लिंग नहीं बल्कि ‘शिव और शक्ति’ दोनों का लिंग है ! वो मिलन के मुद्रा में है – वह मिलन जो इस जगत का आधार है , वो मिलन जो इंसान के परम सुख का आधार है ! यही मिलन अर्धनारीश्वर है ! संभवतः समाज पुरुष प्रधान रहा होगा तो इस शिव और शक्ति के मिलन वाले दिन को महाशिवरात्री कह दिया गया या शिव शक्ति के लिंगों के मिलन को सिर्फ शिव लिंग कह दिया गया और यह परंपरा चलती आई ! हालांकि इस विषय पर मैंने कुछ साल पहले हलके इशारा में इसी शिव रात्री के दिन लिखा था – यह कह कर की यह ‘शिव शक्ति रात्रि’ है ! आज का संयोग देखिये – मैंने इसी नाम से एक ज्वेलरी  का दूकान भी देखा !
जब हम शिव के नाम के साथ शक्ति का भी प्रयोग करते हैं  संभवतः हम शक्ति को भी उचित स्थान देते हैं , हालांकि धर्म के जानकार यह कह सकते हैं की शिव में शक्ति का मिलन है तो शिव नाम से ही शक्ति का भी ध्यान होता है ! यह तर्क भी उचित है लेकिन मै विशुद्ध शक्ति का उपासक हूँ तो मेरे व्यक्तिगत मत से शिव के साथ साथ शक्ति शब्द का भी प्रयोग होना चाहिए ! या फिर लोग करते आये हैं ! लेकिन हमारी कल्पना में शिव पूर्ण है – जहाँ शक्ति समाहित है !
स्त्री और पुरुष के बीच तीन तरह के सम्बन्ध बनते है – कारण जो भी हो ! शारीरिक , भावनात्मक और अध्यात्मिक ! उम्र के अलग अलग पड़ाव पर अलग अलग ढंग से बन सकते हैं ! माँ और पुत्र में यह अध्यात्मिक होता है – जन्म के साथ ही शायद हम पुरुष अपनी माँ के साथ एक अध्यात्मिक भाव बनाते हैं ! फिर उम्र के हिसाब से अन्य स्त्रीओं के साथ शारीरिक आकर्षण और साथ में भावनात्मक भी ! कभी भावनात्मक तो कभी शारीरिक आकर्षण – उस दौर के हिसाब के ! लेकिन माँ के साथ बचपन में अध्यात्मिक सम्बन्ध के बाद – फिर यौवन की पहली नज़र की पहली फुहार भी किसी अन्य स्त्री के साथ भावनात्मक ही होती है – शारीरिक नहीं होती है ! मै बात यौवन की पहली फुहार की कर रहा हूँ ! फिर उम्र के साथ शारीरिक आकर्षण ! प्रकृति है ! आप प्रकृति से नहीं बच सकते ! जैसे आपके घर का कुत्ता विशुद्ध शाकाहारी ढंग से दूध रोटी खिला कर पाला पोशा गया हो लेकिन हड्डी देखते ही वो उसकी सुगंध के तरफ आकर्षित होगा ही होगा ! यह प्रकृति है ! बकरी को हड्डी नहीं लुभाएगा क्योंकि बकरी को प्रकृति ने शाकाहारी बना के भेजा है !
लेकिन एक लोचा है – उम्र के एक ख़ास पडाव या दौर में क्षणिक ही सही लेकिन शारीरिक और भावनात्मक सम्बन्ध – दोनों साथ साथ होते है ! यह जोड़े जोड़े पर निर्भर कर सकता है – किसमे किस आकर्षण का अनुपात ज्यादा है ! कहीं शारीरिक ज्यादा तो कहीं भावनात्मक ज्यादा ! लेकिन ‘शिव शक्ति’ का मिलन इन तीनो भावों को दर्शाता है ! तीसरा भाव ‘अध्यात्मिक’ बहुत कठिन है ! इसे बहुत वक़्त चाहिए ! बहुत ! कई संबंधों में यह भाव तब आता है – जब बाकी के दोनों भाव ख़त्म हो चुके हों ! आप आस पास के संबंधों को गौर से देखिये – कई पति पत्नी में यह अध्यात्मिक भाव आपको नज़र आएगा – जब पत्नी माँ के रूप में बन जाती है ! काफी उमरदराज जोड़ों में यह नज़र आएगा – जब उन्हें जीवन का अनुभव सच के करीब लाएगा ! लेकिन कम उम्र में – इन तीनो भावों के साथ कोई रिश्ता बनाना अत्यंत कठिन है ! सारे योग फेल हो जायेंगे क्योंकि मनुष्य की प्रकृति इसकी इजाजत नहीं देती ! दो भाव एक साथ आयेंगे तो तीसरा नदारत ! और सिर्फ एक भाव के साथ सम्बन्ध को टूटने का ख़तरा क्योंकि इन सारे रहस्यों को एक वातावरण भी कंट्रोल करता है – जिसे हम संसार कहते हैं और संसार आपके हिसाब से नहीं चलता !
शायद यही वजह है हम तीसरे भाव के लिए ईश्वर की तरफ धकेल दिए जाते हैं ! क्योंकि एक साथ इन तीनो भाव के होने की इजाजत यह संसार नहीं देता ! शायद इसलिए मैंने अपने एक पुराने पोस्ट में ईश्वर , प्रकृति के साथ साथ संसार को भी एक बराबर की जगह दी है ! हालांकि मेरा झुकाव प्रकृति के तरफ होता है क्योंकि मै मानव स्वभाव को समझने की कोशिश करता हूँ !
एक बात और क्लियर है की जो एक ख़ास उम्र के दौर में है और अद्यात्मिक है – वह अपनी आत्मा या अपने से ऊँची आत्मा के साथ संपर्क बनाना चाहता है या बन चुका है – उसके अंदर भी बाकी के भाव होंगे ! यहाँ समाज या तीसरा व्यक्ति गलत कैलकुलेट करता है और कई बार अध्यात्मिक लोग कई लांक्षण के शिकार होते हैं क्योंकि वो बाकी के दोनों भाव को रोक नहीं पाते ! यहाँ उम्र भी कारक है ! लेकिन समाज कहता है की जब आप अध्यात्मिक हो गए यानी अपने से ऊपर किसी आत्मा के संपर्क में आ गए फिर आपके दोनों बाकी भाव ख़त्म हो जाने चाहिए ! शायद यह योग से संभव है ! लेकिन योग की भी काल / समय के साथ एक सीमा है ! लेकिन यह योग बहुत हद तक मदद करता है लेकिन किसी भाव को रोकना – प्रकृति के नियम के खिलाफ है ! जैसे किसी नदी की दिशा को मोड़ना ! फिर वो बाढ़ लाएगी ! शायद यही वजह है की इंसान अध्यात्म में ईश्वर के किसी रूप से खुद को कनेक्ट करना चाहता है – इंसान का कोई भरोसा नहीं और इंसान के बीच सिर्फ और सिर्फ भावनात्मक या शारीरिक आकर्षण ही बन के रह पाता है ! भावनात्मक भाव के चरम बिंदु से अध्यात्म की शुरूआत होती है और शारीरिक भाव के चरम बिंदु से भावनात्मक ! शायद यही वजह है की कई बार सेक्स वर्कर अपने चरम बिंदु से बचते / बचती है क्योंकि यहाँ से उनको भावनात्मक भाव के आ जाने का भय होता है ! यह कतई जरुरी नहीं की भावनात्मक भाव के लिए स्पर्श जरुरी है लेकिन स्पर्श के माध्यम से आया भावनात्मक लगाव थोड़ा टिकाऊ होता है !
स्त्रीयां यहाँ अलग ढंग से सोचती है – कहीं एक मशहूर लेखिका ने लिखा था – ‘मन से देह का रास्ता जाता है या देह से मन का – कहना कठिन है’ ! स्त्री के लिए उसके देह का रास्ता मन से होकर जाता है और पुरुष के लिए उसके मन का रास्ता देह से होकर जाता है !
शायद यही वजह है की – कई दफा कोई स्त्री अपने पुरुष के अन्य दैहिक सम्बन्ध को तो स्वीकार कर लेती है लेकिन अपने पुरुष के भावनात्मक समबन्ध पर चिढ जाती है , वहीँ दूसरी और पुरुष अपने स्त्री के अन्य भावनात्मक सम्बन्ध को स्वीकार तो कर लेते हैं लेकिन शारीरिक कतई नहीं ! हालांकि भय दोनों तरफ होता है – कहीं यह सम्बन्ध भावनात्मक से शारीरिक न हो जाए या फिर शारीरिक से भावनात्मक न हो जाए ! लेकिन तीनो भावों की जरुरत स्त्री और पुरुष दोनों को होती है ! देर सबेर या कम ज्यादा ! खैर , बात अर्धनारीश्वर से शुरू हुई थी ! जब शक्ति शिव में समाहित होती है – मूलतः वो प्रेरणा होती है ! कई साधारण से साधारण पुरुष भी किसी स्त्री के संपर्क मात्रा से अपने सांसारिक जीवन में कई सीढ़ी ऊपर चढ़ जाते हैं – पताका लहराते हैं ! अब यह उस पुरुष पर निर्भर करता है की वह कैसी प्रेरणा स्वीकार करता है ! यह उसकी अपनी वर्तमान परिस्थिति या ग्रहों की दिशा तय करेगी ! हर पुरुष एक शिव है और हर स्त्री एक शक्ति है ! कब किस शक्ति को किस शिव में समाहित होना है – यह ग्रहों के भाव तय करेंगे ! लेकिन शक्ति के समाहित होने के साथ कोई इंसान शिव न बने – यह असंभव है ! अर्धनारीश्वर का कांसेप्ट मूलतः ‘शिव शक्ति’ के मिलन के उस रूप को है ! अब आप इसे भावनात्मक भाव से देखिये या शारीरिक या अध्यात्मिक – यह सोच आपकी वर्तमान मनोवस्था की परिचायक होगी ! लेकिन इस सारे कथा कहानी या शास्त्र का स्रोत समाज या संसार रहा है जो प्रकृति के इन रहस्यों को स्वीकार तो करता है लेकिन अपने शर्तों या नियम के साथ और इन रहस्यों के साथ बंधे सामाजिक शर्त को हम भी रहस्य मान बैठते हैं या फिर इंसान इतना कमज़ोर होता है की समाज के शर्तों में बंधी इन रहस्यों को स्वीकारने का हिम्मत उसके अंदर नहीं ! कारण जो भी हो लेकिन किसी भी स्त्री पुरुष का मिलन किसी भी भाव के साथ ही ‘अर्धनारीश्वर’ का कांसेप्ट है ! अब वह भाव वह जोड़ा तय करेगा !
याद रहे – सभी भावों की आयु कम है ! और इंसान की अपेक्षा अनंत है ! तभी प्रकृति और सामाज के साथ साथ ईश्वर भी है या यूँ कहिये ईश्वर ही हैं :)) 

@रंजन ऋतुराज / 4 मार्च 2019 / महाशिवशक्ति रात्री 🙂 

गुलज़ार से मुलाकात : छह साल पहले …2014 में

पटना लिट्रेचर फेस्टिवल -2014

कल्पनाओं के शिखर पर एक अबोध तमन्ना बैठी होती है – उसकी अबोधता को देख ईश्वर उसे अपने गोद में बैठाते हैं – फिर वो तमन्ना एक दिन हकीकत बन बैठती है…:))


आज का दिन बेहतरीन रहा – कल देर रात तक जागने के बाद – सुबह नींद ही खुली ‘रविश’ की आवाज़ से – नहाते धोते …थोड़ी देर हो ही गयी ..झटपट भागा …रविश स्टेज पर बैठे थे ..वहीं से हाथ हिलाया ..मै भी सबसे पिछली कतार में बैठ गया …तब तक एक आवाज़ आयी “आप दालान वाले हैं ..न ” – एक तस्वीर खिंचवानी है आपके साथ …ये थे आभाश भूषण – दालान को चाहने वाले …फिर वो दोनों पति पत्नी मेरे साथ फोटो खिंचवाए – बेहद सज्जन और उन्दोनो ने बताया – दालान पर दी गयी सुचना कारण ही वो दोनों यहाँ आये ..:))
रविश का सत्र ख़त्म होने के साथ – उनका दूसरा सत्र शुरू होने वाला था – इसमे कोई दो राय नहीं – रविश काफी लोकप्रिय हैं – कई नौजवान उनके साथ फोटो खिंचवाने को बेताब थे – मेरी वेश भूषा देख – उनके प्रशंसक भी “दालान” वाले समझ गए ..:)) बढ़िया लगा …
रविश के दुसरे सत्र के ठीक पहले आये – “गुलज़ार” ..झटपट भागा – दोनों हाथ से उनके पैर छू कर आशीर्वाद लिया – आभास भूषण समझ गए – उन्होंने बाद में गुलज़ार के साथ मेरी कुछ तस्वीरें लीं ..गुलज़ार के साथ थे – ओम थानवी जी – मै क्या बोलता – भाव विभोर था – बस एक लाईन सुना पाया – “सारी रात मेरे शब्द जलते रहे – वो पत्थर से मोम बनते रहे..:)) गुलज़ार के ठीक पीछे बैठ – रविश का दूसरा सत्र – जिसके वो बादशाह जाने जाते हैं – नोस्टैल्जिया ..मेरा भी पसंदीदा …उनके साथ थे – अंग्रेज़ी और डेनिश के लेखक – “तबिश खैर” – ताबिश सभी भाषा प्रयोग कर रहे थे – रविश अपनी हिंदी और भोजपुरी …रविश बोलते बोलते – “छठ पूजा की यादों” पर बोलना शुरू कर दिए – डर था – कहीं फिर से वो मेरा नाम न बोल बैठें ..:)) रविश संभले – शुक्रगुज़ार रहता हूँ – हर ऐसे समाचार पत्र के लेख में वो मेरा नाम ठूंस ही देते हैं …
रविश को लोग घेरे हुए थे – मैंने बोला – रविश ..मैंने पटना म्यूजियम नहीं देखा है …और आज आप मेरे गाईड बन के ..मुझे घुमाएं ..:) रविश तैयार हुए ..हम दोनों अकेले निकल पड़े …घूम कर लौटे तो …पवन कार्टूनिस्ट और उनकी पत्नी रश्मी दोनों रविश को अपने कार्टून का एक बेहद बढ़िया गिफ्ट …इसी बीच ..टेलेग्राफ़ के रोविंग एडिटर ‘संकर्षण ठाकुर’ मिल गए – बोले ..रंजन ..मेरी भी किताब का आज लोकार्पण है – आप आईये – संकर्षण बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं – अपने साथ वालों से परिचय कराने लगे – रंजन को पढने से ज्यादा सुनने में मजा आता है …:))
फिर हम और रविश संकर्षण ठाकुर के किताब जो नितीश कुमार के ऊपर छपी है …के लोकार्पण में चले गए – ढेर सारी गप्प – व्यक्तिगत बातें …वहां से निकले तो …रविश के साथ पटना का सैर …फिलोसोफी …फिलोसोफी और फिलोसोफी …ढेर सारी गाईडलाईन …दोनों तरफ से …:))
रविश …तुम बेहद इज्ज़त करते हो …आज भी याद है ..माँ के देहांत के बाद इंदिरापुरम पहुँचने के बाद …पिछले साल …तुम सबसे पहले मिलने आये थे …कोई शक नहीं हिंदी न्यूज के बेताज बादशाह हो ..तुम पर ईश्वर का आशीर्वाद बना रहे …अहंकार तुमसे कोसों दूर रहे …और मेरा नाम तुम्हारे जुबान पर नहीं आये …:))

~ रंजन / 15.02.14